माँ की स्मृति

माँ को गुज़रे आज बारह  साल हो गए। हमारी जिंदगियाँ बदस्तूर चल रही हैं, उनके बग़ैर।स्मृतियाँ लेकिन क़ायम हैं, धुंधली नहीं हुईं हैं। हाँ, इतना अवश्य है कि उनकी स्मृति में बीतने  वाले पल अवश्य कम हो गए हैं। माँ की स्मृति की प्रकृति कुछ ठहर सी गई है, मानो  उनके और हमारे रिश्तों के मूल्यांकन को एक स्थायित्व और स्थिरता मिल गई हो.

आज, जब मैं स्वयं सत्तर की दहलीज़ पार कर चुका हूँ और पितामह होने का एक गरिमामय संतोष अनुभव कर रहा हूँ, तब माँ के प्रभाव का एक निष्पक्ष लेखा-जोखा करना थोड़ा कम दुष्कर, कुछ सहजतर  प्रतीत होता है।

शैशव में, बचपने में, और किशोरावस्था के दौरान माँ के ममता की छाया इतनी सघन और सुखद  होती है, उनके प्रेम और स्नेह  का वरदान इत सशक्त होता है कि माँ एक धुरी बन जाती है जिसके इर्द गिर्द हमारा अस्तित्व स्थापित भी होता है और परिभाषित भी. अनोखी बात यह है कि हम सहर्ष और सचेष्ट एक उपग्रह की तरह इस प्रभा मंडल के चारों और घूमते रहना चाहते हैं. माँ की सुरक्षा इतनी व्यापक, और इतनी शक्ति और शान्ति देने वाली होती है कि माँ के प्रति हृदय में पैठ गई भावना और श्रद्धा माँ के साथ हमारे रिश्ते को आजीवन एक अविचल स्थायित्व प्रदान कर देती है।

बड़े होकर जब हम जीवन के बारे में बहुत सारे निर्णय स्वतः लेने लगते हैं, अपने भले और बुरे के बारे में ख़ुद ही सोचने लगते हैं तब भी माँ की उपस्थिति, और उनका समर्थन, जिसे हम सच ही आशीर्वाद मान लेते हैं, हमारे दिल में  बैठी हुई उस संवेदना को पुष्ट ही करती है. मतभेद भी होते हैं और निर्णयों में असहमति भी. शायद हमारे कुछ निर्णयों   से माँ के मन को कष्ट, आघात  या उपेक्षा की अनुभूति भी होती है लेकिन इसका प्रतिकार माएँ शायद ही करती हैं, या कम ही करती हैं. सबसे उत्कृष्ट और उद्दाम, तथा सबसे अलग और सुखद पक्ष इस रिश्ते का यह है कि  माँ की सुरक्षा का कवच कभी इसलिए कमजोर नहीं पड़ता क्योंकि वे उपेक्षित हो रही हैं या तिरस्कृत हो रही हैं. माँ का स्नेह, उनका संरक्षण, हमारे व्यवहार की शर्तों पर निर्भर नहीं करता। वह निस्सीम होता है, विकार रहित अविचल, और अटूट. इस रिश्ते का सबसे अद्भुत पक्ष यही है.

 अपने जीवन के अंतिम वर्षों में माँ शारीरिक रूप से अत्यधिक दुर्बल और अशक्त हो गईं थीं. चलने फिरने की उनकी दिक्कत तो दो दशक से पहले से ही होने लगी थी लेकिन तब भी उनकी जिजीविषा अक्षुण्य बनी रही.  उनकी मानसिक और बौद्धिक क्षमता और सक्रियता परंतु मृत्यु पर्यन्त क़ायम रही. शरीर की क्षमताओं ने जब अपना दायित्व पूर्ण कर लिया, तो माँ शांतिपूर्वक अपनी अगली यात्रा पर चल पड़ीं.

उनकी स्मृतिओं की एक लंबी शृंखला है जो अनवरत और अनायास ही आँखों के सामने उभर आती हैं. मैं ग्यारह वर्ष का था जब मेरा प्रवेश एक आवासीय विद्यालय में हो गया और मैं  घर से दूर छात्रावास में रहने लगा. और तब से आजीवन मेरे लिए घर वह जगह थी जहाँ मेरी गर्मियों की तातील और सर्दियों  की छुट्टियाँ गुज़रती थीं. वो छह वर्ष जब मैं घर से दूर स्कूल की पढ़ाई कर रहा था, मेरी अपनी माँ से निकटता के सर्वोत्तम वर्ष थे. छुट्टियों में मुझे अवसर मिलता था माँ के साथ समय बिताने का, उनके साथ रसोईघर में उनको खाना बनाते देखने का, कभी कभार हाथ भी बँटाने का, और सब से पहले खाने को चखने का भी. इन्ही छुट्टियों में मैं माँ के साथ रिश्तेदारों के यहाँ जाया करता था और माँ बहुत गर्व से उन्हें मेरी प्रतिभा और पढ़ाई में उत्कृष्टता का वर्णन करते नहीं थकती थीं. कॉलेज में जाने के बाद भी यह सिलसिला कुछ हद तक क़ायम रहा हालांकि पहले जैसी स्वतंत्रता मैंने स्वतः ही कम कर दी, शायद मेरी बढ़ती उम्र की वजह से या फिर माँ को हर छोटी चीज़ के लिए परेशान करने की इच्छा की अविवेकिता को समझ जाने की वजह से. 

आईएएस में आने के बाद मैं भी मशरूफ़ हो गया. घर आना जाना थोड़ा अनियमित ही हो गया. माँ ही मुझसे मिलने आती थीं  लेकिन मेरे पास ही समय कम रहता था. माँ ने ऐसा कभी कहा नहीं लेकिन मेरे पास आने के कुछ दिनों बाद ही वो वापस चली जातीं थीं. उस समय तो यह बात मेरे समझ में नहीं आयी, लेकिन आज सोचता हूँ शायद मैं उनके पास थोड़ा और बैठता, थोड़ी और बातें करता तो माँ को मेरे पास रुकने की कोई वजह बन पाती.

आज वो नहीं है और मैं भी उम्र दराज हो चला हूँ. मुझे अब अधिक  समझ में आता है कि वृद्धावस्था नें माता पिता को अपने बच्चों की संगति का अभाव क्यों अखरता है?

माँ को आज श्रद्धा सुमन समर्पित करते हुए मुझे यह स्वीकारने में कोई संकोच नहीं है कि जब भी मैं माँ को याद करता हूँ, उनके बारे में सोचता हूँ, एक टीस, एक पीड़ा मन को सालती है, मन को उद्वेलित कर जाती है. एक अपराध बोध से मन भर जाता है, जो न मिटता है और न ही  कम होता है. मुझे माँ के साथ अधिक समय बिताना चाहिए था, मुझे उनकी सेवा करनी चाहिए थी, मुझे उनसे और बात करनी चाहिए थी. 

आज इस पीड़ा का कोई उपचार तो है नहीं. इस अपराध बोध को मुझे जीवन पर्यन्त ढोना पड़ेगा और ढोना चाहिए भी. क्योंकि यही मेरा पाश्चाताप है. 

लेकिन मैं यह भी जानता हूँ कि माँ ने मुझे कभी दोषी नहीं माना. और शायद यही माँ के चरित्र, प्रकृति और स्वभाव का सबसे सरल लेकिन सबसे उत्कृष्ट परिचय है.

Robert Drake द्वारा लिखित पंक्तियाँ इन दिनों whatsApp पर बहुत प्रचलित है। 

Sometimes,

I feel I want to go back in time… 

Not to change things, but to feel a couple of things twice.

और इस उल्टी यात्रा का पहला पड़ाव है, बचपन.

Sometimes,

 I wish I was a Baby for a while… 

Not to be walked in the pram but to see my Mother’s smile।

मैं भी सोचता हूँ, कल्पना करता हूँ, काश ऐसा हो जाता!

Published by udaykumarvarma9834

Uday Kumar Varma, a Harvard-educated civil servant and former Secretary to Government of India, with over forty years of public service at the highest levels of government, has extensive knowledge, experience and expertise in the fields of media and entertainment, corporate affairs, administrative law and industrial and labour reform. He has served on the Central Administrative Tribunal and also briefly as Secretary General of ASSOCHAM.

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