परदादा और परदादी से एक मुलाकात

प्रिय पार्थ, वेद और वियंका जया,

आज से भारत में पितृ पक्ष शुरू हो रहा है। शायद तुममें से किसी ने इसके बारे में सुना हो, या शायद नहीं। इसलिए इस बार मैंने सोचा कि तुम्हें पितृ पक्ष के बारे में बताने से पहले तुम्हें उन दो लोगों से मिलवाऊँ, जिनसे तुम कभी मिल नहीं सके—तुम्हारे परदादा और परदादी।

किसी ऐसे व्यक्ति से कैसे मिलवाया जाए जो अब इस दुनिया में नहीं है? शायद कहानियों के जरिए। तस्वीरें किसी का चेहरा दिखा सकती हैं, लेकिन कहानियाँ किसी व्यक्ति को हमारे करीब लाती हैं। इसलिए आज मैं तुम्हें उनकी कुछ कहानियाँ सुनाना चाहता हूँ।

तुम्हारे परदादा

तुम्हारे परदादा मेरे पिता थे। मेरे लिए वे केवल पिता नहीं थे; वे उन लोगों में से थे जिनके व्यक्तित्व की छाप जीवन भर हमारे साथ रहती है। उन्होंने हमें बहुत-सी बातें सिखाईं, लेकिन शायद उनकी सबसे बड़ी देन यह थी कि उन्होंने हमें अपने परिवार की कुछ विशेषताओं और सामर्थ्य का बोध कराया।

वे तीन अंग्रेजी शब्दों में इन्हें समेट सकते थे—Intelligence, Industry और Integrity।

बुद्धिमत्ता। परिश्रम। और ईमानदारी।

लेकिन उनके लिए ये केवल तीन अच्छे गुण नहीं थे। वे इन्हें जीवन जीने की तीन अनिवार्य शर्तों की तरह देखते थे। बुद्धि हमें सही रास्ता पहचानने में मदद करती है। परिश्रम उस रास्ते पर आगे बढ़ाता है। और Integrity—अपने विचारों, अपने शब्दों और अपने कर्मों के प्रति ईमानदारी—यह सुनिश्चित करती है कि रास्ता कितना भी कठिन क्यों न हो, हम अपने मूल्यों से विचलित न हों।

उन्होंने हमें शायद कभी यह नहीं कहा होगा कि “यह तुम्हारी विरासत है और इसे आगे बढ़ाना।” लेकिन उन्होंने अपने जीवन और अपने व्यवहार से हमें इसका अहसास कराया।

आज जब मैं पीछे मुड़कर देखता हूँ, तो समझ में आता है कि माता-पिता की सबसे बड़ी विरासत संपत्ति नहीं होती। वह होती है अपने बारे में एक विश्वास—यह विश्वास कि हम कौन हैं?, हमारी ताकत क्या है? और हमें किस तरह का मनुष्य बनने का प्रयास करना चाहिए?

मैं चाहता हूँ कि तुम तीनों भी इन तीन शब्दों को याद रखो। यह जरूरी नहीं कि तुम इन्हें उसी तरह समझो जैसे तुम्हारे परदादा समझते थे। समय बदलता है, दुनिया बदलती है, जीवन की चुनौतियाँ बदलती हैं। लेकिन बुद्धिमत्ता, परिश्रम और integrity की आवश्यकता कभी पुरानी नहीं होती।

तुम्हारी परदादी

और अब तुम्हारी परदादी!

उनकी कहानी कुछ अलग है। अगर तुम्हारे परदादा ने हमें जीवन के लिए कुछ मजबूत आधार दिए, तो तुम्हारी परदादी ने उस जीवन को प्रेम और ममता से भर दिया।

उनका संसार बहुत बड़ा नहीं था—लेकिन उसमें हम सब समाए हुए थे।

अपने बच्चों की देखभाल और उनकी खुशी ही जैसे उनके जीवन का उद्देश्य था। हमारी छोटी-सी खुशी उन्हें प्रसन्न कर देती थी और हमारी चिंता उनकी अपनी चिंता बन जाती थी। उन्होंने हमारे जीवन को किसी बड़े भाषण या उपदेश से नहीं, बल्कि अपने स्नेह से आकार दिया।

आज मुझे लगता है कि उनका प्रेम हमारे चारों ओर एक अदृश्य कवच की तरह था। हमें शायद उस समय इसका अहसास नहीं होता था। लेकिन पीछे मुड़कर देखने पर समझ आता है कि वह ममता कितनी गहरी और कितनी निरंतर थी।

कुछ लोग हमारे जीवन को दिशा देते हैं।
कुछ लोग हमें सुरक्षित महसूस कराते हैं।

तुम्हारे परदादा ने हमें बहुत कुछ दिशा दी; तुम्हारी परदादी ने हमें वह भाव दिया कि हम कहीं भी जाएँ, हमारे पीछे एक घर और एक प्रेम खड़ा है।

और शायद इसी कारण, इतने वर्षों बाद भी, दोनों हमारे जीवन में जीवित हैं।

पितृ पक्ष क्यों?

अब तुम पूछ सकते हो—अगर वे हमारे जीवन में स्मृतियों के रूप में मौजूद हैं, तो फिर पितृ पक्ष मनाने की जरूरत क्या है?

भारत की बहुत पुरानी परंपरा में मनुष्य को अकेला व्यक्ति नहीं माना गया। वह अपने माता-पिता, दादा-दादी, परदादा-परदादी और उनसे भी पहले की अनगिनत पीढ़ियों से जुड़ी एक लम्बी श्रृंखला की कड़ी है।

पितृ पक्ष उसी संबंध को याद करने का समय है।

इन दिनों लोग अपने पूर्वजों को जल अर्पित करते हैं, उनके लिए प्रार्थना करते हैं, भोजन अर्पित करते हैं और उन्हें श्रद्धा से याद करते हैं। इन कर्मकांडों के पीछे अलग-अलग धार्मिक मान्यताएँ हैं। कुछ लोग उनमें विश्वास करते हैं, कुछ उन्हें प्रतीक के रूप में देखते हैं और कुछ लोग इन अनुष्ठानों को नहीं करते।

लेकिन इन सबके पार एक बहुत सरल और बहुत मानवीय भावना है—कृतज्ञता।

संस्कृत में एक बहुत सुंदर वाक्य है:

“मातृदेवो भव। पितृदेवो भव।”

अर्थात्—अपनी माता को देवतुल्य मानो, अपने पिता को देवतुल्य मानो।

मैं इसे इस तरह समझता हूँ कि हमारे माता-पिता हमारे लिए कोई अलौकिक व्यक्ति नहीं होते। वे भी हमारी तरह मनुष्य होते हैं—अपनी खूबियों और कमियों के साथ। लेकिन हमारे जीवन में उनका योगदान इतना मूलभूत होता है कि उसके प्रति केवल एक साधारण “धन्यवाद” शायद पर्याप्त नहीं लगता।

इसीलिए भारतीय परंपरा ने स्मरण को एक संस्कार बना दिया।

श्राद्ध शब्द का संबंध श्रद्धा से है। और श्रद्धा का अर्थ केवल किसी धार्मिक विश्वास को मान लेना नहीं है। इसमें सम्मान है, स्मरण है और कृतज्ञता है।

इसलिए मैं चाहता हूँ कि तुम पितृ पक्ष को केवल एक धार्मिक अनुष्ठान के रूप में न देखो। इसे एक अवसर की तरह देखो—यह याद करने का अवसर कि हम अकेले अपने बल पर यहाँ तक नहीं पहुँचे हैं।

हमारी जड़ें दिखाई नहीं देतीं

पार्थ और वेद तो अमेरिका में पैदा हुए और वहीं बड़े हो रहे हो। वियांका भी शायद पढ़ने के लिए अमेरिका ही चली जाए और संभव है वह भी तुम्हारी तरह वहीं बस जाए। इसलिए तुम्हारी दुनिया मुझसे और मेरे माता-पिता की दुनिया से बहुत अलग है। यह स्वाभाविक भी है।

लेकिन चाहे हम दुनिया के किसी भी कोने में रहें, हमारी कुछ जड़ें हमारे साथ चलती हैं। एक पेड़ अपनी जड़ों को देख नहीं सकता। फिर भी वही जड़ें उसे खड़ा रखती हैं।

मनुष्य भी कुछ ऐसा ही है।

हम अपने पूर्वजों को शायद रोज याद नहीं करते। उनके बारे में हमें सब कुछ मालूम भी नहीं होता। लेकिन उन्होंने जो कुछ हमें दिया—हमारे संस्कार, हमारी भाषा, हमारे मूल्य, हमारे परिवार की कहानियाँ, हमारी जीवन-दृष्टि—उसका कोई न कोई अंश हमारे भीतर रहता है।

और विरासत का अर्थ केवल कुछ प्राप्त करना नहीं है। विरासत का अर्थ है उसे आगे पहुँचाना।

इसलिए तुम्हारे परदादा की तीन बातें—Intelligence, Industry and Integrity—मैं तुम्हें इसलिए नहीं बता रहा कि तुम्हें कोई पारिवारिक परीक्षा देनी है। मैं इसलिए बता रहा हूँ कि तुम्हें पता रहे कि तुमसे पहले आने वाली पीढ़ी अपने जीवन में किन बातों को महत्वपूर्ण मानती थी।

और तुम्हारी परदादी की ममता को याद करने का अर्थ यह है कि तुम समझो कि प्रेम भी एक विरासत होता है। उसे लिखा नहीं जाता, मापा नहीं जाता, बैंक में जमा नहीं किया जाता। लेकिन वह पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलता है।

अब तुम्हारी बारी है

एक दिन, बहुत वर्षों बाद, शायद तुम अपने बच्चों को मेरे बारे में बताओगे।

तब मैं भी शायद तुम्हारे लिए एक कहानी बन चुका होऊँगा।

मैं चाहूँगा कि उस दिन तुम उन्हें केवल यह न बताओ कि तुम्हारे दादू कैसे थे। उन्हें यह भी बताना कि तुम्हारे परदादा कौन थे और तुम्हारी परदादी कैसी थीं।

यही तो परिवार की स्मृति है।

एक पीढ़ी दूसरी को अपना अतीत सौंपती है, ताकि अगली पीढ़ी अपने भविष्य को थोड़ा अधिक समझ सके।

मेरे लिए इस पितृ पक्ष का यही सबसे बड़ा अर्थ है।

मैं अपने माता-पिता को याद करता हूँ। उनके प्रति कृतज्ञ होता हूँ। और यह सोचता हूँ कि आज मैं जो कुछ हूँ, उसमें मेरे अपने प्रयास से कहीं अधिक उनके संस्कार, उनका विश्वास, उनका त्याग और उनका प्रेम शामिल है।

मैं उन्हें कुछ लौटा नहीं सकता।

लेकिन शायद उनकी दी हुई चीजों को सँभालकर तुम्हें सौंप सकता हूँ।

यही मेरा श्राद्ध है।
यही मेरी श्रद्धांजलि है।
और शायद यही तुम्हारे परदादा और परदादी को याद करने का सबसे सुंदर तरीका भी।

बहुत सारा प्यार,

तुम्हारा
दादू

Published by udaykumarvarma9834

Uday Kumar Varma, a Harvard-educated civil servant and former Secretary to Government of India, with over forty years of public service at the highest levels of government, has extensive knowledge, experience and expertise in the fields of media and entertainment, corporate affairs, administrative law and industrial and labour reform. He has served on the Central Administrative Tribunal and also briefly as Secretary General of ASSOCHAM.

Leave a comment