जीवन का गद्य, वसंत का संगीत
सुबह के शांत, स्निग्ध नीरव परिवेश में कोयल यदि संगीत है, तो कौव्वा उद्घोष है।
कोयल की तान धीरे-धीरे उभर कर निखरती है, उसके स्वरों की विविधता आहिस्ता आहिस्ता वातावरण को संतृप्त करती है। कौव्वे की आवाज़ वैसी नहीं। वह आती नहीं, आ गिरती है। उसमें मिठास नहीं, आयास है; लयात्मकता नहीं पुनरावृत्ति है, माधुर्य नहीं, कर्कशता है। वह कानों को सुहाती नहीं, झकझोर देती है।
और शायद इसी कारण हम उसे सुकंठ या सुंदर नहीं मानते। दोनो ही कृष्णांग हैं, दोनों को सुदर्शन नहीं कहा जाता. लेकिन एक का स्वागत होता है और दूसरे की उपस्थिति बस बर्दाश्त की जाती है।
हमारी सौंदर्य-दृष्टि बड़ी चयनशील है। हमें वही प्रिय लगता है जो मधुर हो, कोमल हो, सुसंस्कृत लगे। जो चुभे, जो सुदर्शन न हो, जो सुमधुर न हो, जो अपनी उपस्थिति विनम्रता से नहीं बल्कि मुखर पर दंभ पूर्ण आत्मविश्वास से दर्ज कराए—उसे हम सहज ही असुंदर घोषित कर देते हैं।
यदि यह अन्याय है तो कौव्वा इस अन्याय का शायद सबसे प्रचलित और प्रसिद्ध उदाहरण।
कृष्णवर्णी, कर्कश, सर्वभक्षी, और सर्वव्यापी. न मयूर जैसी छटा, न हंस जैसी गरिमा, न कोयल जैसी तान। फिर भी यदि गंभीरता से सोचें, तो भारतीय जीवन का शायद ही कोई पक्षी हमारे जीवन से कौव्वे जितना निकट हो। वह हमारे आँगनों में है, छतों पर है, मंदिरों में है, बाज़ारों में है, श्मशानों में भी है. पर यह भी सच है कि वह प्रकृति का ऐसा यथार्थवादी पात्र है, जिसे सौंदर्य और सम्मान के दरबार में कभी उचित स्थान नहीं मिला। हाँ, उपहास और तिरस्कार अवश्य उसके हिस्से में बहुतायत से आए।
एक प्रश्न मन में अवश्य उठता है—क्या केवल मधुरता ही मूल्य है? क्या संसार में हर उपयोगी, हर बुद्धिमान, हर आवश्यक वस्तु का मधुर होना अनिवार्य है?
कौव्वे की आवाज़ मधुर नहीं, पर उसकी सार्थकता निस्संदेह अवश्य है।
उसकी कर्कशता अक्सर एकाकी नहीं होती। उसमें एक प्रकार की सामाजिकता निहित है। कोई कौव्वा अकेले काँव-काँव नहीं करता। उसकी पुकार सूचना है—भोजन की, संकट की, उपस्थिति की। उसमें आत्ममुग्धता की तान नहीं, समुदाय का स्वर है। कोयल अपने लिए गाती है; कौव्वा अपने समूह के लिए बोलता है।
शायद इसीलिए वह इतना बुद्धिमान भी है।
भारतीय लोककथाओं में कौव्वा बार-बार अपनी चतुराई के साथ उपस्थित होता है—कभी घड़े में कंकड़ डालते हुए, कभी संकट का संकेत देते हुए। ‘लघुपतनक’ के बिना ‘चित्रांग’ की प्राण रक्षा असंभव थी. विज्ञान ने भी अब स्वीकार किया है कि कौव्वे पृथ्वी के सबसे बुद्धिमान पक्षियों में हैं। वे चेहरे पहचानते हैं, स्मृतियाँ सँजोते हैं, औज़ारों का उपयोग करते हैं, और कई बार मनुष्यों जैसी समस्या-समाधान क्षमता का परिचय देते हैं।
पंचतंत्र का तीसरा तंत्र ‘काकोलूकीयम्’ केवल कौव्वों और उल्लुओं की कथा नहीं, राजनीति, कूटनीति और सामूहिक रणनीति का अद्भुत ग्रंथ है। वहाँ कौव्वा केवल पक्षी नहीं, एक चतुर राजनयिक है—सतर्क, व्यावहारिक और दूरदर्शी। मेघवर्ण, जो कौव्वों का राजा था उसने स्थिरजीवी जो उसका बुद्धिमान मंत्री था उसकी सलाह पर कम करते हुए अपने शत्रु उल्लुओं के राजा अरिमर्दन पर न केवल विजय पाई बल्कि युद्ध में राजनीति और कूटनीति की महत्ता को भी प्रतिस्थापित किया. जीवन की सफलता के लिए विष्णु शर्मा को यह सूत्र मेघवर्ण के उद् गार से ही स्थापित हुआ.
अनागतं यः कुरुते स शोभते, स शोच्यते यो न करोत्यनागतम् ।
(पञ्चतन्त्रम्, काकोलूकीयम्, कथा 13, श्लोक 217)
जो व्यक्ति आने वाली विपत्ति (अनागत) के लिए पहले से ही उपाय कर लेता है, वह शोभा पाता है (जीवन में सफल रहता है)। और जो आने वाली विपत्ति का उपाय नहीं करता, वह अंत में शोक करता है।
यही कौव्वे के स्वभाव का भी सार है—सतर्कता, दूरदृष्टि और सामूहिक बुद्धिमत्ता।और यही श्रेष्ठ नीति मानी गई और अपनाई गई। विष्णु शर्मा ने यदि नीति और बुद्धि की श्रेष्ठता स्थापित करने के लिए कौव्वों को चुना, तो यह संयोग नहीं हो सकता।
पर इसे विडंबना कहें या दुर्भाग्य कि शायद बुद्धिमत्ता भी कर्कशता की तरह, तुरंत आकर्षित नहीं करती, अविलंब अपनी तरफ़ नहीं खींचती. समय से और समय पा कर मुखरित होती है।
विद्यार्थियों के पाँच लक्षणों में भी “काक-चेष्टा” को प्रथम स्थान दिया गया
“काकचेष्टा बको ध्यानं श्वाननिद्रा तथैव च। अल्पहारी गृहत्यागी विद्यार्थी पंचलक्षणम्॥”
साधना में सुरीलेपन का विशेष स्थान नहीं होता; वहाँ चेष्टा, धैर्य और एकाग्रता अधिक महत्त्वपूर्ण होते हैं। विपत्ति में सुंदरता नहीं, बुद्धि काम आती है।
हमारे समय की एक बड़ी विडंबना यह है कि हम सौंदर्य को उपयोगिता से, और मधुरता को यथार्थ से ऊपर रखने लगे हैं। हमें कोयल प्रिय है क्योंकि उसकी आवाज़ मन को सुख देती है; पर कौव्वा हमें असहज करता है क्योंकि उसकी उपस्थिति न तो कर्णरंजक है और न ही दृष्टिरंजक. कौवा भले ही प्रकृति का परिष्कारक हो, प्रहरी हो, भले ही वह संघर्ष और जिजीविषा के यथार्थ का वाहक भी हो। पर उसे हम सबों से एक कलंकित प्रतिष्ठा ही मिली. जयंत ने यदि कौव्वे का रूप नहीं धरा होता तो संभव था उसका सम्मान हम अधिक करते.
लेकिन कौन कहता है कि कर्कशता सद् गुण नहीं हो सकता, देखने वाले की नज़र ईमानदार होनी चाहिए। कौव्वा कभी वह होने का अभिनय नहीं करता जो वह नहीं है। उसकी आवाज़ जैसी है, वैसी ही है। उसमें मिठास का छल नहीं, अस्तित्व की स्पष्टता है। और एक विशेष अर्थ में, यह स्पष्टता भी सुंदरता का ही पर्याय है।
शायद इसी कारण भारतीय परंपरा ने उसे उपेक्षित नहीं किया; उसे स्मृति और पूर्वजों से भी जोड़ा। श्राद्ध में पहला अन्न कौव्वे को दिया जाता है। मानो हमारी संस्कृति यह स्वीकार करती हो कि जीवन के सबसे गहरे संबंध केवल सुंदरता से नहीं, स्मृति और निरंतरता से बनते हैं।
बहरहाल कौव्वा (काक) कौव्वा है और कोयल (पिक), कोयल।
“काकः कृष्णः पिकः कृष्णः को भेदः पिक काकयोः।
वसन्तसमये प्राप्ते काकः काकः पिकः पिकः॥”
कौआ भी काला है, कोयल भी। लेकिन कोयल की श्रेष्ठता स्थापित करने के लिए वसंत को आमंत्रित करना कवियों को आवश्यक लगा।वाणी की गरिमा और महिमा का इस से सुंदर कौन सा उदाहरण हो सकता है? लेकिन कंठ की मधुरता के अलावा भी श्रेष्ठता स्थापित करने के और मापदंड हो सकते हैं. श्रेष्ठता और सुंदरता भी क्या अक्सर सापेक्ष नहीं होते ?
कोयल वसंत का संगीत हो सकती है, पर कौव्वा जीवन का गद्य है।
और गद्य में कविता जैसी मधुर भले ही न हो—जीवन उसके बिना भी नहीं चलता।