आज गुरु पूर्णिमा है—गुरुओं के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने, उनके महत्त्व पर विचार करने और अपने जीवन में उनके स्थान को समझने का दिन। जिनके गुरु आज उनके साथ नहीं हैं, उनके लिए यह स्मृतियों का पर्व है; और जो सौभाग्यशाली हैं और जिन्हें आज भी गुरु का सान्निध्य प्राप्त है, उनके लिए यह अपने गुरुओं की वंदना का सुअवसर।
पर उन लोगों का क्या, जिनमें मैं भी शामिल हूँ, जिन्हें अभी तक गुरु मिले ही नहीं? आज हम किसका स्मरण करें, किससे प्रेरणा लें?
पिछले पाँच दशकों से मेरी खोज चल रही है। जब से गुरु की भूमिका को समझना प्रारम्भ किया, तब से हर गुरु पूर्णिमा पर मैं स्वयं से यही प्रश्न पूछता हूँ—क्या मेरी यह तलाश कभी पूरी होगी? कहते हैं कि जितनी तलाश शिष्य को गुरु की होती है, उतनी ही तलाश गुरु को भी अपने योग्य शिष्य की होती है। स्वामी विवेकानंद और श्रीरामकृष्ण परमहंस के संदर्भ में अक्सर यह बात कहीं जाती है. शायद मुझे नियति द्वारा नियत उस समय की प्रतीक्षा करनी चाहिए.
गुरु और शिक्षक में अंतर है। हर शिक्षक गुरु नहीं होता, यद्यपि वह अत्यंत विद्वान, समर्पित और प्रेरणादायी हो सकता है। मुझे अपने जीवन में अनेक ऐसे शिक्षक मिले जिनके प्रति मैं आज भी गहरी श्रद्धा अनुभव करता हूँ। उन्होंने मुझे ज्ञान दिया, अनुशासन दिया और व्यक्तित्व को आकार दिया। मैं जो कुछ भी हूँ, उसमें उनका बड़ा योगदान है।
फिर भी गुरु का अर्थ इससे कहीं व्यापक है। शिक्षक विषय पढ़ाता है; गुरु जीवन पढ़ाता है। शिक्षक बुद्धि को समृद्ध करता है; गुरु चेतना को जागृत करता है। शिक्षक उत्तर देता है; गुरु सही प्रश्न पूछना सिखाता है। शिक्षक हमें आजीविका के योग्य बनाता है, गुरु जीवन के योग्य।
कभी-कभी यह भी सोचता हूँ कि शायद मैं गुरु को बहुत सीमित अर्थों में खोज रहा हूँ। हमारी परम्परा में भगवान दत्तात्रेय ने तो चौबीस गुरु स्वीकार किए थे—पृथ्वी से धैर्य सीखा, जल से निर्मलता, आकाश से विस्तार, अग्नि से पवित्रता, मधुमक्खी से परिश्रम और बालक से निष्कपटता। तब क्या गुरु केवल कोई व्यक्ति होता है, या वह हर वह अनुभव भी हो सकता है जो हमें भीतर से बदल दे? यदि ऐसा है तो सम्भव है कि जीवन में अनेक बार गुरु हमारे सामने आए हों और हम उन्हें पहचान न सके हों।
शास्त्र यह भी कहते हैं कि जिसे कोई गुरु न मिले, वह भगवान शिव या भगवान कृष्ण को अपना गुरु मान ले। दक्षिणामूर्ति शिव को तो गुरु के सर्वोच्च स्वरूप के रूप में अवस्थित और प्रतिष्ठित किया गया है। और शिव तो अद्भुत गुरु हैं. उनका व्याख्यान तो मौन ही होता है लेकिन ऐसी निःशब्दता ज्ञान को प्रवाहित होने नहीं रोकती.
मौनव्याख्याप्रकटितपरब्रह्मतत्त्वं युवानं वर्षिष्ठान्ते वसदृशिगणैरावृतं ब्रह्मनिष्ठैः।
आचार्येन्द्रं कर्कलित्चिन्मुद्रमानन्दरूपं स्वात्मारामं मुदितवदं दक्षिणामूर्तिमीडे ॥
(जो मौन व्याख्या के द्वारा परम ब्रह्म के तत्व को प्रकट करते हैं, जो स्वयं युवा हैं किंतु जिनके समीप ब्रह्मनिष्ठ वृद्ध ऋषिगण बैठे हैं, जो ज्ञान मुद्रा (चिन्मुद्रा) धारण किए हुए हैं, और जो आनंद स्वरूप हैं, उन श्री दक्षिणामूर्ति की मैं वंदना करता हूँ।)
यह विचार मुझे आकर्षित करता है, पर साथ ही एक व्यावहारिक प्रश्न भी उठता है। यदि गुरु प्रत्यक्ष न हों तो शिष्य अपने गुरु-धर्म का पालन कैसे करे? उनके मौन संकेतों को कैसे पहचाने? किन्तु यदि यह साधना सम्भव हो सके, तो इससे श्रेष्ठ गुरु फिर कोई हो ही नहीं सकता। कहीं जाने की तब क्या आवश्यकता.
लेकिन शायद ऐसी बात करना आज के संदर्भ में बेमानी ही. यह Gen Z और Gen Alpha का समय है जहाँ कुछ भी सम्मान के योग्य नहीं है, न रिश्ते, न मानवीय संवेदनाएं क्योंकि यह पीढ़ी तो वह है जो स्वयं को श्रेष्ठतम मानती है. उनके लिए कोई शिक्षक नहीं और न ही कोई अभिभावक जो उनके श्रद्धा के योग्य हों. हाँ, Google गुरु अवश्य सम्मान के लायक हैं जो बिना कुछ भी मांगे सब कुछ दे देते हैं. अब यदि Google ही गुरु है, तो शिष्य-धर्म कैसे निभाया जाता होगा? क्या प्रतिदिन श्रद्धापूर्वक ‘सर्च’ करना ही गुरु-दक्षिणा है? क्या ‘Terms and Conditions’ को बिना पढ़े स्वीकार कर लेना आधुनिक गुरुमंत्र है? और यदि गुरु के प्रति पूर्ण समर्पण की अभिव्यक्ति यही है कि अपनी बुद्धि और अपने विवेक का ‘Auto Update’ पूरी तरह उसी के भरोसे छोड़ दें?
मुझे तो यही सिखाया गया है सूचना ज्ञान नहीं होता, और ज्ञान जब तक अन्तर्तर तक न उतरे वह प्रज्ञा नहीं बनता. सूचना बताती है कि कोई क्या है; ज्ञान समझाता है कि क्यों है; पर प्रज्ञा यह सिखाती है कि उसके साथ जीना कैसे है। गुरु का वास्तविक कार्य इसी अंतिम रूपांतरण में है। देखना यह है कि Google गुरु कब तक इस अंतिम रूपांतरण का soft ware विकसित कर लेता है.
एक और प्रश्न मन में उठता है। क्या सचमुच मुझे गुरु नहीं मिला, या मैं अभी तक शिष्य बनने की पात्रता ही अर्जित नहीं कर पाया? कहीं ऐसा तो नहीं कि मेरी दृष्टि ही अभी इतनी निर्मल नहीं हुई कि गुरु को पहचान सके? यदि पात्रता न हो, तो गुरु सामने होकर भी दिखाई नहीं देता। और यदि शिष्य तैयार हो जाए, तो शायद सम्पूर्ण सृष्टि ही गुरु बन जाती है।
इन्हीं प्रश्नों के साथ हर वर्ष गुरु पूर्णिमा आती है और चली जाती है। मेरी तलाश अभी भी जारी है, पर अब मैं गुरु से मिलने की प्रार्थना कम करता हूँ और अपने भीतर एक योग्य शिष्य को विकसित करने की अधिक। शायद जिस दिन ऐसा होगा, उस दिन मेरी खोज भी पूरी हो जाएगी। और यह भी सम्भव है कि उस दिन यह भी समझ में आ जाए कि गुरु भले ही भौतिक स्वरूप में साथ न हो, वह जीवन के हर अनुभव, हर संबंध, और हर संकेत, मुखर या मौन, के द्वारा हमारा मार्ग दर्शन करता रहा था।