विभीषण होना आसान नहीं, भीष्म होना शायद और भी दुष्कर 

जीवन के उत्तरार्ध में चिंतन-मनन का समय मिल जाता है और नितांत वैयक्तिक विषयों से इतर, उनसे हटकर, व्यापक प्रश्नों को समझने की कोशिश भी अच्छी लगती है. रामायण और महाभारत के पात्र और उनके चरित्र सहज ही विचारों में अक्सर उभरते हैं. 

कुछ समय से एक प्रश्न मन में उठ रहा है और जितना सोचता हूँ, उतना ही उलझता जाता हूँ। प्रश्न कर्तव्य और धर्म के पारस्परिक संबंध और उसमे अंतर्निहित द्वंद का है और यह बिभीषण और भीष्म के चरित्रों के माध्यम से प्रस्तुत होता है. त्रेता के विभीषण और द्वापर के भीष्म—दोनों जानते थे कि उनका अपना पक्ष धर्म के प्रतिकूल है और अन्याय कर रहा है, लेकिन दोनों ने लगभग समान परिस्थितियों में नितांत विरोधी मार्ग अपनाया. क्यों?

त्रेता का विभीषण और द्वापर का भीष्म—दोनों के सामने अपने-अपने प्रियजनों और अपने पक्ष के आचरण का प्रश्न था। दोनों जानते थे कि बहुत कुछ गलत हो रहा है। लेकिन दोनों ने अपनी दुविधा के समाधान का इतना विरोधाभासी रास्ता क्यों चुना?

विभीषण ने रावण को समझाया। अकेले में नहीं, सभा में; एक बार नहीं, बार-बार। उन्होंने कहा कि सीता का हरण अधर्म है और राम से युद्ध विनाश को आमंत्रण देना है। रावण ने उनकी बात नहीं मानी, उलटे उनका अपमान किया। तब विभीषण ने लंका छोड़ दी और राम की शरण में चले गए।

उन्होंने भाई को छोड़ा, राज्य छोड़ा, अपना पक्ष छोड़ा—लेकिन क्या उन्होंने धर्म छोड़ा?

फिर भी हमारी लोकस्मृति में विभीषण का नाम आते ही ‘घर का भेदी’ याद आता है। एक ऐसा व्यक्ति जिसने अपने ही भाई का साथ छोड़ दिया और शत्रु के पाले में चला गया।

द्वापर में आते हैं भीष्म।

वे दुर्योधन के प्रशंसक नहीं थे। वे उसके हर निर्णय से सहमत भी नहीं थे। वे जानते थे कि पांडवों के साथ अन्याय हुआ है। द्रौपदी के अपमान का प्रसंग भी उनकी आँखों के सामने था। उन्होंने कई अवसरों पर दुर्योधन को समझाया भी । लेकिन जब निर्णायक क्षण आया, तो उन्होंने हस्तिनापुर की अपनी प्रतिज्ञा और उसके सिंहासन के प्रति अपनी निष्ठा को नहीं छोड़ा। वे कौरव पक्ष की ओर से युद्धभूमि में उतरे।

विभीषण ने अधर्म और अन्याय के विरोध में अपना पक्ष छोड़ दिया। भीष्म ने अन्याय को जान कर  भी अपना पक्ष नहीं छोड़ा। फिर हमारी स्मृति में विभीषण संदेह के पात्र और भीष्म आदर के पात्र क्यों हैं?

क्या इसका कारण यह है कि हम निष्ठा को धर्म से भी ऊपर मानते हैं?

हमारे संस्कार में निष्ठा एक बड़ा गुण है—माता-पिता के प्रति, परिवार के प्रति, मित्र के प्रति, संस्था के प्रति, अपने वचन के प्रति। भीष्म इसी निष्ठा के चरम प्रतीक हैं। उन्होंने एक प्रतिज्ञा की और उसे जीवन के अंतिम क्षण तक निभाया।

तब भी जब यह निष्ठा, यह कर्तव्य, यह प्रतिज्ञा धर्म के विपरीत हो?

क्या कर्तव्य को पालन फिर सर्वोच्च धर्म होता है?

यदि किसी व्यक्ति के प्रति हमारा कर्तव्य हमें उसके अन्याय का सहभागी बना दे, तो क्या उस कर्तव्य को निभाना तब  भी धर्म है? यदि किसी संस्था के प्रति हमारी निष्ठा हमें उसके गलत काम के विरुद्ध बोलने से रोक दे, तो क्या निष्ठा तब भी धर्मसम्मत है? और यदि हमारी कोई पुरानी प्रतिज्ञा हमें उस क्षण के न्याय के विरुद्ध खड़ा कर दे, तो क्या प्रतिज्ञा निभाना ही धर्म है?

शायद भीष्म की महानता और उनकी त्रासदी दोनों यहीं अन्तर्निहित है वे अधर्म से अनजान नहीं थे; लेकिन वे अपने कर्तव्य की ऐसी व्याख्या में बँधे थे जिसमें उससे अलग होना लगभग असंभव हो गया था। उनकी समस्या यह नहीं थी कि उन्हें सही और गलत का बोध नहीं था। समस्या उनकी यह थी कि सही को जानकार भी उसके पक्ष में खड़े होने का साहस उन्हें अपनी प्रतिज्ञा की अवमानना प्रतीत हुई.

विभीषण ने दूसरी राह चुनी। लेकिन उनकी राह भी आसान नहीं थी। अपने भाई को छोड़ना, अपने लोगों के बीच से निकलना और उस व्यक्ति की शरण में जाना जिसे कल तक शत्रु मानते थे—इसके लिए केवल धर्मबोध नहीं, साहस भी चाहिए था। और उसके बाद भी उन्हें संदेह की दृष्टि से देखा गया।

तो क्या विभीषण सही थे और भीष्म गलत?

मेरे पास इस प्रश्न का कोई उत्तर नहीं है.

शायद रामायण और महाभारत हमें इस अंतर को समझने के लिए दो अलग संसार देते हैं। रामायण में मर्यादा की रेखाएँ अपेक्षाकृत स्पष्ट हैं। महाभारत उस संसार में ले जाता है जहाँ धर्म अनेक परस्पर टकराते कर्तव्यों के बीच फँस जाता है। वहाँ कोई व्यक्ति पूरी तरह धर्म का और कोई पूरी तरह अधर्म का प्रतीक नहीं रह जाता। भीष्म इसी जटिलता के सबसे मार्मिक पात्रों में हैं।

शायद इसलिए प्रश्न यह नहीं होना चाहिए कि विभीषण श्रेष्ठ थे या भीष्म? प्रश्न होना चाहिए कि जब कर्तव्य और धर्म आमने-सामने खड़े हों, तब मनुष्य किसे चुने?

यह प्रश्न केवल पुराणों का नहीं है। जीवन में ऐसे क्षण आते हैं—परिवार में, संबंधों में, संस्थाओं में, पेशे में—जब हमारा अपेक्षित कर्तव्य और हमारी अंतरात्मा की आवाज अलग-अलग दिशाओं में हमें खींचते हैं तब परीक्षा केवल साहस की नहीं होती; विवेक की भी होती है।

क्या हमें विभीषण का अनुगमन करना चाहिए या भीष्म की राह चुननी चाहिए? या फिर उस  उस विवेक की तलाश करनी चाहिए जो यह पहचान सके कि कब निष्ठा धर्म की रक्षा कर रही होती है और कब वही निष्ठा अधर्म की ढाल बन जाती है।

मेरा प्रश्न शून्य में गूँज कर अनुत्तरित ही लौट आता है.

Published by udaykumarvarma9834

Uday Kumar Varma, a Harvard-educated civil servant and former Secretary to Government of India, with over forty years of public service at the highest levels of government, has extensive knowledge, experience and expertise in the fields of media and entertainment, corporate affairs, administrative law and industrial and labour reform. He has served on the Central Administrative Tribunal and also briefly as Secretary General of ASSOCHAM.

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