मई  की सुबह और कोयल की तान

पिछली कुछ दिनों से मेरी नींद अलस्सुबह खुल जा रही है। सुबह जल्दी उठने के लाभ अनंत बताए गए हैं। जीवन के इस पड़ाव पर जल्दी जागना अब कुछ सहज भी हो चला है। पर पिछले कुछ दिनों से मेरी इस अलस्सुबह खुलती हुई नींद का कारण कोई अनुशासन या आयु नहीं, बल्कि एक अत्यंत सुरीला संगीत है।

मेरी खुली खिड़कियों से प्रातः चार बजे के आसपास तैरती हुई आती है कोयल की मीठी तान।

कहते हैं, भगवान विष्णु को जगाने के लिए भक्त सुप्रभातम् गाते हैं। पर कई बार मुझे लगता है कि यदि किसी दिन सुप्रभातम् उपलब्ध न हो, तो कोयल की यह मधुर पुकार उसका सुंदर विकल्प बन सकती है। उस स्वर में ऐसी निर्मलता है, ऐसी निष्कलुष मिठास, कि नींद केवल टूटती नहीं—धीरे-धीरे खुलती है. इस तरह जागने की यह अनुभूति बहुत अलग है, बहुत सुखद है . 

और इस संगीत का विस्तार तीनों सप्तकों में है। अधिकतर तो मध्य सप्तक में यह तान गूँजती है लेकिन शनैः शनैः स्वरों का आरोहण होता है और कैसा अद्भुत आरोहण। कितना आवेग और कैसा संवेग। पंडित जसराज और भीम सेन जोशी के गायन के पारखी भी इस आरोहण से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकते। और फिर  अचानक स्वरावलि में परिवर्तन हो जाता है और मंद्र सप्तक के सुर लगने लगते हैं. संगीत और सुरों का ऐसा अतुल्य प्रदर्शन तो सिर्फ़ कोयल ही कर सकती है। 

भारतीय संस्कृति, काव्य, और परंपरा में कोयल का स्थान अद्वितीय है। शुक, मयूर, हंस और चातक—हमारे साहित्य में अनेक पक्षियों ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है, पर कोयल का स्वर जैसे सीधे हृदय में उतरता है। शायद इसी कारण संस्कृत काव्य में उसे केवल पक्षी नहीं, ऋतु और प्रेम का दूत माना गया।कालिदास ने ऋतुसंहार में वसंत के आगमन के साथ कोयल की कूक को प्रेम और नवजीवन की उद्घोषणा की तरह चित्रित किया है। आम्र-मंजरियों के बीच उसकी तान केवल ध्वनि नहीं रहती, वह ऋतु का स्पंदन बन जाती है। 

वैज्ञानिक यदि चाहें तो कोयल के स्वर का रहस्य बड़ी स्पष्टता से समझा देंगे—कंठ की संरचना, ध्वनि की आवृत्ति, कंपन और अनुनाद। पर ऐसे शुष्क स्पष्टीकरणों में वह रस कहाँ, जो सीधा मन में उतरे। हमें उसकी कंठ-रचना से क्या लेना? हमारे लिए तो इतना ही पर्याप्त है कि उसकी तान एक अबूझ आह्लाद देती है, एक गहरा सुकून।

कभी-कभी मन में प्रश्न उठता है—स्वर मीठे और कर्कश क्यों होते हैं? सभी ध्वनियाँ मधुर क्यों नहीं होतीं?

शायद इसलिए कि यदि कर्कशता न हो, तो मधुरता की पहचान भी संभव न हो। सुंदरता को समझने के लिए असुंदरता का साक्षात्कार भी आवश्यक है। प्रकाश तभी अर्थवान है जब अँधेरा उसके साथ उपस्थित हो।

पर इस दार्शनिक उलझन में बहुत देर ठहरने का मन नहीं करता। संसार में जो सुरीला है, वही सुनना चाहिए; जो सुंदर है, वही देखना चाहिए। इसलिए इन दिनों मैं इस सौभाग्य का पूरा आनंद लेना चाहता हूँ। भोर से पहले की निस्तब्धता में कोयल मुझे अपनी तान से जगाती रहे, यही कामना करता हूँ।

मीठी वाणी की महिमा हमारी परंपरा में सर्वविदित है। कबीर का यह प्रसिद्ध दोहा कौन नहीं जानता,

“ऐसी बानी बोलिए, मन का आपा खोय,
औरन को शीतल करे, आपहुँ शीतल होय।”

और संस्कृत की यह सूक्ति तो मीठी बोली को सत्य से भी ऊपर प्रतिष्ठापित  कर देती है,

“सत्यं ब्रूयात्, प्रियं ब्रूयात्, न ब्रूयात् सत्यमप्रियम्।”

सत्य भी ऐसा हो जो प्रिय लगे; जो केवल चोट पहुँचाए, वह अधूरा सत्य है।

शायद इसी कारण मधुरभाषी लोग केवल लोकप्रिय ही नहीं होते, वे अधिक सहज और निर्मल भी होते होंगे। वाणी की सुंदरता तन की सुंदरता से कहीं अधिक स्थायी होती है।

कोयल स्वयं तो नितांत कृष्णवर्णी है। प्रकृति ने उसे मयूर जैसी रंग की भव्यता नहीं दी। पर उसकी वाणी ने उसे अमरत्व दे दिया। वह दिखाई कम देती है, सुनाई अधिक देती है—और कई बार यही उपस्थिति अधिक स्थायी होती है।

फिर भी मनुष्य जाने क्यों कटु बोलता है। क्षणिक कटुता तो समझ में आती है—क्रोध में, पीड़ा में, असहमति में। पर कुछ लोगों की वाणी में जैसे स्थायी कड़वाहट बस जाती है। रहीम ने ऐसे लोगों के लिए बड़ी सख़्त सज़ा सुझाई थी—

“खीरा सिर तें काटिए, मलियत लोन लगाय,
रहिमन कड़ुवे मुखन को, चाहियत यही सजाय।”

पर मनुष्य क्या कभी बदला है? न उपदेश उसे बदलते हैं, न ज्ञान, और न ही अनुभव. ईश्वर की शाश्वत माया यह नहीं तो और क्या है? 

आँख खुल गई है. खिड़की के समीप बैठा मैं सोच रहा हूँ लेकिन उधर बाहर सुरीलापन और माधुर्य वातावरण को अभिषिक्त कर रहे हैं। 

भोर अभी पूरी तरह उतरी नहीं है। आकाश का रंग हल्का होने लगा है. प्रकाश का पूर्वाभास देती हुई उषा क्षितिज पर उतर रही है. मंद बयार है लेकिन पेड़ों की पत्तियाँ स्थिर हैं। 

इस सुरीली निस्तब्धता से मन तृप्त है, संतृप्त भी.

Published by udaykumarvarma9834

Uday Kumar Varma, a Harvard-educated civil servant and former Secretary to Government of India, with over forty years of public service at the highest levels of government, has extensive knowledge, experience and expertise in the fields of media and entertainment, corporate affairs, administrative law and industrial and labour reform. He has served on the Central Administrative Tribunal and also briefly as Secretary General of ASSOCHAM.

One thought on “मई  की सुबह और कोयल की तान

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