दोहे गए कहाँ?


“सतसैया के दोहरे, अरु नाविक के तीर,
देखन में छोटे लगें, घाव करें गंभीर।”
आजकल दोहे कौन लिखता है?
पता नहीं क्यों, यह सवाल कुछ समय से मेरे मन में अटका हुआ है। हिन्दी की कोई पाठ्यपुस्तक, खासकर स्कूल की, शायद आज भी दोहों के बिना पूरी नहीं होती। किताब खोलिए तो कबीर, रहीम, तुलसी और बिहारी अपनी-अपनी दो पंक्तियों में सदियों से विराजमान मिलेंगे। लेकिन किताब के बाहर? आज के कवि के संसार में? हमारी रोजमर्रा की भाषा में? दोहा आखिर गया कहाँ?
हमारे समय में दोहे केवल पढ़े नहीं जाते थे, याद भी किए जाते थे। उनके अर्थ समझाए जाते थे, कंठस्थ कराए जाते थे और जीवन में उनके उदाहरण भी खोजे जाते थे। बिहारी का उपर्युक्त दोहा तो जैसे अपने ही काव्य का परिचय है—देखने में छोटा, असर में गहरा। आज हम जिस ‘कम में अधिक’(न्यूनतावाद या मिनिमलिज्म) की बात करते हैं, वह हमारे लिए कोई नई खोज नहीं थी। आधुनिक कला, वास्तुकला और जीवन-शैली में जिस न्यूनतावाद की चर्चा होती है, दोहा सदियों से उसका एक भारतीय रूप प्रस्तुत करता आया था।
लेकिन कोई छोटी कविता केवल छोटी होने से न्यूनतावादी नहीं बन जाती। असली कला तो अनावश्यक को हटाकर भी इतना बचा लेने में है कि आवश्यक अपनी पूरी शक्ति और सुंदरता से सामने आ सके।
दोहा इसी कसौटी पर विलक्षण है। शब्द सीमित, छन्द की मर्यादा कठोर, फिर भी उनमें जीवन का अनुभव, प्रेम, नीति, दर्शन, व्यंग्य और आत्मबोध समा जाता है। बिहारी की आँखों की सुंदरता का यह वर्णन देखिए—
“अमिय हलाहल रस भरे, श्वेत श्याम रतनार,
जियत मरत झुकि झुकि परत, जेहि चितवत इक बार।”
और जीवन-दर्शन पर कबीर—
“बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय,
जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय।”
मानव सम्बन्धों की पूरी नाजुकता रहीम के एक धागे में आ जाती है—
“रहिमन धागा प्रेम का, मत तोड़ो चटकाय,
टूटे से फिर ना जुड़े, जुड़े गाँठ पड़ जाय।”
तुलसी के दोहे में व्यवहार की इतनी सरल सीख—
“तुलसी मीठे बचन ते, सुख उपजत चहुँ ओर,
बसीकरण इक मंत्र है, परिहरु बचन कठोर।”
प्रेम, आत्मचिन्तन, सम्बन्ध और व्यवहार—दो पंक्तियों में इतना कुछ! दोहा छोटा होता है, उसका अर्थ नहीं।
दोहा छोटा है, पर आसान नहीं
दोहे की संक्षिप्तता सुविधा से अधिक अनुशासन है। कवि के पास शब्द कम हैं और हर मात्रा की अपनी जगह। उसे एक संकरी पगडंडी पर चलना है—न एक शब्द अधिक, न एक कम। दोहा कवि की कसौटी है, मानो पूछता हो —तुम्हें सचमुच क्या कहना है?
मुक्तछन्द ने कविता को अद्भुत स्वतंत्रता दी है। विचार जितना फैलना चाहे, कविता उतनी फैल सकती है। दोहा इसके विपरीत कवि को रोकता है—अब इन्हीं शब्दों में अपनी बात पूरी कीजिए। शायद इसी में उसकी चुनौती भी है और आकर्षण भी।
इन दिनों हिन्दी में ग़ज़ल लिखने का चलन खूब है और दुष्यंत कुमार ने आधुनिक हिन्दी ग़ज़ल को एक सशक्त स्वर दिया। यह भी साहित्य की समृद्धि ही है कि नई विधाएँ और नए रूप आते रहें। लेकिन नई राहों के साथ पुरानी पगडंडियों का मिट जाना भी तो आवश्यक नहीं।
तो फिर दोहे लिखे क्यों नहीं जाते?
शायद इसलिए कि आधुनिक कविता छन्द और मात्रा की उस अनुशासित दुनिया से काफी दूर चली गई है। कविता अधिक निजी और अधिक मुक्त हुई है। लेकिन दोहे की एक दूसरी विडम्बना भी है। हम उन्हें अब पढ़ते कम और पढ़ाते अधिक हैं। कबीर का दोहा पाठ्यक्रम है, रहीम परीक्षा का उत्तर, बिहारी अलंकार और छन्द का उदाहरण। जो कभी जीवन को समझने का माध्यम था, वह धीरे-धीरे साहित्य का पाठ बन गया।
फिर भी दोहा सचमुच विलुप्त नहीं हुआ है। कम शब्दों में अधिक कहने की इच्छा आज भी हमारे आसपास है—सूक्तियों में, कहावतों में, विज्ञापन की पंक्तियों में, भाषणों की याद रह जाने वाली पंक्तियों में। लेकिन दोहे की कसौटी अधिक कठोर है। वह केवल छोटा नहीं होता, सघन होता है। वह सूचना नहीं देता, कुछ भीतर छोड़ जाता है। उसे पढ़ लेने के बाद वह समाप्त नहीं होता; कई बार वहीं से शुरू होता है।
शायद इसीलिए अच्छे दोहे उम्र के साथ पुराने नहीं होते। हम बदलते हैं और वे हमारे लिए नए अर्थ खोलते जाते हैं। किशोरावस्था में पढ़ा कबीर और जीवन के कई पड़ाव पार करने के बाद पढ़ा कबीर एक जैसा नहीं लगता। रहीम का प्रेम का धागा भी उम्र के साथ कुछ अधिक नाजुक दिखाई देने लगता है।
दोहे क्यों वापस आयें?
तो क्या हमें फिर दोहे लिखने चाहिए? शायद हाँ, शायद नहीं। साहित्य को पुराने रूपों में लौटने का आदेश तो नहीं दिया जा सकता। नई कविता अपनी राह बनाएगी ही। लेकिन दोहे की कला को फिर से पहचानना शायद आज पहले से अधिक आवश्यक है।
हम शब्दों की बाढ़ में हैं। सूचना बहुत है, अर्थ कम। अभिव्यक्ति बहुत है, ठहराव कम। हम लगातार बोल रहे हैं, लेकिन बहुत कम बातें ऐसी हैं जो हमारी स्मृति में बनी रहती है. ऐसे समय में दोहे रचने की कला—कहना कम ,लेकिन ऐसा कहना कि बात अंतर्मन में उतर जाए—अप्रासंगिक कैसे हो सकती है?
शायद दोहों को लौटने की जरूरत ही नहीं। वे कहीं गए भी नहीं हैं। जरूरत शायद केवल इतनी है कि हम फिर से समझें—शब्दों की संख्या और अर्थ की गहराई का कोई सीधा सम्बन्ध नहीं होता. कभी-कभी दो पंक्तियाँ दो सौ पृष्ठों से अधिक हमारे साथ बनी रहती हैं।
तो दोहे गए कहाँ? शायद कहीं नहीं गए। हम ही दो पंक्तियों में ठहरना भूल गए हैं।

Published by udaykumarvarma9834

Uday Kumar Varma, a Harvard-educated civil servant and former Secretary to Government of India, with over forty years of public service at the highest levels of government, has extensive knowledge, experience and expertise in the fields of media and entertainment, corporate affairs, administrative law and industrial and labour reform. He has served on the Central Administrative Tribunal and also briefly as Secretary General of ASSOCHAM.

Leave a comment