शक्ति, स्मृति और समय का तीर्थ
उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर जनपद में विंध्य पर्वत शृंखला में अवस्थित है विंध्यवासिनी देवी का सिद्ध मंदिर, बावन शक्तिपीठों में एक, कहते हैं यहाँ माँ सती का बाँया अंगूठा गिरा था।
कुछ तीर्थ ऐसे होते हैं जहाँ हम दर्शन करने जाते हैं, और कुछ ऐसे भी हैं जहाँ पहुँचकर लगता है कि हम किसी जीवंत परंपरा के के साक्षी बन गए हों. आदिशक्ति की स्वरूपा माँ विंध्यवासिनी उन्हीं में से एक है। यहाँ इतिहास, पुराण, परंपरा, आस्था, पराशक्ति, और यहाँ तक कि भूगोल भी एक-दूसरे में इस प्रकार विलीन हो गए हैं कि इस स्थान का वैशिष्ट्य असाधारण और अप्रतिम हो गया है.
यहाँ पहुँचने वाली हर सड़क धीरे-धीरे श्रद्धा की पगडंडियों में बदलने लगती हैं। मंदिर की ओर जाती गलियाँ फूलों, चुनरियों, और नारियल से पटी रहती हैं और घंटियों और जयघोषों से अनुनादित रहता है पूरा परिवेश. हजारों लोग एक अदृश्य आकर्षण से यहाँ खिंचे चले आते हैं. कोई मनौती लेकर आता है तो कोई कृतज्ञता व्यक्त करने, और कोई कोई तो केवल माँ का दर्शन पाने।
माँ विंध्यवासिनी यहाँ केवल पूजी नहीं जातीं; वे लोगों के जीवन में बसती हैं। वे इस क्षेत्र की आस्था और श्रद्धा का केंद्र विंदु तो हैं ही, सांस्कृतिक स्मृति भी हैं और भावनात्मक आश्रय भी।
विंध्याचल का महत्व केवल उसके मुख्य मंदिर तक सीमित नहीं है। यहाँ की यात्रा तीन शक्तिस्थलों की परिक्रमा से पूर्ण मानी जाती है—विंध्यवासिनी, कालीखोह और अष्टभुजा। यह त्रिकोण मानो शक्ति के तीन आयामों का दर्शन कराता है—संरक्षण, संघर्ष और रहस्य। शायद इसीलिए इसे पूर्ण पीठ की मान्यता प्राप्त है.
पुराणों के अनुसार महिषासुर का वध करने के पश्चात आदिशक्ति ने विंध्य पर्वतमाला को अपना निवास बनाया और विंध्यवासिनी कहलायीं। शाक्त परंपरा उन्हें स्वयं दुर्गा का साक्षात् स्वरूप मानती है। वहीं भागवत परंपरा उन्हें योगमाया से जोड़ती है—वही दिव्य कन्या जिसे कंस ने देवकी की आठवीं संतान समझकर मारना चाहा था। किंतु वह उसके हाथों से छूटकर आकाश में प्रकट हुई और घोषणा की कि उसका विनाशक जन्म ले चुका है। तब से वह विंध्याचल में निवास करती हैं, ऐसी लोकमान्यता है।
शायद इसी कारण विंध्यवासिनी के रूप में भक्तों को माँ की निकटता का अनुभव होता है. यहाँ देवी का दर्शन केवल आराधना नहीं, आस्था से उद्भूत और अंतरतम से निकला हुआ एक संवाद, एक निवेदन बन जाता है. देवी का आवास पहाड़ी पर है, लेकिन बाहर के वातावरण में चारों तरफ़ से हो रहे कोलाहल से अप्रभावित एक शांति है, एक अनासक्ति भी व्याप्त है, मंदिर प्रांगण में।
कालीखोह पहुँचते ही वातावरण बदल जाता है। गुफानुमा परिसर, धूप और दीप की गंध, शिलाओं की निस्तब्धता और देवी का रौद्र स्वरूप मन को भीतर तक स्पर्श करता है। यह वही काली मानी जाती हैं जिन्होंने रक्तबीज का संहार किया था। उस असुर की प्रत्येक रक्त-बूँद से एक नया असुर उत्पन्न हो जाता था। तब देवी ने अपना मुख इतना विस्तृत कर लिया कि कोई रक्त-बूँद धरती पर न गिर सके।
यह कथा केवल देवासुर संग्राम की नहीं है। यह जीवन के एक गहरे सत्य का रूपक भी है। कुछ बुराइयाँ ऐसी होती हैं जो रक्तबीज की भाँति बढ़ती हैं। घृणा से घृणा जन्म लेती है, हिंसा से हिंसा। उन्हें समाप्त करने के लिए केवल सद्भावना नहीं, अपितु काली जैसा साहस भी चाहिए।
अष्टभुजा मंदिर में पहुँचते-पहुँचते शक्ति का स्वर फिर बदल जाता है। पहाड़ी पर स्थित यह मंदिर योगमाया और महासरस्वती की स्मृति से जुड़ा है। यहाँ देवी किसी युद्धरत शक्ति की तरह नहीं, बल्कि ब्रह्मांड में व्याप्त उस रहस्यमयी ऊर्जा की तरह प्रतीत होती हैं जिसे मनुष्य पूरी तरह समझ नहीं सकता। कंस की पकड़ से छूटकर आकाश में विलीन होती योगमाया मानो यह उद्घोष करती हैं कि सत्ता चाहे जितनी प्रबल हो, नियति को बाँध नहीं सकती।
सनातन परंपरा ने देवी को एक ही रूप में देखने का प्रयास कभी नहीं किया। जीवन स्वयं बहुरंगी है। इसलिए यहाँ देवी भी अनेक रूपों में प्रकट होती हैं। इन रूपों में माँ का अनुग्रह और ममता भी है, महिषासुरमर्दिनी की शक्ति और ऊर्जा भी है, और सृष्टि का रहस्य भी है ।
विंध्याचल की एक और विशेषता कम लोगों को ज्ञात है। भारतीय मानक समय की रेखा इसी मंदिर के ऊपर से होकर गुजरती है। यह तथ्य अपने आप में एक सुंदर प्रतीक लगता है। एक ओर वह रेखा है जो भौतिक रूप में समय को परिभाषित करती है और दूसरी ओर वह देवी हैं जिनकी उपासना सदियों से चल रही है और जो समय की सीमाओं से परे प्रतीत होती हैं। मनुष्य यहाँ समय की सुइयों को देखते- देखते अनंत का स्पर्श भी खोज लेता है।
शायद यही कारण है कि विंध्याचल केवल एक तीर्थ नहीं, एक अनुभव बन जाता है। यहाँ पुराण इतिहास से मिलते हैं, प्रतीक जीवन से, और आस्था दर्शन से।
विंध्याचल से लौट कर स्मृति मैं केवल देवी की छवि ही नहीं होतीं, यह अनुभूति भी होती है कि आधुनिकता के निरंकुश शोर के बीच मनुष्य आज भी किसी ऐसी शक्ति की खोज करना चाहता है जो उसे आश्वस्त कर सके कि वह अकेला नहीं है, अरक्षित नहीं है. विंध्याचल की पहाड़ियों में गूँजता “जय माँ विंध्यवासिनी” का स्वर इसी मानवीय आकांक्षा का शाश्वत स्वर है।
विंध्याचल से समय की रेखा अवश्य गुजरती है लेकिन विंध्यवासिनी की प्रतिमा के समक्ष समय ठहर जाता है. जब हम देवी के सामने खड़े होते हैं तो लगता है कि समय वहीं ठहर गया हो, और हमारी आस्था यही चाहती है कि वह समय ठहरा ही रहे.