भवभूति, समय और सृजनात्मकता

साहित्य में कुछ विभूतियाँ अपनी असंख्य कृतियों के कारण अमर होती हैं, और कुछ ऐसी होती हैं जिनकी एक ही पंक्ति उनके व्यक्तित्व का शाश्वत परिचय बन जाती है। संस्कृत साहित्य के महान नाटककार भवभूति उन्हीं विरल रचनाकारों में हैं जिनकी स्मृति उनके नाटक ‘मालती माधव’ के एक श्लोक मात्र से भी जीवित है. 

`ये नाम केचिदिह नः प्रथयन्त्यवज्ञां

जानन्ति ते किमपि तान्प्रति नैष यत्नः ।

उत्पत्स्यते तु मम कोऽपि समानधर्मा

कालो ह्ययं निरवधिर्विपुला च पृथ्वी

अर्थात् कहीं न कहीं कोई ऐसा अवश्य जन्म लेगा जो मेरी संवेदना, मेरे विचार और मेरे शब्दों को समझ सकेगा। समय अनन्त है और पृथ्वी विशाल।

यह सोच असाधारण है और इस सोच के पीछे का आत्म – विश्वास अपरिमेय. इसमें अप्रसन्नता नहीं, उपालंभ नहीं, कटुता नहीं, दीनता भी नहीं। केवल एक अडिग विश्वास, जो अपने समय से निराश होकर भी भविष्य से निराश नहीं हुआ था।

तो कौन थे भवभूति जिन्होंने अपने युग की अनुचित उपेक्षा का उत्तर अद्वितीय धैर्य से दिया? आज, लगभग बारह सौ वर्ष बाद, हम उसका नाम आदर से लेते हैं। उसके श्लोक उद्धृत करते हैं। उसके नाटकों का अध्ययन करते हैं। उसके शब्दों में अपने समय की बेचैनियों का प्रतिबिम्ब देखते हैं। पर विडम्बना यह है कि जिस भवभूति को आज साहित्य का अमूल्य रत्न माना जाता है, वह अपने जीवनकाल में वैसी लोकप्रियता प्राप्त नहीं कर सका जैसी उसके महान समकालीन कालिदास को मिली थी।

भवभूति की कथा इसीलिए रोचक है, अद्भुत है और असाधारण है.

उत्पत्स्यते तु मम कोऽपि समानधर्मा

यह केवल एक कवि की कथा नहीं है; यह उस शाश्वत प्रश्न की कथा है कि प्रतिभा और प्रसिद्धि का सम्बन्ध आखिर है क्या? यह प्रतिभा और प्रसिद्धि के जटिल सम्बन्ध की कथा भी है। क्यों कुछ रचनाकार अपने जीवनकाल में ही किंवदंती बन जाते हैं और कुछ को समय के विशाल गलियारों से होकर गुजरना पड़ता है? क्यों कुछ फूल खिलते ही देख लिए जाते हैं, जबकि कुछ की सुगंध को पहचानने में सदियाँ लग जाती हैं?

भवभूति का जीवन इन प्रश्नों का कोई सीधा उत्तर नहीं देता, लेकिन उन्हें और गहरा अवश्य कर देता है।

इतिहासकारों के अनुसार उनका जन्म विदर्भ की भूमि पर हुआ था और उनका मूल नाम श्रीकण्ठ था। “भवभूति” नाम बाद में प्रतिष्ठित हुआ। विद्वानों में इसके अर्थ को लेकर कुछ मतभेद हैं, किन्तु सामान्यतः इसे शिव की कृपा या विभूति से सम्बद्ध माना जाता है। उनके व्यक्तित्व में विद्वत्ता और संवेदना का ऐसा अद्भुत संगम था कि यह नाम मानो उनके लिए ही निर्मित हुआ हो।

वे केवल कवि नहीं थे; वे गम्भीर शास्त्रज्ञ भी थे। वेद, मीमांसा, व्याकरण और दर्शन पर उनका असाधारण अधिकार था। किन्तु केवल पाण्डित्य किसी लेखक को अमर नहीं बनाता। अमरत्व तब प्राप्त होता है जब ज्ञान संवेदना में रूपान्तरित हो जाए। भवभूति के साथ यही हुआ।

उत्तरे रामचरिते भवभूतिर्विशिष्यते

उनकी तीन प्रमुख कृतियाँ—महावीरचरित, मालती-माधव और उत्तररामचरित—संस्कृत नाट्य-साहित्य की महान उपलब्धियों में गिनी जाती हैं। पर यदि पूछा जाए कि उनकी प्रतिभा अपने सर्वोच्च रूप में कहाँ दिखाई देती है, तो अधिकांश विद्वान उत्तररामचरित का नाम लेंगे। संस्कृत आलोचना की प्रसिद्ध उक्ति है—“उत्तरे रामचरिते भवभूतिर्विशिष्यते।” वास्तव में यह केवल रामकथा नहीं है; यह उस मनुष्य की कथा है जो कर्तव्य और प्रेम, धर्म और करुणा, राज्य और हृदय के बीच फँसा हुआ है।

वाल्मीकि के राम महाकाव्य के नायक हैं, तुलसीदास के राम भक्ति के आराध्य हैं, पर भवभूति के राम सबसे पहले एक संवेदनशील मनुष्य हैं। सीता-वियोग की वेदना, स्मृति का बोझ, निर्णयों का पश्चात्ताप और प्रेम की अविनाशी उपस्थिति—इन सबका जितना सूक्ष्म और मार्मिक चित्रण भवभूति करते हैं, वह उन्हें विशिष्ट बनाता है। उनके राम मर्यादा पुरुषोत्तम होने की कीमत अपने हृदय से चुकाते हैं। यही कारण है कि उत्तररामचरित आज भी केवल एक नाटक नहीं, बल्कि मानवीय संवेदना का एक अनुपम दस्तावेज़ प्रतीत होता है।

एको रसः करुण एव

यदि कालिदास सौन्दर्य के महाकवि हैं, तो भवभूति करुणा के।

कालिदास की दुनिया में ऋतुएँ गाती हैं, बादल संदेशवाहक बनते हैं और प्रकृति मनुष्य के भावों का उत्सव मनाती है; भवभूति की दुनिया में मनुष्य का हृदय स्वयं एक ब्रह्माण्ड बन जाता है। वहाँ बाहरी दृश्य से अधिक भीतर की पीड़ा का विस्तार है।

भवभूति का प्रसिद्ध कथन है—“एको रसः करुण एव।” यह कथन किसी साहित्यिक आग्रह से अधिक उनकी रचनात्मक दृष्टि का परिचायक है। उन्हें विश्वास था कि मनुष्य के अनुभवों का अंतिम और गहनतम सत्य करुणा में निहित है। प्रेम, विरह, स्मृति, त्याग और पश्चात्ताप—ये सभी अन्ततः उसी में आकर मिलते हैं।

उनके पात्र केवल बोलते नहीं; वे अपने मौन से भी संवाद करते हैं। उनकी भाषा में पाण्डित्य है, पर वह भावों पर बोझ नहीं बनता। कहीं मधुरता है, कहीं गहनता; कहीं सरल प्रवाह है, तो कहीं अर्थ-सघनता। पर इन सबके पीछे जो सबसे अधिक दिखाई देता है, वह मनुष्य के अंतःकरण की सूक्ष्मतम तरंगों को पकड़ लेने की क्षमता है।

शायद यही कारण है कि भवभूति का साहित्य अपने युग की सीमाओं से आगे निकल जाता है। वह अपने समय का होकर भी केवल अपने समय का नहीं रह जाता।

कालो ह्ययं निरवधिः

फिर भी, मेरे लिए भवभूति की सबसे बड़ी विशेषता उनकी साहित्यिक प्रतिभा नहीं है, यद्यपि वह असाधारण थी। मुझे सबसे अधिक आकर्षित करता है उनका मनोबल—वह शांत और अडिग आत्मविश्वास जो उनकी रचनाओं के पीछे खड़ा दिखाई देता है।

यह कहना पूरी तरह सही नहीं होगा कि उनके समकालीनों ने उनकी प्रतिभा को पहचाना नहीं। उन्हें सम्मान मिला, विद्वानों की स्वीकृति मिली, उनकी कृतियों की प्रशंसा भी हुई। उज्जयिनी के राजा यशोवर्मन के दरबार में उन्हें स्थान भी मिला।किन्तु वह व्यापक लोकप्रियता और सर्वत्र प्रतिध्वनित यश उन्हें नहीं मिला जिसकी उनकी प्रतिभा अधिकारी थी।

ऐसी स्थिति में बहुत-से रचनाकार निराश हो जाते हैं। कुछ कटु हो जाते हैं और कुछ समझौता कर लेते हैं। भवभूति ने इनमें से कोई मार्ग नहीं चुना। उन्होंने भविष्य पर विश्वास किया। उन्होंने मान लिया कि यदि आज कोई नहीं समझ रहा, तो कल कोई समझेगा; यदि मेरी पीढ़ी नहीं, तो कोई और पीढ़ी; यदि मेरा नगर नहीं, तो कोई और नगर।

यह केवल एक कवि का आत्मविश्वास नहीं था; यह समय की कालमुक्त प्रकृति पर उनकी आस्था का उद्घोष था।

हम ऐसे युग में जी रहे हैं जहाँ स्वीकृति तत्काल चाहिए। हम चाहते हैं कि हमारे शब्दों की प्रतिध्वनि उसी क्षण सुनाई दे। किंतु भवभूति उस दुर्लभ धैर्य के कवि हैं जो बीज बोकर वृक्ष की छाया देखने की जिद नहीं करते ।

विपुला च पृथ्वी

और इतिहास ने उनके विश्वास को सत्य सिद्ध किया।

आज जिन लोगों ने संभवतः उनकी उपेक्षा की होगी, उनके नाम इतिहास की धूल में खो चुके हैं; पर भवभूति जीवित हैं। उनके नाटक पढ़े जाते हैं, उनके श्लोक उद्धृत किए जाते हैं, और उनकी संवेदना आज भी नए पाठकों के हृदय को स्पर्श करती है।

वस्तुतः उनका वह श्लोक केवल उनके बारे में नहीं है । वह हर लेखक, हर कलाकार और हर विचारक के बारे में है जो कहीं न कहीं एक ऐसे पाठक की प्रतीक्षा में जीता है जो उसे सचमुच समझ सके। 

भवभूति के जीवन की सबसे सुंदर और विस्मयकारी विडम्बना यही है कि उन्होंने जिस “समानधर्मा” की कल्पना की थी, वह वास्तव में जन्म लेता रहा। कभी किसी कवि के रूप में, कभी किसी नाटककार के रूप में, कभी किसी शोधार्थी के रूप में, और कभी किसी साधारण पाठक के रूप में जो सदियों बाद उनकी पंक्तियाँ पढ़कर ठिठक जाता है।

और शायद इसी कारण भवभूति आज भी हमारे समकालीन प्रतीत होते हैं। उनकी सबसे बड़ी विरासत केवल उनके नाटक नहीं हैं, बल्कि वह विश्वास है जिसे उन्होंने शब्द दिया—

कालो ह्ययं निरवधिर्विपुला च पृथ्वी।

समय अनन्त है और पृथ्वी विशाल।

Published by udaykumarvarma9834

Uday Kumar Varma, a Harvard-educated civil servant and former Secretary to Government of India, with over forty years of public service at the highest levels of government, has extensive knowledge, experience and expertise in the fields of media and entertainment, corporate affairs, administrative law and industrial and labour reform. He has served on the Central Administrative Tribunal and also briefly as Secretary General of ASSOCHAM.

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