जर्सी डेविल: एक शापित आत्मा?

न्यू जर्सी, अमेरिका के उस प्रदेश में जहां मैं इन दिनों रह रहा हूँ, उसके दक्षिणी हिस्से में एक स्थान है जिसका नाम है पाइन बैरेन्स। बहुत ही खूबसूरत  —अनंत तक फैले आकाशचुंबी  सुंदर  पाइन वृक्षों का अपरिमेय  विस्तार,  पथरीली- रेतीली पगडंडियाँ, और दलदली झीलें। पर इसकी कोई कल्पना भी नहीं कर सकता कि दिन में जो  जंगल इतने लुभावने,गहरे और शांत दिखते हैं, रात ढलते ही इन पर एक अनजानी भयावहता उतर आती है। सैकड़ों वर्षों से स्थानीय लोग यह मानते आए हैं कि इन वृक्षों की छाया में एक शापित जीव मंडराता है—जिसका नाम है – जर्सी डेविल।

क्या है इस शापित जीव की कथा? और कैसे पैदा हुई यह मान्यता? लोग कहते हैं कि इस कहानी की शुरुआत 18वीं सदी के आरंभ में हुई। स्थानीय किंवदंती यह है कि इस इलाक़े में 300 साल पहले एक परिवार रहता था। अभाव, ग़ुरबत, और दुर्भाग्य का मारा, अपने अस्तित्व के संघर्ष में डूबा हुआ, और बेहद थका और निराश। इसी परिवार की गृहिणी थी लीड्स जिसे लोग मदर लीड्स के नाम से पुकारते थे। परिवार के  भरण पोषण का दायित्व उसी के शक्तिहीन कंधों पर था और इस दायित्व का निर्वहन वह करती थी पूरी निष्ठा और परिश्रम से, संपूर्ण समर्पण से । 

अक्सर जैसा इन ग़रीब परिवारों में होता है, बच्चे भी ज़्यादा ही पैदा होते हैं। मदर लीड्स पहले ही बारह बच्चों को जन्म दे चुकी थी लेकिन फिर भी जब तेरहवाँ बच्चा आया और उसे जन्म देने का समय हुआ तो ग़रीबी से संघर्ष करते थकी हुई  इस महिला के दिल से एक आह सी निकली। और कैसी आह? ऐसी, जो एक अनचाहा और भयावह श्राप बन गई। ‘लगता है इस बार मेरी कोख से शैतान ही पैदा होगा “ यह एक हारी हुई माँ की बद्दुआ थी या निराशा की घड़ियों की आत्म-प्रवंचना, यह तो मदर लीड्स ही जानें, लेकिन इसके बाद जो हुआ वह इतिहास बन गया।

वर्ष 1735 की वह रात एक बहुत तूफ़ानी रात थी। और मदर लीड्स को जो डर था, वही हुआ। शाम से ही उसको प्रसव पीड़ा होनी शुरू हुई, और मध्य रात्रि को, जब बिजली की चमक रह रह कर आकाश को चीर रही थी, उस अंधकार में डूबी झोपड़ी में दर्द से कराहते हुए उसने एक शिशु को जन्म दिया।

शिशु जन्मा। शुरू शुरू मैं तो वह सामान्य अन्य शिशुओं जैसा ही था। लेकिन बहुत तेज़ी से उसमे असाधारण परिवर्तन दिखने लगे। पहले शरीर विकृत हुआ – चेहरा घोड़े जैसा, कंधों से चमगादड़ जैसे  पंख निकल आये , पंजे नुकीले होने लगे,  और उसके पीछे के हिस्से से प्रकट हुई साँप की लहराती हुई पूँछ। उसकी आँखें लाल अंगारों की तरह दहकने लगी और उसकी आवाज़, आवाज़ न होकर  एक चीख बन गई, कोई साधारण चीख नहीं बल्कि एक हृदय विदारक चीख। और एक दिन धुएँ और राख के ग़ुबार के बीच वह घर की चिमनी से बाहर उड़ गया—और कहा जाता है कि फिर कभी लौटा नहीं। क्या माता की आह सच हो गई? क्या सचमुच उसने अपनी कोख से शैतान को जन्म दे दिया?

आने वाले वर्षों में गाँव-गाँव में कानाफूसी होने लगी। एक अजीब से शैतान नुमा दरिंदे का अस्तित्व-बोध भय और घबराहट की बड़ी वजह बन गया। किसानों की बकरियाँ आधी खाई हुई मिलतीं, मुर्गियाँ गायब हो जातीं, और पीछे बस अजीब खुरों के निशान रह जाते—कभी छत पर, कभी बर्फ पर, जहाँ कोई साधारण जीव क़तई नहीं पहुँच सकता। यात्री बताते कि घने अंधेरे में कोई पंखों वाला साया उनका पीछा करता है। शिकारी शपथपूर्वक कहते कि उन्होंने उसके पंखों की फड़फड़ाहट सुनी, पर दिखा कभी नहीं।

1909 की सर्दी में इस भय ने चरम छू लिया। उस साल एक दिन खूब बर्फ गिरी। इस भीषण बर्फ़बारी के बाद जब लोग जागे तो पूरे नगर में खुरों के निशान फैले थे—पोर्च पर, बाड़ों पर, यहाँ तक कि जमी हुई नदियों पर भी। लोग घरों में दुबक गए। कैम्पडेन शहर में तो, बताते हैं कि एक ट्रॉली पर यह पंखधारी दानव उतर आया। यात्रियों ने चीखें मारीं, पुलिस ने गोलियाँ चलाईं, लेकिन प्राणी बर्फ़ीले तूफ़ान में विलीन हो गया।

पूरा इलाका एक हफ़्ते तक दहशत में रहा। स्कूल बंद, फैक्ट्रियाँ खाली, लोग हथियार लेकर गश्त करने लगे। फ़िलाडेल्फ़िया तक खबर पहुँची कि गली-कूचों में उसकी लाल आँखें चमकती दिखी हैं। फिर अचानक जैसे आया था, वैसे ही वह गायब हो गया।

सदियाँ बीत गईं, पर पाइन बैरेन्स का सन्नाटा अब भी बरकरार है।
कई लोग जो वहाँ कैंपिंग के लिया जाते हैं, वे कहते हैं कि रात में तम्बुओं के बाहर खुरों की आहट सुनाई देती है।
गाड़ियों के ड्राइवर गवाही देते हैं कि कोई काला साया हिरण से भी तेज़ उनकी गाड़ी के सामने से गुज़र जाता है।
हाइकर्स मानते हैं कि हवा में कोई ऐसी आवाज़ गूँजती है जो न इंसानी है, न पशु की।

संशयवादी इसे अंधविश्वास मानते हैं। पर स्थानीय लोग इसके अस्तित्व को पूर्णतया स्वीकारते हैं। वे मानते हैं कि जर्सी डेविल नश्वर है, उसे न कोई गोली मार सकी और न ही ईश्वर की प्रार्थना ने उससे मुक्ति दिलाई। बाइबल में वर्णित शैतान का साक्षात स्वरूप है -जर्सी डेविल।

आज यह दंतकथा न्यू जर्सी की पहचान बन चुकी है—टैवर्न के साइनबोर्डों पर, किताबों में, यहाँ तक कि एक स्थानीय हॉकी टीम के नाम में भी। भले ही इस हँसी-ठिठोली पूर्ण प्रयास के पीछे जाहिर  तौर पर इस भय पर विजय पाने की मंशा हो लेकिन यह भय बरकरार है, न कम होता है न धूमिल पड़ता है। यह भय नहीं एक जीवित श्राप है जो अब भी पाइन बैरेन्स की गहरी, धड़कन तेज कर देने वाली छायाओं में साँस लेता है।

कहा जाता है, अगर आप किसी चाँदहीन रात को उन जंगलों से गुज़रें, और अचानक कोई चीख सुनें जो न इंसानी हो, न पशु की—तो रुकना मत। बिना पीछे देखे, तेज़ी से आगे बढ़ जाना।

Published by udaykumarvarma9834

Uday Kumar Varma, a Harvard-educated civil servant and former Secretary to Government of India, with over forty years of public service at the highest levels of government, has extensive knowledge, experience and expertise in the fields of media and entertainment, corporate affairs, administrative law and industrial and labour reform. He has served on the Central Administrative Tribunal and also briefly as Secretary General of ASSOCHAM.

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