गुलमोहर : दहकने से पहले

गुलमोहर दहकने लगे हैं.

मेरे घर के सामने गुलमोहर का एक सुगठितसम्पन्न वृक्ष है। सुदर्शन तो वह है हीगिलहरियों की अठखेलियों का एक चंचल प्रांगण भी है। मेरी सुबहें और साँझें अक्सर उनकी क्रीड़ा को देखते हुए बीतती हैं. दिन के आरंभ और अंत का इस से सुंदर और अर्थवान यापन  और क्या हो सकता है?

पिछले सप्ताह एक सुबहइस वृक्ष की सघन हरियाली के बीच अचानक नहींबल्कि चुपचापलाल-नारंगी फूलों का एक छोटा-सा गुच्छा उभर आया। जैसे किसी ने पत्तों की तहों में आग की पहली लकीर रख दी हो। शायद यह दहकन भीतर ही भीतर कई दिनों से चल रही होगी।मुझे इसका पता अब चला।

रंग इसका इतना दिलकशऔर चटक इसकी इतनी दीप्त कि उस पर नज़र ठहरे बिना नहीं रहतीऔर ठहर जाएतो हट नहीं पाती. पर इस आकर्षण में केवल रंगों की माया ही नहीं हैइसमें एक प्रकार का पूर्वभाष भी है. जो अभी एक चिंगारी हैवह शीघ्र ही एक अग्नि-पुंज में बदलने वाली है।

कुछ ही दिनों में यह वृक्ष दहक उठेगा। पत्तियाँ पीछे छूट जाएँगी और फूलों का उन्माद उसे पूरी तरह आच्छादित कर लेगा। तब वह केवल एक वृक्ष नहीं रहेगावह एक दृश्य होगाएक उद्घोषएक ऐसा उत्सव जिसका वर्णन अनेको बार हुआ है और फिर फिर होगाऔर होता ही रहेगा. कुछ सौन्दर्य ऐसे ही मशहूर नहीं होते. 

और सौंदर्य की पराकाष्ठा की प्रतीक्षा में भी एक अवर्णनीय आनंद की अनुभूति है। इस पूर्णत्व की प्रतीक्षा भी अतिशय आनंददायी है.

संस्कृत की एक सूक्ति अनायास ही ध्यान में आती है, “आरोहति शिखरं शनैः शनैः”—शिखर पर पहुँचना भी क्रमशः होता हैएक-एक पग से। गुलमोहर  का यह वृक्ष भी अपनी तिलस्मी सुंदरता की ओर शनैः शनैः अग्रसर हैजैसे कोई प्रयास अपने पूर्णत्व की ओर बढ़ रहा होजैसे कोई साधना अपने उत्कर्ष के समीप हो.

सौंदर्य की प्रकृति भी शायद ऐसी ही है। वह एकाएक नहीं फूटतावह भीतर ही भीतर संचित होता हैअपने समय की प्रतीक्षा करता हैऔर फिर अपने नियत समय पर प्रकट हो उठता हैपूर्णप्रखरऔर अप्रतिरोध्य।

पिछले वर्ष मैंने इसी वृक्ष को अपनी पराकाष्ठा में देखा थालालदहकते हुए शोलों से आच्छादितमानो धूप भी उसकी छाया में सिमट आई हो। उस सौंदर्य में एक सम्मोहन थाएक प्रबल आकर्षण। पर मैंने यह भी देखा कि वही फूल धीरे-धीरे अपनी चमक खोते रहे, झरते रहे, और अंततः धरती पर बिखरकर एक रंगीन चादर-सी बन गएसुंदर, शांत, पर निष्प्राण।

प्रकृति का यह नियम अटल हैपूर्णता के बाद क्षीणता। पूर्णिमा के बाद चंद्रमा घटता हैऔर पूर्ण प्रस्फुटन के बाद फूल मुरझाता है। अतिरेक का अंत अवसान में ही निहित है,

पर शायद जीवन का वास्तविक आनंद उस क्षीणता में नहींउस यात्रा में हैजो पूर्णता की ओर ले जाती है।

उस यात्रा में एक उल्लास हैएक उत्कंठाएक प्रत्याशा है। उसमें एक मौन विश्वास भी है। जो अभी धीमी ध्वनि हैवह शीघ्र ही स्वर बन जाएगा। और उस विश्वास में एक हल्का-सा दर्प और दंभ भी छिपा होता हैअपने को प्रस्तुत करने का, अपने होने काअपने खिलने काअपनी उपस्थिति की घोषणा का।

गुलमोहर का यह वृक्ष जैसे मुझे अपनी इसी यात्रा में सहभागी बना रहा है। मैं उसके साथ-साथ उस क्षण की प्रतीक्षा कर रहा हूँ जब वह पूरी तरह अपने सौंदर्यअपनी ऊष्माअपनी गरिमा में प्रकट होगा। सुखद अचरज तो यह है कि उस क्षण से पहले हीउसके पूर्वाभास से उसके संकेत संकेत से, उसके पूर्वानुमान से ही, एक अलग ही ऊर्जा का अनुभव होने लगता है।

शायद हमारे जीवन में भी ऐसा ही होता है।

सफलता उतना  सुख नहीं देतीजितनी उससे पहले की प्रतीक्षा देती है। जो अभी प्राप्त नहीं हुआउसकी संभावनाउसकी आहटकई बार उसकी प्राप्ति से अधिक रोमांचक होती है।

शाम अब उतर आई है। हवा में हल्की ठंडक घुलने लगी हैजैसे कहीं दूर से कोई बादल अपनी उपस्थिति का संकेत दे रहा हो। शायद बारिश होशायद नहीं भी। पर इस शायद’ में भी एक सुख है। मन में उल्लास हैआशा की शुभेच्छा भी. ठीक वैसे ही जैसे उस एक छोटे-से लाल गुच्छे मेंजो अभी पूरा गुलमोहर नहीं हैपर उसके होने का विश्वास और संकल्प अपने भीतर समेटे हुए है।

‘फ़िराक़’ याद आते हैं,

‘कुछ कफ़स की तीलियों से छन रहा है नूर सा

कुछ फ़िज़ाँ कुछ हसरते -परवाज़ की बातें करें. 

Published by udaykumarvarma9834

Uday Kumar Varma, a Harvard-educated civil servant and former Secretary to Government of India, with over forty years of public service at the highest levels of government, has extensive knowledge, experience and expertise in the fields of media and entertainment, corporate affairs, administrative law and industrial and labour reform. He has served on the Central Administrative Tribunal and also briefly as Secretary General of ASSOCHAM.

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