एक मक़बरा जो प्रश्न पूछता है
दिल्ली से नोएडा की ओर डीएनडी एक्सप्रेस-वे से जाते हुए यमुना पार करने से कुछ पहले, सड़क के बाईं ओर एक गुम्बद अचानक दृष्टि को बाँध लेता है। न वह दिल्ली के प्रसिद्ध स्मारकों की सूची में सबसे ऊपर है, न पर्यटकों की पहली पसन्द। फिर भी उसमें एक विचित्र गरिमा है—ऐसी गरिमा जो कुछ दूर जाने के बाद भी मन को कुछ देर वहीं ठहरा देती है। यह अद्भुत तो नहीं है लेकिन असाधारण अवश्य हैं.
वह अब्दुल रहीम ख़ान-ए-ख़ाना का मक़बरा है।
वही रहीम, जिनके दोहे हमारे बचपन की पाठ्य-पुस्तकों का हिस्सा थे। वही रहीम, जिनके दोहे अभी भी हमारी स्मृति में क़ायम हैं, और जिन्होंने बहुत हद तक हमारी नैतिक अवधारणा और मूल्यों को स्थापित और परिभाषित भी किया है। हमने बचपन में रहीम के दोहे केवल याद नहीं किए; अनजाने में उन्हीं से जीवन के अनेक नैतिक संस्कार भी पाए।” ‘रहिमन पानी राखिए, बिन पानी सब सून’ या; रहिमन चुप ह्वे बैठिए देखि दिनन के फेर ‘ ; या फिर, ’रहिमन धागा प्रेम का मत तोरो चटकाय’…।यह सूची बहुत लंबी है।
लेकिन उस मक़बरे के सामने से हर बार गुज़रते हुए मेरे मन में दोहे तो आते हैं लेकिन कुछ प्रश्न भी उठते हैं
आख़िर यह व्यक्ति था कौन? तुर्क मूल का एक मुग़ल सेनापति? अकबर के नवरत्नों में से एक? फ़ारसी का विलक्षण विद्वान? संस्कृत का ज्ञाता? ब्रजभाषा का अमर कवि?
या शायद इन सबसे भी कहीं बड़ा—भारत की उस विलक्षण सांस्कृतिक क्षमता का साक्ष्य, जो बाहर से आने वालों को केवल विदेशी नहीं रहने देती, उन्हें अपनी आत्मा का अंश बना लेती है.
तो आइए समझते हैं इस शख़्सियत को।
एक विलक्षण जीवन की शुरुआत
यह तलाश केवल एक व्यक्ति की नहीं है; यह उस रहस्य की तलाश है कि मध्य एशिया की तुर्क परम्परा में जन्मा एक बालक ब्रजभाषा में अमर दोहे कैसे लिखने लगा? वह कृष्ण के प्रति इतनी आत्मीयता कहाँ से ले आया? फ़ारसी के शिखर का विद्वान लोकभाषा को क्यों अपनाता गया? और ऐसा क्या था भारत की मिट्टी में कि उसने साम्राज्य के सेनापति को लोक का कवि बना दिया?
रहीम का जन्म लाहौर में हुआ। उनके पिता बैरम ख़ाँ मुग़ल साम्राज्य के सबसे प्रभावशाली सेनानायकों और अकबर के संरक्षकों में थे। उनका वंश तुर्क था, लेकिन उनकी माता मेवात के खानज़ादा राजपूत परिवार से थीं। शायद यह वजह है कि रहीम के जीवन में दो संसारों का असामान्य संगम दिखता है—मध्य एशिया की राजनीतिक परम्परा का और भारत की सांस्कृतिक धरती का। रहीम के व्यक्तित्व में तुर्क रक्त और राजपूत मातृसंस्कार साथ-साथ बह रहे थे। शायद इसीलिए उनके भीतर संस्कृत सीखने और ब्रजभाषा में उतरने की स्वाभाविक संवेदना विकसित हुई।
भाग्य ने उनके बचपन को सहज नहीं रहने दिया। पाटन में बैरम ख़ाँ की हत्या हुई। बालक रहीम को अकबर के संरक्षण में लाया गया। बाद में अकबर ने उनकी सौतेली माता सलीमा सुल्तान बेगम से विवाह किया। इस प्रकार रहीम केवल दरबार में पले नहीं; वे स्वयं शाही परिवार का हिस्सा बन गए। आगे चलकर वे सेनापति बने, प्रान्तों के प्रशासक बने, कूटनीतिज्ञ बने और अन्ततः ‘ख़ान-ए-ख़ाना’—अर्थात् ‘ख़ानों के ख़ान’—की सर्वोच्च उपाधि से विभूषित हुए।
इतिहास यहाँ तक तो स्पष्ट दिखाई देता है, लेकिन उनके जीवन से जुड़े हुए एक अत्यंत रोचक आश्रित प्रश्न का उत्तर नहीं देता।
फ़ारसी का विद्वान, ब्रज का कवि, कृष्ण का भक्त
जिस व्यक्ति की शिक्षा फ़ारसी और तुर्की में हुई, जिसने बाबरनामा का चगताई तुर्की से फ़ारसी में अनुवाद किया हो , जिसने संस्कृत में ज्योतिष पर ग्रंथ लिखे, वही अपनी आत्मा की सबसे सहज अभिव्यक्ति ब्रजभाषा में क्यों खोजता है?
मुझे लगता है, इस प्रश्न का का उत्तर केवल भाषा में नहीं, उस युग के भारत में छिपा है।
और शायद रहीम की सबसे बड़ी पहेली यह भी नहीं है कि उन्होंने ब्रजभाषा में क्यों लिखा; उससे भी बड़ा प्रश्न यह है कि वे कृष्ण तक कैसे पहुँचे। आखिर एक तुर्क मूल का मुग़ल अमीर, साम्राज्य का सेनापति और फ़ारसी का उद्भट विद्वान वृन्दावन की उस मधुर दुनिया का आत्मीय कैसे बन गया, जहाँ बाँसुरी, यमुना, राधा और गोपियों की स्मृतियाँ लोकजीवन में घुली हुई थीं?
इसका उत्तर किसी एक घटना में नहीं, बल्कि उस युग की सांस्कृतिक चेतना में निहित है। सोलहवीं शताब्दी का उत्तर भारत भक्ति आन्दोलन के उत्कर्ष का काल था। वृन्दावन में वल्लभाचार्य और उनके उत्तराधिकारियों की परम्परा कृष्ण-भक्ति को नए सौन्दर्य और दर्शन के साथ प्रतिष्ठित कर रही थी; सूरदास की वाणी जन-जन तक पहुँच रही थी; ब्रजभाषा केवल एक बोली नहीं, भावों की भाषा बन चुकी थी। रहीम ने उस संसार को बाहर से नहीं देखा; वे उसमें प्रविष्ट हुए। उन्होंने कृष्ण को किसी दूसरे धर्म के देवता के रूप में नहीं, प्रेम, करुणा, सौन्दर्य और मानवीय संवेदना के सार्वभौम प्रतीक के रूप में अनुभव किया। संभवतः यही कारण है कि उनके दोहों में धर्म का आग्रह कम और जीवन का सत्य अधिक दिखाई देता है।
वे न तो अपनी फ़ारसी विद्वत्ता से दूर हुए, न अपनी इस्लामी सांस्कृतिक विरासत से; उन्होंने केवल अपने भीतर भारत के लिए एक और द्वार खोल दिया। शायद यही रहीम की सबसे बड़ी पहचान है—उन्होंने किसी एक परम्परा का परित्याग नहीं किया, बल्कि अनेक परम्पराओं को अपने व्यक्तित्व में इस प्रकार समाहित किया कि वे स्वयं भारतीय सांस्कृतिक समन्वय का एक जीवित प्रतीक बन गए।
दरबार फ़ारसी में बोलता था, पर भारत की आत्मा ब्रज, अवधी और लोकभाषाओं में गाती थी। रहीम ने दरबार की भाषा छोड़ी नहीं; पर उन्होंने जनता की भाषा भी अपना ली। शायद इसी निर्णय ने उन्हें अमर कर दिया।
विनम्रता का धर्म
रहीम के जीवन में एक और विलक्षण प्रसंग है। रहीम की दानशीलता प्रसिद्ध थी. और दान देते समय उनकी नज़रें झुकी रहती थीं. जब तुलसीदास ने सुना कि रहीम दान देते समय अपनी दृष्टि नीचे रखते हैं, तो उन्होंने एक दोहा लिख कर भेजा,
‘सीखी कहाँ नवाबज़ूँ देनी ऐसी देन,
ज्यों ज्यों कर ऊपर उठ्यो तेते नीचे नैन ‘
यह कैसी दानशीलता है? मैं अचंभित हूँ ,
रहीम का प्रत्युत्तर भारतीय आध्यात्मिक परम्परा का सर्वश्रेष्ठ मानक बन गया, उन्होंने जवाब भेजा,
‘देनहार कोई और है देवत है दिन रैन ,
लोग भरम हम पर करें ताते नीचे नैन ‘
दाता मैं नहीं हूँ; देने वाला कोई और है। लोग समझते हैं कि मैं दे रहा हूँ, इसलिए नज़रें झुका कर देता हूँ।
इस विनम्रता के, ऐसे श्रेष्ठ व्यवहार और नैतिक आचरण के बिरले ही कोई उदाहरण मिलेंगे.
युद्ध से ऊँची मर्यादा
श्रेष्ठ आचरण का ऐसा ही एक प्रसंग महाराणा प्रताप से भी जुड़ा है। युद्ध के बीच जब रहीम के परिवार की स्त्रियाँ बंदी बनाकर लाई गईं, तब प्रताप ने उन्हें सम्मान सहित वापस भेजने का आदेश दिया।
इस देश में इतिहास की तलवारें अक्सर टकराती रहीं हैं, लेकिन भारतीय मर्यादा उनसे मर्दित नहीं होतीं. हमारे यहाँ .युद्ध जीतना वीरता है; शत्रु की स्त्रियों का सम्मान करना सभ्यता है। उस दिन मेवाड़ ने केवल युद्ध नहीं लड़ा, भारत की आत्मा का परिचय भी दिया।
पत्नी का मक़बरा, स्वयं की समाधि
और फिर यह मक़बरा।
रहीम ने उसे अपने लिए नहीं बनवाया था। उसे उन्होंने अपनी प्रिय पत्नी की स्मृति में बनवाया था। बाद में वही उनका अंतिम विश्राम-स्थल बना। समय ने उसके संगमरमर उखाड़ लिए, उसकी दीवारों को घायल किया, उसे लगभग भुला दिया। फिर सदियों बाद उसी मक़बरे को धैर्यपूर्वक पुनर्जीवित किया गया। जैसे इतिहास ने स्वयं स्वीकार किया हो कि रहीम को भुलाया नहीं जा सकता।
रहीम क्यों याद रहेंगे
जब भी मैं उस मक़बरे के सामने से गुज़रता हूँ, अब मुझे वहाँ केवल एक मुग़ल अमीर की कब्र दिखाई नहीं देती। वहाँ मुझे भारत का एक दुर्लभ सत्य दिखाई देता है—कि यह देश केवल लोगों को अपने भीतर जगह नहीं देता; वह उन्हें बदल भी देता है।
शायद इसलिए रहीम आज केवल इतिहास के नहीं हैं। वे हिन्दी के भी हैं, संस्कृत के भी, फ़ारसी के भी, कृष्ण के भी, अकबर के भी, तुलसी के भी, और सबसे बढ़कर भारत के हैं।
और शायद इसी कारण, हर बार उस मक़बरे के सामने से गुज़रते हुए अनायास ही मुझे इस देश की अप्रतिम और असामान्य परंपराओं का एहसास होता है और स्मरण होता है ऐसे असाधारण व्यक्तित्व वाले महापुरुषों का.
और तब मन में यह प्रश्न भी उठता है, कहाँ गए ऐसे लोग?