शरद पूर्णिमा : चाँदनी में घुली शुचिता

“चाँद हर महीने पूर्ण होता है, लेकिन हर पूर्णिमा हमें पूर्णता का अनुभव नहीं करा पाती।”

आज शरद पूर्णिमा है, शायद पूर्णिमाओं में सबसे मनोहारी और सुंदर। शुचिता और सुंदरता का इतना सुंदर मेल और समन्वय शायद ही किसी रात्रि की आभा में समाहित हो पाई है। पूर्णिमाएँ तो अमूमन सुंदर ही होती हैं. प्यार और अभिसार की सर्वोच्च अनुभूति देने की क्षमता रखती हैं और शायद इसी लिए चंद्रमा और  र्पूर्णिमा ने सबसे अधिक कवियों को और प्रेमियों को अपने प्रभाव का केंद्र बमाया है.

लेकिन शरद पूर्णिमा की बात ही अलग है. यह तब आती है जब वातावरण में एक प्यारी सी ठंडक घुलने लगती है और चन्द्रमा की किरणें मन और काया दोनों को ही जो स्निग्धता और शीतलता प्रदान करती हैं जो अनुभूत ही किया जा सकता है और जिनके लिए शब्द कभी भी पर्याप्त नहीं हो पाए हैं. कुछ रातें केवल देखी नहीं जातीं, अनुभव की जाती हैं। शरद पूर्णिमा की रात ऐसी ही है। पूर्णिमा का चाँद हर महीने अपनी सम्पूर्ण आभा के साथ आकाश में उतरता है, लेकिन शरद ऋतु के इस चाँद की बात कुछ और है। वर्षा के बाद धुला-धुला आकाश, वातावरण में घुलती हल्की ठंडक और धरती पर चुपचाप बिछती चाँदनी—सब मिलकर ऐसा सम्मोहन रचते हैं, जिसमें सौंदर्य और शुचिता का अद्भुत समन्वय है। लगता है, प्रकृति ने अपनी सारी कोमलता और उज्ज्वलता समेटकर इस एक रात में रख दी हो।

संस्कृत के महाकवि कालिदास ने शरद ऋतु को एक नववधू के रूप में देखा था। ऋतुसंहार में उनका यह प्रसिद्ध श्लोक प्रकृति के इसी रूप को साकार करता है—

काशांशुका विकचपद्ममनोज्ञवक्त्रा
सोन्मादहंसनूपुरनादरम्या।
आपक्वशालिरुचिरा तनुगात्रयष्टिः
प्राप्ता शरन्नववधूरिव रूपरम्या॥

अर्थात् शरद ऋतु मानो एक नववधू है—काश के श्वेत फूलों का परिधान पहने, खिले कमलों-सा मुख लिए, हंसों की ध्वनि को नूपुरों का संगीत बनाए और पकते धान की शोभा से सुशोभित। प्रकृति के मानवीकरण की इससे सुंदर कल्पना क्या होगी? शरद का सौंदर्य केवल आँखों को नहीं लुभाता; वह मन में एक कोमल, निर्मल और उत्सवमय भाव भी जगाता है।

पूर्णिमा और चंद्रमा का प्रेम से पुराना नाता है। कवियों ने चाँद में प्रियतम का मुख देखा है, प्रेमियों ने उसकी चाँदनी में अभिसार के स्वप्न सँजोए हैं और विरहियों ने उसी चाँद को अपनी उदासी का साक्षी बनाया है। संस्कृत काव्य से लेकर हिंदी और उर्दू शायरी तक चाँद प्रेम, सौंदर्य, विरह और कल्पना का चिरंतन प्रतीक रहा है। लेकिन शरद पूर्णिमा की चाँदनी में प्रेम की एक अलग ही रंगत है। यहाँ उन्माद से अधिक माधुर्य है, आकर्षण से अधिक आत्मीयता और चकाचौंध से अधिक शांति। जैसे चाँदनी मन को केवल आलोकित नहीं करती, उसे धीरे-धीरे स्निग्ध और शांत भी करती चलती है।

हमारी सांस्कृतिक स्मृतियों में भी इस रात का विशेष स्थान है। वैष्णव परंपरा में इसे रास पूर्णिमा कहा जाता है। मान्यता है कि इसी रात वृंदावन में श्रीकृष्ण ने गोपियों के साथ महारास रचाया था। इस कथा का आध्यात्मिक अर्थ केवल प्रेम की लीला में नहीं, उस प्रेम में निहित समर्पण में भी है—जहाँ पाने की आकांक्षा से आगे बढ़कर स्वयं को अर्पित करने का भाव जन्म लेता है। कहीं इसी रात माता लक्ष्मी के पृथ्वी पर विचरण करने की मान्यता है, तो कहीं खुले आकाश के नीचे रखी खीर को चंद्रकिरणों में रखने की परंपरा। लोकविश्वास है कि इस रात चंद्रमा से अमृत बरसता है। विज्ञान इस विश्वास की पुष्टि नहीं करता, लेकिन परंपरा का अपना सांस्कृतिक सौंदर्य है। चाँदनी में रखा खीर का पात्र, परिवार का साथ और रात की शीतल हवा—इन सबमें एक सहज आनंद है, जो पीढ़ियों से हमारी स्मृतियों का हिस्सा बना हुआ है।

प्रकृति की दृष्टि से भी शरद ऋतु एक विशेष परिवर्तन का समय है। वर्षा के बाद आकाश अधिक निर्मल दिखाई देने लगता है और रातों में धीरे-धीरे ठंडक घुलने लगती है। चंद्रमा का प्रकाश वास्तव में सूर्य के प्रकाश का परावर्तन है, लेकिन उसकी अनुभूति केवल प्रकाश की तीव्रता से नहीं मापी जा सकती। उसमें रात की निस्तब्धता, खुले आकाश का विस्तार, शीतल हवा और हमारे भीतर जागती स्मृतियाँ भी सम्मिलित हैं। प्रकृति का सौंदर्य शायद इसी में है कि वह विज्ञान की व्याख्या से समझा तो जा सकता है, पर पूरी तरह उसी में समेटा नहीं जा सकता।

और फिर कविता है, जो इस रात को केवल एक प्रतिदिन अनुभूत होने वाली खगोलीय घटना नहीं रहने देती, उसे मानवीय अनुभूति में बदल देती है। चाँदनी प्रेमी के लिए प्रणय है, साधक के लिए शांति, कवि के लिए कल्पना और अकेले बैठे मनुष्य के लिए आत्मसंवाद। उर्दू शायरी में चाँद और महताब के बिंबों ने प्रेम को जितनी नज़ाकत दी है, हिंदी कविता में चाँदनी ने प्रकृति और अंतर्मन के बीच उतने ही कोमल सेतु बनाए हैं। शायद इसीलिए चंद्रमा पर इतना कुछ लिखा गया है, फिर भी उसके बारे में कहने को बहुत कुछ शेष रहता है।

शरद पूर्णिमा हमें एक छोटी-सी बात याद दिलाती है—जीवन में सुंदरता का अनुभव करने के लिए हर बार कुछ नया पा लेना आवश्यक नहीं। कभी-कभी पर्याप्त है कि हम ठहरें, आकाश की ओर देखें और उस उज्ज्वलता को अपने भीतर उतरने दें। हमारी व्यस्तताओं, इच्छाओं और चिंताओं के बीच ऐसी रातें हमें अपने ही मन से मिलने का अवसर देती हैं। वे यह भी सिखाती हैं कि पूर्णता का अर्थ केवल सब कुछ पा लेना नहीं; कभी-कभी वह उस क्षण में उपस्थित होने में है, जो हमें बिना किसी आग्रह के आनंद दे रहा है।

चाँद हर महीने पूर्ण होता है, लेकिन हर पूर्णिमा हमें पूर्णता का अनुभव नहीं करा पाती। शरद पूर्णिमा की विशेषता शायद इसी में है कि वह प्रकृति की पूर्णता के साथ मन की शांति का भी उत्सव बन जाती है। उसकी चाँदनी में कुछ देर बैठकर लगता है कि संसार को सुंदर बनाने के लिए बहुत कुछ बदलना नहीं पड़ता—कभी-कभी केवल हमारी दृष्टि का निर्मल हो जाना पर्याप्त होता है।

हाथ में चाँद जहाँ आया मुक़द्दर चमका
सब बदल जाएगा क़िस्मत का लिखा जाम उठा
–
बशीर बद्र

Published by udaykumarvarma9834

Uday Kumar Varma, a Harvard-educated civil servant and former Secretary to Government of India, with over forty years of public service at the highest levels of government, has extensive knowledge, experience and expertise in the fields of media and entertainment, corporate affairs, administrative law and industrial and labour reform. He has served on the Central Administrative Tribunal and also briefly as Secretary General of ASSOCHAM.

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