मोह-जनित कामना या मोह से मुक्ति
आज नवमी के पूजन के साथ नव रत्रि के पावन पर्व का समापन हो जाएगा। हम सब ने अपने अपने तरीके से और अपनी अपनी भक्ति की क्षमताओं के अनुरूप देवी की उपासना और आराधना की है। हम में से बिरले ही कोई होंगे जो बिना कुछ कामना के देवी की पूजा करते हों। हमारी प्रवृत्ति ही ऐसी है कि बिना स्वार्थ के ईश्वर की आराधना हमसे होती ही नहीं। वहाँ तक भी ठीक है लेकिन कुछ ऐसे भी हैं, जिन्हें दूसरों की ख़ुशी और प्रगति से कुंठा होती है और फिर वे दूसरों के पराभव के लिए भी साधना करते हैं।
लेकिन मनुष्य की प्रकृति ऐसी क्यों है? नवरात्रि के इन नौ दिनों में सबसे अधिक पढ़ा जाने वाला ग्रंथ, दुर्गा सप्तशती से इस मनोवृत्ति पर कुछ प्रकाश पड़ता है। सप्तश्लोकी दुर्गा का प्रथम श्लोक ही है,
ॐ ज्ञानिनामपि चेतांसि देवी भगवती हिसा ।
बलादाकृष्य मोहाय महामाया प्रयच्छति ॥
(भगवती ज्ञानियों के भी चित्त को बलपूर्वक खींच कर मोह में डाल देती हैं.)
हमारा आचरण साधारणतः मोह ग्रस्त है और जब मोह ही हमारी सोच का परिचालक है तो शुभ या अशुभ, सही और ग़लत, उचित और अनुचित, वांछित और अवांछित का भेद करने में हमारी बुद्धि अक्सर चूक जाती है। और देवी तो ज्ञानियों का चित्त भी मोह में डाल देती हैं. यही माया है और यही माया, मोह ग्रस्त साधारण मनुष्यों के जीवन का परिचालन करती रहती है. देवी की साधना ज्ञानी इसलिए भी करते हैं ताकि उनके चित्त को देवी मोह ग्रस्त न कर दें, और उनका मोह से छुटकारा हो सके.
ज्ञान होना और ज्ञान के अनुरूप आचरण करना दो अलग बातें हैं। हम जानते हैं कि ईर्ष्या, लोभ और अहंकार अनुचित हैं, फिर भी उनसे मुक्त नहीं हो पाते। मोह हमारी बुद्धि पर ऐसा आवरण डाल देता है कि हम अपने स्वार्थ को न्याय और अपनी हठधर्मिता को सिद्धान्त समझने लगते हैं। तब उचित-अनुचित और शुभ-अशुभ का भेद भी धुँधला पड़ जाता है। शायद इसीलिए देवी की आराधना केवल इच्छापूर्ति के लिए नहीं, अपने चित्त को मोह के प्रभाव से मुक्त करने के लिए भी आवश्यक है।
दुर्गा सप्तशती महिषासुर मर्दन और शुंभ तथा निशुंभ के पराजय की ही कथा नहीं है, यह कथा राजा सुरथ की भी है और समाधि वैश्य की भी है. मोह जनित विकार अनंत हैं. यह मोह कभी सत्ता और अधिकार के रूप में, कभी अतिशय प्रेम और आकर्षण के रूप में, कभी स्वरूप और शरीर के सौन्दर्य और यौवन के रूप में आकार लेता है. और इन्ही मोहों के कारण दुख का होना भी ध्रुव ही है. सुरथ जंगल में इसलिए भटक रहे थे क्योंकि उनका राज्य छिन गया था और समाधि भी वन में इसलिए आ गए थे कि उनके परिवारजनों ने उनकी सम्पत्ति लेकर उन्हें घर से बाहर निकल दिया था लेकिन दोनों इस बात से आश्चर्य में थे और व्यथा में भी कि ऐसे अनुभव के बाद भी न राजा का मोह अपने राज्य से गया था और न ही वैश्य का मोह अपनी पत्नी और संतानों से. उन दोनों को मेधा ऋषि ने समझाया और देवी की कथाएँ भी सुनाईं और उन दोनों ने फिर देवी की कृपा के लिए तपस्या की और उन्हें प्रसन्न किया. अपेक्षा तो यह थी कि देवी से वे इस मोह से मुक्त होने का वरदान माँगेंगे. लेकिन ऐसा हुआ नहीं.
क्योंकि सिर्फ़ आराधना करने में ही क्यों? देवी से या ईश्वर से कुछ मांगने में भी हमारा मोह ही परिलक्षित होता है। सुरथ और समाधि, राजा और वैश्य जो खिन्न और दुखी होकर वन में मिले थे और जिन्हें मेधा ऋषि ने महिषासुरमर्दिनी और शुम्भ-निशुंभहन्त्री की कथा सुनाई तथा ज्ञान दिया, उन्होंने भी देवी की तपस्या के बाद एक सा वरदान नहीं मांगा। सुरथ ने अपना खोया हुआ साम्राज्य मांगा लेकिन समाधि ने इस मोह से सदैव के लिए मुक्त कर देने वाला ज्ञान मांगा। दोनों की याचना में इतना अंतर क्यों? वह इसलिए कि देवी से वरदान वही मिलता है जो देवी चाहती है कि हमें मिले। यह एक बड़ी अजीब सी स्थिति है.
तो हमें करना क्या चाहिए? देवी का रहस्य गूढ़ है. उनका स्वरूप ब्रह्मा को भी नहीं ज्ञात, इसीलिए उन्हें अज्ञेया कहा जाता है, जिसका अंत नहीं मिलता इसलिए उन्हें अनंता कहा गया. जिसका लक्ष्य न दिख सके इसलिए अलक्ष्या, और जिसका जन्म समझ नहीं आए इसलिए जिसे अजा कहा गया. जो अकेली ही सर्वत्र है इसलिये एका, और सर्वत्र ही जिसमे समाहित है इसलिए जिन्हें नैका कहा गया. ऐसी अज्ञेया, अनंता, अलक्ष्या, अजा, एका और नैका शक्ति से कुछ माँगना बुद्धिमानी है क्या? लेकिन फिर भी हम माँगते है, कभी यश और सम्मान, कभी यौवन और रूप, कभी अधिकार और प्रभुत्व, और देवी हमे देती भी हैं. हम में से कुछ बिरले लेकिन ऐसा माँग जाते है जो हमें मोह के गर्त से सदा के लिए उभार देता है लेकिन ऐसे वरदान को मांगने के लिए भी उन्हीं की प्रेरणा चाहिए.
तो फ़िर हमें क्या करना चाहिए? शायद हमें अपने आप को देवी की शरण में अर्पित कर देना चाहिए और माँगना चाहिए वही जो देवी हमारे लिए उपयुक्त समझें.
मेरी समझ में यह प्रार्थना उचित है,
मत्समः पातकी नास्ति पापघ्नी त्वत्समा न हि।
एवं ज्ञात्वा महादेवि यथायोग्यं तथा कुरु ॥
महादेवि! मेरे समान कोई पातकी नहीं है और तुम्हारे समान दूसरी कोई पाप हारिणी नहीं है. ऐसा जानकर जो उचित जान पड़े, वह करो.
यह निराशा की याचना नहीं है, यह समर्पण की याचना है। यह आस्था की याचना है। भक्ति के उस सोपान पर पहुँच जाना जहाँ वरदान माँगना अनावश्यक लगे, जहाँ यह विश्वास हो जाए कि देवी जो मेरे लिए सर्वश्रेष्ठ है, वह दे ही देंगी, हमारी साधना की सफलता है. नवरात्रि अगर इस संकल्प को बलवती करती है, इस मार्ग पर अग्रेषित होने की प्रवृत्ति देती है तो हमारी आराधना निःसंदेह सार्थक है.