उत्तरार्ध का धर्म

जीवन के प्रत्येक चरण का अपना एक धर्म होता है।

बाल्यावस्था का धर्म सीखना है। युवावस्था का धर्म सपने देखना और उन्हें पाने के लिए संघर्ष करना है। मध्यावस्था का धर्म परिवार, समाज और अपने कर्तव्य के प्रति उत्तरदायित्व निभाना है। परन्तु जीवन के उत्तरार्ध का धर्म क्या है?

यह प्रश्न मेरे मन में अक्सर उभरता है। शायद औरों के मन में भी उठता होगा।

हममें से अधिकांश ने जीवन की लंबी यात्रा तय कर ली है। जो प्राप्त होना था, उसका बहुत कुछ प्राप्त हो चुका है। शिक्षा मिली, अवसर मिले, सम्मान मिला। हममें से अनेक लोगों ने पद, प्रतिष्ठा और प्रभाव का जीवन देखा। परिवार बसाया, बच्चों को बड़ा होते देखा, उनकी सफलताओं में शामिल हुए और ख़ुश भी हुए। अब तो बहुतों को पौत्र-पौत्रियों की किलकारियाँ को  सुनने का भी सौभाग्य प्राप्त है।

यदि वस्तुनिष्ठ दृष्टि से देखें तो हममें से अधिकांश उन लोगों में हैं जिन पर जीवन अपेक्षाकृत उदार रहा है।

फिर भी आश्चर्य होता है कि इस आयु में भी हम में से बहुतों का मन अशान्त रहता है। क्यो? असंतोष क्यों है? शिकायतें क्यों हैं? कड़वाहट क्यों हैं? दूसरों की उपलब्धियाँ कभी-कभी हमें असहज क्यों कर देती हैं? किसी असहमति को हम व्यक्तिगत आक्षेप क्यों मान बैठते हैं? बीते हुए पदों और अधिकारों की छाया आज भी हमारे वर्तमान पर क्यों पड़ती रहती है?

शायद इसलिए कि शरीर तो वृद्ध हो जाता है, परन्तु मन अक्सर अतीत से अपना मोह, अपना जुड़ाव नहीं छोड़ पाता।

हममें से बहुत से लोग अनजाने में अपने वर्तमान को अतीत की कसौटी पर परखते रहते हैं। हम उस समय को याद करते हैं जब हमारे निर्णयों का महत्व था, जब लोगों की भीड़ हमारे आसपास रहती थी, जब फोन अधिक बजते थे और हमारे शब्दों का अधिक वजन था। परन्तु जीवन की सबसे बड़ी सच्चाइयों में से एक यह भी है कि वर्तमान कभी अतीत की पुनरावृत्ति नहीं होता।

और शायद होना भी नहीं चाहिए।

प्रकृति ने जीवन को ऋतुओं में बाँटा है। वसन्त यदि सदैव बना रहे तो वह भी बोझिल हो जाएगा। शरद और हेमन्त का भी अपना सौन्दर्य है। परन्तु उस सौन्दर्य को देखने के लिए दृष्टि बदलनी पड़ती है।

मुझे लगता है कि जीवन के उत्तरार्ध का वास्तविक धर्म चार शब्दों में समाहित है—गरिमा, कृतज्ञता, करुणा और उदारता।

गरिमा इसलिए कि हम जीवन की अनिवार्य सीमाओं को स्वीकार कर सकें। यह समझ सकें कि समय का प्रवाह किसी के लिए नहीं रुकता। जो अधिकार कभी हमारे थे, वे अब किसी और के हैं, और यही प्रकृति का नियम है. गरिमा है यह जानना कि आयु जनित मर्यादा का अनुपालन ही हमारा धर्म है और यही हमसे अपेक्षित भी है। ऐसा व्यवहार जिसमें परिपक्वता की शालीनता  हो, संकीर्णता का अभाव हो, उदारता एवं सद्भाव की ऊष्मा हो.

कृतज्ञता इसलिए कि हम उस विपुल अनुग्रह को पहचान सकें जो हमें मिला है। हम प्रायः उन चीजों की गणना करते रहते हैं जो नहीं मिलीं, पर जो मिला है वह कितना प्रचुर है, यह अक्सर भूल जाते हैं.

करुणा इसलिए कि करुणा अगर जीवन के इस दहलीज़ पर प्रदर्शित नहीं होगी तो कब होगी? करुणा से उद्दात तो कोई और मानवीय संवेदना हो ही नहीं सकती. इस आयु तक पहुँचते-पहुँचते हमें इसकी अनुभूति तो हो ही जाती है. और करुणा के प्रदर्शन के कई स्वरूप हैं. केवल अनायास ही किसी की सहायता का आवेग ही करुणा नहीं है. किसी की अक्षमता या असहायता जो अक्सर परिवारों में, संबंधों में, दिख जाती है, उसे समझना, उस के प्रति सहानुभूति रखना भी करुणा है. करुणा ऐसी संवेदना है जो हमें दूसरों को समझना सिखाती है।

और उदारता इसलिए कि जीवन का अंतिम वैभव संग्रह में नहीं, वितरण में है। धन का नहीं तो कम-से-कम सद्भाव का, प्रशंसा का, क्षमा का, शुभेच्छा का। और शायद सबसे बढ़ कर वाणी की उदारता का. “वचने का दरिद्रता” – वाणी की दरिद्रता तो हमारी उम्र में अक्षम्य होनी चाहिए. बोली की कृपणता से बड़ी दरिद्रता क्या और कोई हो सकती है?

और उत्तरार्ध के इस धर्म का संवरण कहीं अधिक सुगमता से हो सकेगा यदि हम शनैः शनैः अंतर्मुखी बन सकें. 

कैसी विचित्र विडम्बना है यह कि जीवन भर हम सफलता प्राप्त करने में लगे रहते हैं, परन्तु अंततः हमें यह ज्ञात होता है कि शांति सफलता से नहीं, सद्भावना से आती है। संतोष उपलब्धियों से नहीं, कृतज्ञता से आता है। और आनंद प्रतिस्पर्धा जीतने से नहीं, प्रतिस्पर्धा से ऊपर उठ जाने से आता है।

जिस दिन किसी अन्य व्यक्ति की सफलता हमें अपनी सफलता जैसी लगने लगे, जिस दिन हम दूसरों की प्रगति में सच्चा हर्ष अनुभव करने लगें, जिस दिन छोटी-छोटी कटुताएँ और पुराने हिसाब हमें महत्वहीन प्रतीत होने लगें, उसी दिन समझ लीजिए हम जीवन के एक बहुत ख़ूबसूरत मोड़ पर पहुँच गए हैं.

वहाँ कोई दौड़ नहीं है। वहाँ कोई वैमनस्य नहीं है. वहाँ कोई तुलना नहीं है. वहाँ कोई प्रतिस्पर्धा नहीं है।

वहाँ केवल एक ठहराव है, एक शांत स्वीकृति है कि जीवन सुंदर था, जीवन उदार था, और जीवन सार्थक था. और यह कि हमारा वर्तमान भी वैसा ही है। शायद अतीत से भी श्रेष्ठतर है, लेकिन तभी जब इन कृपाओं के लिए ईश्वर के प्रति हमारी कृतज्ञता कम न हो, और जीवन की हमारी शेष यात्रा गरिमा, करुणा, और उदारता से संतृप्त हो. 

शायद यही उत्तरार्ध का धर्म है।

और शायद यही उसका सबसे बड़ा सौन्दर्य भी।

Published by udaykumarvarma9834

Uday Kumar Varma, a Harvard-educated civil servant and former Secretary to Government of India, with over forty years of public service at the highest levels of government, has extensive knowledge, experience and expertise in the fields of media and entertainment, corporate affairs, administrative law and industrial and labour reform. He has served on the Central Administrative Tribunal and also briefly as Secretary General of ASSOCHAM.

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