मन की बात कह डालें?

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता मर्यादित क्यों नहीं हो सकती?

हमारे मन में कितनी ही बातें उठती हैं जिन्हें हम कहना चाहते हैं, लेकिन कह नहीं पाते। कभी किसी व्यक्ति से असहमति होती है, कभी किसी व्यवस्था से शिकायत, कभी किसी अन्याय पर आक्रोश और कभी किसी विचार से गहरा मतभेद। हम जानते हैं कि हमें क्या कहना है, फिर भी शब्द होंठों तक आकर ठिठक जाते हैं। कभी सम्बन्ध बिगड़ने का भय, कभी प्रतिकार की आशंका, कभी प्रतिष्ठा की चिन्ता और कभी केवल यह संकोच कि लोग क्या कहेंगे। हम अपने मन की बात या तो भीतर दबा लेते हैं अथवा उसे इस तरह बदलकर कहते हैं कि उसका अभिप्राय ही लुप्त हो जाता है।

आखिर हम ऐसा क्यों करते हैं? क्या मन की बात कह देना इतना कठिन है?  बेहिचक और अनिर्बाधित अभिव्यक्ति के गुण दोष क्या हैं और क्या यदि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर अंकुश लगना चाहिए तो क्यों?

एक राजा और एक संन्यासी को सामने रखकर इस प्रश्न को समझने का प्रयास किया जा सकता है। राजा वह कहता है जो वह चाहता है, क्योंकि उसके पास सत्ता और अधिकार है। उसकी वाणी के पीछे प्रभुत्व का बल है। संन्यासी भी अपनी बात कहता है, लेकिन उसके पास न सत्ता है, न अधिकार और न ही किसी को अपनी बात मनवाने की आकांक्षा। राजा की निर्भीकता उसकी शक्ति से आती है, संन्यासी की निर्भीकता उसकी अनासक्ति से। एक के पास खोने का भय नहीं क्योंकि उसके पास बहुत कुछ है; दूसरे के पास भी खोने का भय नहीं है क्योंकि उसने कुछ भी अपना मानना त्याग दिया है। लेकिन हम में से अधिकांश न  तो राजा हैं न संन्यासी.

तो फिर  क्या मन की हर बात कह देना सही है,  उचित है? शायद हाँ , लेकिन कुछ परिस्थितियों में उसे न कहना भी श्रेष्ठतर हो सकता है। हमारे मन में प्रेम और करुणा के साथ क्रोध, ईर्ष्या, द्वेष, प्रतिशोध और अहंकार भी जन्म लेते हैं। यदि हम इन सबको बिना विवेक के व्यक्त करने लगें तो समस्याएँ सुलझने के बजाय बढ़ेंगी। इसलिए मन की बात कहने से पहले मन को समझना आवश्यक है। अपने विचार को पहचानना और उसकी सत्यता को परखना, अभिव्यक्ति की निरंकुशता से कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण है।

भगवद्गीता के सत्रहवें अध्याय में श्रीकृष्ण वाणी के तप की चर्चा करते हैं:

अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत्।
स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते॥

अर्थात् ऐसी वाणी जो अनावश्यक उद्वेग उत्पन्न न करे, सत्य हो, प्रिय हो और हितकारी हो, वही वाणी का तप है। वाणी केवल अपने विचार प्रकट करने का साधन नहीं, वह स्वयं एक साधना भी है। सत्य बोलना आवश्यक है, लेकिन सत्य के नाम पर कटुता और अहंकार को प्रदर्शित करना तो कैसे सही कहा जा सकता है?

मनुस्मृति का प्रसिद्ध कथन भी इसी ओर संकेत करता है—

सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयात् न ब्रूयात् सत्यमप्रियम्।
प्रियं च नानृतं ब्रूयादेष धर्मः सनातनः॥

सत्य बोलो, प्रिय बोलो; प्रिय लगने वाला असत्य मत बोलो, और अप्रिय लगने वाला सत्य भी मत बोलो.

अप्रिय सत्य को लेकर अक्सर मन में द्वंद उठता है. क्या किसी अन्याय के विरुद्ध बोलते समय हम इस बात की प्रतीक्षा करें कि हमारी बात सबको प्रिय लगे? क्या किसी गलत बात को केवल इसलिए अनदेखा कर दें कि उसे कहने से कोई अप्रसन्न हो सकता है?  तो औचित्य किस में है?  सत्य को नकारना और सत्य को मर्यादा के साथ कहना दो अलग बातें हैं। कभी-कभी अप्रिय सत्य कहना हमारा दायित्व होता है। संगत प्रश्न यह है कि ऐसा करने के पीछे हमारी भावना, हमारी मंशा क्या है?

कबीर ने इसी बात को कुछ और तरीक़े से कहा है. यहाँ कबीर ने सत्य और असत्य के बीच में कोई विभेद नहीं किया है, केवल बोलने के तरीक़े के बारे में अपनी राय व्यक्त की है.

ऐसी बानी बोलिए, मन का आपा खोय।
औरन को शीतल करे, आपहुं शीतल होय॥

कड़वा सच भी सोच समझ कर, भाषा की मर्यादा समझ कर कहा जाए तो उसकी महत्ता क़ायम रहती है और कटुता भी सीमित की जा सकती है.

वस्तुतः वाणी की मर्यादा का आधार भय नहीं, बल्कि अहंकार का त्याग है. हम मन की बात अक्सर इसलिए भी नहीं कह पाते कि हमने अपने लिए कुछ छवियाँ बना रखी हैं। हम चाहते हैं कि लोग हमें अच्छा, समझदार और स्वीकार्य मानें। इस छवि को बचाने के लिए हम अपने ही विचारों से समझौता करने लगते हैं। कभी यश की लालसा हमें रोकती है, कभी अपयश का भय। कभी पद और प्रतिष्ठा की चिन्ता होती है, कभी सम्बन्ध खोने का डर। इस प्रकार हम दूसरों की स्वीकृति के बन्धन में इतने बँध जाते हैं कि अपने ही मन की आवाज सुनना कठिन हो जाता है। शायद यह मोह का ही एक रूप है। हम संसार से जितना नहीं बँधे होते, उससे अधिक संसार में अपनी छवि से बँधे होते हैं।

तो फिर उचित क्या है? कब बोलें और कब मौन रहें? इसका कोई सर्वमान्य या यांत्रिक उत्तर नहीं हो सकता। लेकिन अपने आप से कुछ प्रश्न अवश्य पूछे जा सकते हैं। क्या जो मैं कहने जा रहा हूँ वह सत्य है? क्या उसे कहना आवश्यक है? क्या उससे किसी का हित होगा, किसी भ्रम का निराकरण होगा अथवा किसी अन्याय का प्रतिकार होगा? और सबसे महत्त्वपूर्ण, क्या मैं यह बात किसी को आहत करने के लिए कह रहा हूँ या इसलिए कि उसे कहना अपरिहार्य है ?

यदि इन प्रश्नों के उत्तर हमें आश्वस्त करते हैं, तो केवल भय अथवा संभावित प्रतिकार के कारण चुप रहना उचित नहीं। लेकिन यदि हमारी अभिव्यक्ति केवल अपनी कुंठा निकालने अथवा अपने अहंकार को तुष्ट करने का माध्यम है, तो मौन ही बेहतर है। वाणी का संयम कायरता नहीं और निर्भीक अभिव्यक्ति उद्दण्डता नहीं।

एक और समस्या है. अपनी बात कहने के बाद हम यह भी अपेक्षा करते हैं कि दूसरा उसे स्वीकार भी करे? अपनी बात कहना हमारा अधिकार और कभी-कभी दायित्व है, लेकिन उसे मनवाना हमारा अधिकार नहीं। दूसरे की असहमति को स्वीकार कर पाना भी उतना ही आवश्यक है जितना अपनी बात कहने का साहस रखना।

गीता में स्थितप्रज्ञ का वर्णन करते हुए श्रीकृष्ण राग, भय और क्रोध से मुक्त होने की बात करते हैं। संन्यास का अर्थ संसार से भागना ही नहीं, बल्कि संसार के बीच रहते हुए भी अपने विचार और आचरण को भय, लोभ और मोह का बन्धक न बनने देना है। इस दृष्टि से मन की बात कहने की स्वतंत्रता और संन्यास के बीच एक गहरा सम्बन्ध दिखाई देता है। जब मनुष्य अपने भीतर और बाहर के बीच का छल और दुराव समाप्त कर देता है, जब उसकी वाणी किसी स्वार्थ अथवा प्रतिफल की अपेक्षा से संचालित नहीं होती और जब वह अपनी बात कहकर दूसरे की स्वीकृति या अस्वीकृति से विचलित नहीं होता, तब अभिव्यक्ति आत्मिक स्वतंत्रता का अभ्यास बन जाती है।

शायद इसलिए मन की बात कहने से पहले हमें अपने मन को मुक्त करना होगा—दूसरों के भय से, अपनी छवि की चिन्ता से, प्रशंसा की लालसा से और अस्वीकृति की आशंका से। यह भी स्वीकार करना होगा कि हमारा सत्य अंतिम सत्य नहीं है और हम ग़लत हो सकते हैं.  अपनी गलती स्वीकारने और उसे सुधारने के लिए प्रयासरत रहना भी मन की बात कहने की प्रक्रिया के अंग हैं.

सत्य बोलने का साहस बड़ी बात है; लेकिन सत्य को अपने जीवन का स्वभाव बना लेना उससे भी बड़ी बात है। शायद इसी यात्रा में अभिव्यक्ति की नैसर्गिक स्वतंत्रता धीरे-धीरे आत्मा के परिष्कार और निर्वाण के प्रक्रिया की साधना बन जाती है.

और तब मन की बात कह डालना गुण दोष से परे हो जाते हैं वह हमारा स्वभाव बन जाता है। अपने  मन की बात कहना निरंकुश अभिव्यक्ति नहीं है। यह आत्मशुद्धि, विवेक, निर्भयता और अनासक्ति की यात्रा भी है। और यही तो सन्यास का आवश्यक तत्व भी है.

Published by udaykumarvarma9834

Uday Kumar Varma, a Harvard-educated civil servant and former Secretary to Government of India, with over forty years of public service at the highest levels of government, has extensive knowledge, experience and expertise in the fields of media and entertainment, corporate affairs, administrative law and industrial and labour reform. He has served on the Central Administrative Tribunal and also briefly as Secretary General of ASSOCHAM.

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