कांवड़: आस्था की अनोखी यात्रा 

आज श्रावण मास का तीसरा सोमवार है। वैसे तो श्रवण मास में शिव मंदिरों में भीड़ उमड़ती ही है लेकिन सोमवार तो भगवान शिव का दिन है और इसलिए आज भीड़ कुछ ज़्यादा ही है। और जब भीड़ अनियंत्रित हो जाती है तो दुर्घटनाएं भी होती हैं, जिनमे लोग जान गँवाते है। अधैर्य और आवेश जब श्रद्धा और भक्ति पर हावी हो जायें तो इसकी क़ीमत लोग चुकाते हैं और शायद चुकाते रहेंगे, हम यही देखते आ रहे हैं।

लेकिन इस भीड़ से इतर भी कुछ ऐसा है श्रवण मास में, जो इसे अलग बना देता है।

पिछले दशक से कुछ पहले से ही, श्रावण का महीना आते ही उत्तर भारत की सड़कों पर एक अलग ही दृश्य दिखाई देने लगता है। भगवा वस्त्र पहने, कंधों पर कांवड़ उठाए, “बम-बम भोले” और “हर-हर महादेव” का उद्घोष करते हुए हजारों-लाखों लोग अपने गंतव्य की ओर बढ़ते दिखाई देते हैं। यह केवल एक धार्मिक यात्रा नहीं रह गई है; यह अब भारत के सबसे बड़े वार्षिक जन-आयोजनों में से एक है। प्रश्न यह है कि इसकी जड़ें कहाँ हैं और यह परंपरा इतनी विराट कैसे हो गई?

कांवड़िये मूलतः वे शिवभक्त हैं जो किसी पवित्र नदी, विशेषकर गंगा, से जल लेकर उसे अपने स्थानीय शिव मंदिर में अर्पित करते हैं। कांवड़—एक डंडे के दोनों सिरों पर लटके जलपात्र—इस यात्रा का प्रतीक है। हरिद्वार, गंगोत्री और गौमुख के अतिरिक्त बिहार का सुल्तानगंज भी इसका एक प्रमुख केन्द्र है, जहाँ से श्रद्धालु गंगाजल लेकर लगभग 109 किलोमीटर पैदल देवघर के बाबा बैद्यनाथ धाम तक जाते हैं। कुछ लोग मानते हैं कि कांवड़ परंपरा यहीं से उद्भूत हुई.

इस परंपरा के धार्मिक अर्थ को समुद्र-मंथन की पौराणिक कथा से जोड़ा जाता है। मान्यता है कि समुद्र-मंथन से निकले विष को शिव ने अपने कंठ में धारण किया और देवताओं ने उनके कंठ की जलन शांत करने के लिए गंगाजल अर्पित किया। श्रावण में शिव को जल चढ़ाने की परंपरा इसी धार्मिक स्मृति से जुड़ी मानी जाती है। अब प्रश्न यह है कि भगवान शिव पर चढ़ रही इन असंख्य जल धाराओं से समाज का विष कितना शांत हो रहा है?

इतिहास और आस्था को पर्याय मानना अक्सर सही नहीं होता. कांवड़ यात्रा के वर्तमान स्वरूप के अत्यंत प्राचीन होने की पुष्टि आधिकारिक रूप में तो होती नहीं दिखती. हाँ, 18वीं शताब्दी में सुल्तानगंज से देवघर तक गंगाजल ले जाने की परंपरा अवश्य प्रमाणित है. लंबे समय तक यह अपेक्षाकृत सीमित धार्मिक अभ्यास था। इसका व्यापक विस्तार विशेष रूप से 1980 और 1990 के दशकों के बाद हुआ। बेहतर सड़क और परिवहन व्यवस्था, बढ़ती आय, धार्मिक संगीत और संचार माध्यमों का प्रसार तथा बदलते सामाजिक-राजनीतिक वातावरण ने इसके विस्तार को गति दी।

आज यह विस्तार चौंका देने वाला है। 2025 में लगभग 4.5 करोड़ कांवड़िये केवल हरिद्वार पहुँचे थे; 2026 में यह संख्या अबतक लगभग 4.8 करोड़ बताई गई है —एक नया रिकॉर्ड। इतनी बड़ी संख्या अपने आप में इसे एक धार्मिक यात्रा से कहीं व्यापक आभा प्रदान कर इसे एक विशाल, अद्भुत, और अप्रतिम सामाजिक और प्रशासनिक आयोजन के रूप में स्थापित करता है।

इसके सकारात्मक पक्ष बहुतेरे हैं। कांवड़ यात्रा अनुशासन, सामूहिकता, त्याग और आस्था का अनुभव अनेक लोगों के लिए उदात्त और विलक्षण बना देती है। रास्ते में लगने वाले सेवा शिविर, भोजन और पानी की व्यवस्था तथा अनजान लोगों द्वारा यात्रियों की सहायता भारतीय समाज की सामुदायिक भावना एवं एकरसता का सुंदर उदाहरण हैं। गरीब और साधारण परिवारों के अनेक युवा भी इस यात्रा में अपनी धार्मिक पहचान और सामाजिक जुड़ाव स्थापित करने का अवसर मानते हैं.

यह भी स्वीकार करना होगा कि कांवड़ यात्रा केवल भीड़ का हिस्सा बनकर चल पड़ने का नाम नहीं है। अनेक कांवड़िये सैकड़ों किलोमीटर की कठिन पदयात्रा, तपती धूप, अघोषित वर्षा, थकान और अनेक शारीरिक कष्ट स्वेच्छा से सहते हैं। इस कष्ट को श्रद्धा और संकल्प के साथ स्वीकार करने में एक ऐसी आस्था और इच्छाशक्ति निश्चय ही है, जिसे सम्मान की दृष्टि से देखना चाहिए।

कांवड़ के दोनों सिरों पर लटके जलपात्रों में एक सुंदर प्रतीक भी देखा जा सकता है—मानो वे मनुष्य के अंतर्मन और बहिर्मन के दो छोर हों। उनके बीच कांवड़िया स्वयं एक साधक की तरह चलता है, अपनी आस्था, अनुशासन और समर्पण से दोनों को संतुलित रखने का प्रयत्न करता हुआ। शायद इसी में इस यात्रा का सबसे सुंदर मानवीय अर्थ छिपा है: बाहर की यात्रा जितनी कठिन हो, भीतर का संतुलन उतना ही आवश्यक है। अंतर्मन और बहिर्मन का सुंदर समन्वय इस यात्रा को अद्वितीय सार्थकता प्रदान कर सकता  है.

लेकिन इस पूरे आयोजन के और भी आयाम हैं. लाखों लोगों की आवाजाही का अर्थ है सड़कों का बंद होना, यातायात पर भारी दबाव, शोर, कूड़ा और स्थानीय निवासियों के दैनिक जीवन में व्यवधान। 2026 में दिल्ली-हरिद्वार मार्ग पर विशेष यातायात प्रतिबंध लगाने पड़े। हरिद्वार में इस वर्ष अब तक लगभग 8,000 टन कचरा जमा होने की रिपोर्ट भी सामने आई है।

यह सही है कि आस्था को सुविधा की कसौटी पर नहीं परखा जा सकता, लेकिन सार्वजनिक जीवन में आस्था के साथ उत्तरदायित्व भी जुड़ा होना चाहिए। जिस यात्रा का मूल भाव तपस्या, संयम और शिव के प्रति समर्पण है, क्या उसके आधुनिक रूप को भी उसी संयम को प्रतिबिंबित नहीं करना चाहिए?

कई लोग कभी कभी कांवड़ यात्रा को रोकने की बात करते हैं। कांवड़ यात्रा को रोकना  समाधान तो नहीं ही है, और आवश्यक तो कदापि नहीं. आवश्यकता इस बात की है कि इसे बेहतर ढंग से आयोजित किया जाए—निर्धारित मार्ग, स्वच्छता की अचूक व्यवस्था, ध्वनि-नियमन, आपातकालीन गलियारों की सुरक्षा और स्थानीय नागरिकों के लिए पर्याप्त वैकल्पिक यातायात व्यवस्था के साथ। सबसे बढ़कर, स्वयं कांवड़ियों के भीतर यह भावना और यह अनुशासन विकसित हो कि शिव को जल चढ़ाने वाली यात्रा तभी सचमुच पवित्र है, जब वह रास्ते में किसी और के जीवन को दूषित या बाधित न करे।

कांवड़ कंधों पर वहन किए जा रहे पवित्र जल के कुंभ ही नहीं हैं. ये आस्था और समर्पण के गरिमा से उठाये हुए भार हैं।  और शायद सच्ची आस्था और समर्पण की, निष्कलुष भक्ति की, पहचान यही है कि हम इस  भार को उठाते हुए दूसरों के अधिकारों का भार, और उनके कल्याण का दायित्व भी अपने कंधों पर महसूस कर सकें.

Published by udaykumarvarma9834

Uday Kumar Varma, a Harvard-educated civil servant and former Secretary to Government of India, with over forty years of public service at the highest levels of government, has extensive knowledge, experience and expertise in the fields of media and entertainment, corporate affairs, administrative law and industrial and labour reform. He has served on the Central Administrative Tribunal and also briefly as Secretary General of ASSOCHAM.

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