आज जन्माष्टमी है.
सनातन धर्म के अवतारों में कृष्ण का स्थान अप्रतिम और अद्वितीय है। और सबसे रहस्यमय भी। इस अवतार को हम अक्सर पूर्ण अवतार मानते हैं क्योंकि मानते हैं कि कृष्ण सभी सोलह कलाओं से युक्त थे।
हर वर्ष कृष्ण के बारे में आज जब सोचने और फिर कुछ लिखने बैठता हूँ तो लगता है कि इस बार शायद उनके बारे में कुछ अलग कह पाऊँगा। फिर कुछ ही देर में लगता है कि कृष्ण के बारे में नया कहना संभव ही कहाँ है? जितना लिखा गया, जितना गाया गया, जितना कहा और सुना गया, उसके बाद भी कृष्ण समाप्त नहीं होते- “हरि अनंत, हरि कथा अनंता”. शायद इसलिए कि कृष्ण कोई एक कथा नहीं हैं। वे एक ऐसी उपस्थिति हैं जिसमें मनुष्य अपने समय, अपने प्रश्न और अपने भीतर की असहजता ओर व्यथा —सबका कोई न कोई उत्तर खोज सकता है।
इस बार मन कृष्ण के चरित्र पर नहीं, उनके वर्ण पर ठहर गया है।
कृष्ण का नाम शायद इसलिए कृष्ण था क्योंकि वे कृष्ण वर्ण के थे. संस्कृत में कृष्ण का अर्थ श्याम, गहरा, अंधकारमय भी है। किंतु कृष्ण का शाब्दिक अर्थ काला होने से कहीं अधिक व्यापक है. हमारे कवियों ने उन्हें केवल काला नहीं कहा। जयदेव ने तो उन्हें नील कलेवर कह कर पुकारा, ‘चंदन चर्चित नील कलेवर, पीत वसन वनमाली ‘ , ऐसा था जयदेव का वर्णन. और विष्णु की स्तुति में उन्हें मेघवर्ण पुकारा गया, ‘शान्तकाराम कमलनयनम् ….मेघ वर्णम शुभांगम’ -तो कृष्ण साँवले तो थे लेकिन उनका सांवलापन अनोखा था और अद्भुत भी. इसलिए कई उन्हें नील कृष्ण भी कहते हैं. गहरे आकाश की, या अगाध सागर की जो नीलिमा होती है ऐस वर्ण था उनका. कृष्ण का श्याम रंग शायद काले और नीले के बीच का वह अनिर्वचनीय रंग है जिसे शब्द पूरी तरह पकड़ नहीं सकते—जैसे वर्षा से भरा हुआ बादल, जैसे गहरा समुद्र, जैसे रात का आकाश।
लेकिन प्रश्न फिर भी बना रहता है—ईश्वर ने अपने इस अवतार के लिए यही रंग क्यों चुना? और अपने समसामयिक पात्रों को शुभ्र- श्वेत होने का वरदान क्यों दिया, इसकी व्याख्या कहीं पढ़ने में नहीं आती. कोई आधिकारिक रूप से नहीं कह सकता कि कंस, या जरासंध, या दुर्योधन कृष्ण वर्णी थे. तो यह रंग, ऐसा कलेवर तो उन्होंने कुछ कारणवश ही तो चुना होगा. मेघ की गंभीरता, समुद्र और आकाश की निस्सीमता का प्रतिबिंब उनके वर्ण का एक स्पष्टीकरण तो है लेकिन सम्पूर्ण व्याख्या नहीं. मैं अनभिज्ञ हो सकता हूँ लेकिन यह भी संभव है कि इस आयाम की जानकारी प्रचलित और उपलब्ध नहीं हो.
हमारे भीतर रंगों के प्रति एक मनोवृत्ति है। उजला हमें प्रकाश, पवित्रता और सौंदर्य का संकेत देता है; अंधकार को हम प्रायः भय, अज्ञान और नकारात्मकता से जोड़ते हैं। कृष्ण इस सहज धारणा को चुपचाप उलट देते हैं। वे श्याम हैं और सुन्दर भी—श्यामसुन्दर।
शायद इसमें एक बहुत गहरी बात छिपी है।
अंधकार हमेशा प्रकाश का अभाव नहीं होता। कभी-कभी वह गहराई का दूसरा नाम होता है। आकाश जितना गहरा होता है, उतना ही अनंत दिखाई देता है। समुद्र जितना गहरा होता है, उतना ही उसका तल हमारी दृष्टि से ओझल होता जाता है। मेघ जितना घना होता है, उसमें उतनी ही अधिक वर्षा की संभावना होती है। कृष्ण का श्याम रंग शायद इसी अगाधता का रंग है—जिसे देखा जा सकता है, पर पूरी तरह जाना या समझा नहीं जा सकता।
और कृष्ण स्वयं भी तो ऐसे ही हैं।
एक और अर्थ में कृष्ण अन्य अवतारों से भिन्न थे। उनके बहुत से चमत्कारों को मानव बुद्धि और विवेक के सुन्दर उपयोग का दृष्टांत माना जा सकता है। उनके चरित्र का मानवीय पक्ष बहुत स्पष्ट और सबल था। दैवीय पक्ष उनके महामानव होने की पुष्टि भर करता था। कन्हैया लाल माणिकलाल मुंशी के कई खंडों में लिखी गई अत्यंत रोचक किताब-‘बंसी की धुन’ उनके अत्यंत प्रतिभासंपन्न और बुद्धिमान होने की गाथा है जो उनके कई चमत्कारों को मानवीय क्षमता की सीमा में स्थापित करती है।इस अर्थ में कृष्ण हम सब से बहुत निकट लगते हैं।
उन्हें केवल ईश्वर कह दें तो उनका मानवीय पक्ष छूट जाता है। केवल मनुष्य मान लें तो उनकी विराटता समझ में नहीं आती। वे बालक हैं, मित्र हैं, प्रेमी हैं, सारथी हैं, कूटनीतिज्ञ हैं, योद्धाओं के मार्गदर्शक हैं और अंततः वह वाणी हैं जो कुरुक्षेत्र के बीच खड़े विषादग्रस्त अर्जुन को जीवन का अर्थ समझाती है।
शायद इसीलिए कृष्ण का आकर्षण इतना असाधारण है। वे हमें किसी एक आदर्श की चौखट में खड़ा नहीं करते। वे हमें बताते हैं कि जीवन स्वयं सरल नहीं है, इसलिए धर्म की समझ भी केवल नियमों की सूची नहीं हो सकती। परिस्थितियाँ बदलती हैं, दुविधाएँ बदलती हैं, कर्तव्य बदलते हैं—लेकिन विवेक, करुणा और लोकमंगल की आवश्यकता नहीं बदलती।
कृष्ण की सबसे बड़ी शिक्षा शायद यही है कि जीवन को उसकी जटिलता सहित स्वीकार करना चाहिए, उससे भागना नहीं चाहिए। गीता इसी स्वीकार से जन्म लेती है। युद्धभूमि से कोई पलायन नहीं; उसके बीच खड़े होकर मन को स्थिर करने का प्रयत्न। कर्म करना है, लेकिन कर्म के फल का दास नहीं बनना है। संबंध निभाने हैं, लेकिन मोह में विवेक नहीं खोना है। कठिन निर्णय लेने हैं, लेकिन अपने भीतर की शांति को नष्ट नहीं होने देना है।
इस दृष्टि से कृष्ण का श्याम रंग उनके व्यक्तित्व का भी रूपक बन जाता है। उसमें प्रकाश भी है और अंधकार भी, उल्लास भी और गंभीरता भी, प्रेम भी और युद्ध भी, बाँसुरी भी और सुदर्शन भी। शायद सम्पूर्णता ऐसी ही होती है—वह केवल उजली नहीं होती।
इस जन्माष्टमी मुझे लगता है कि कृष्ण को देखने के लिए मंदिर जाना शायद आवश्यक है, लेकिन उन्हें समझने के लिए अपने भीतर उतरना तो निःसंदेह आवश्यक है। बाहर हम जिस श्यामसुन्दर की पूजा करते हैं, उसका एक अंश हमारे भीतर भी है—हमारी अपनी उलझनों, असमंजसों, इच्छाओं, भय और आशाओं के बीच।
कृष्ण का श्याम रंग शायद हमें यही याद दिलाता है कि हर अंधकार के भीतर प्रकाश खोजने की आवश्यकता नहीं होती। कभी-कभी उस अंधकार की गहराई को समझना ही प्रकाश की शुरुआत होती है।
तो इस जन्माष्टमी हम क्या करें? बहुत कुछ और कुछ भी नहीं. समारोह होंगे और कृष्ण के जन्म से जुड़े इन समारोहों की पवित्रता और ऊर्जा किसी न किसी रूप में हम तक ज़रूर पहुंचेगी. लेकिन कृष्ण के चरित्र को यदि एक असाधारण मानव की लीलाओं के परिप्रेक्ष्य में समझा जा सके तो शायद हम अपने जीवन की दुविधाओं, द्वन्दों, और दुश्वारिओं को कहीं अधिक समझ और संकल्प से झेल भी पाएंगे और हल भी कर पाएंगे.
आज जन्माष्टमी पर उस श्यामसुन्दर को नमन—जो जितना हमारे आराध्य हैं, उतना ही हमारे सहयात्री भी।
जन्माष्टमी की हार्दिक मंगलकामनाएं!