कृष्ण

आज कृष्ण जन्माष्टमी है।

ईश्वर के ज्ञात अवतारों में जितना लिखा, गाया और सोचा गया है, उतना किसी और अवतार के बारे में नहीं। शास्त्र कहते  हैं कि कृष्ण ईश्वर के पूर्ण अवतार हैं, सोलह कलाओं से सम्पन्न। और कृष्ण की ज्ञात लीलाओं से इस धारणा की पुष्टि भी होती है।

और कृष्ण ने जितनी परम्पराएँ और मान्यताएँ तोड़ी हैं, उसकी तुलना का प्रयास भी अप्रासंगिक है क्योंकि इस अर्थ में तो दूर दूर तक कोई अवतार उनके समकक्ष नहीं हो सकता। राम ने तो इने -गिने प्रसंगों में ऐसा आचरण किया है। पेड़ों के पीछे छुप कर बालि के संहार और अपनी पत्नी का बिना किसी प्रमाण के अपने राज्य से निर्वासन को यदि छोड़ दें तो राम के आचरण में उनके कठोरतम आलोचक भी कोई दोष नहीं ढूँढ पाये हैं। 

लेकिन कृष्ण? कृष्ण ने तो आजीवन यही किया. नियम, परम्परायें, मान्यताएँ, कृष्ण का पूरा जीवन ही मानो  इन्हें तोड़ने में बीता। उनका पूरा जीवन मानो स्थापित सीमाओं को लांघने का एक अविराम प्रवाह था। प्रेम किया तो अपनी से अधिक उम्र की राधा से जो किसी और की परिणीता थी। युद्ध से भागने वाले वे इकलौते अवतार हैं, और महाभारत तो उनके नियमों और स्थापित आचरण के उल्लंघन की एक निरंतर गाथा है। प्रतिज्ञा की कि  कभी अस्त्र शस्त्र नहीं उठाऊँगा, लेकिन भीष्म के सन्मुख रथ का पहिया लेकर खड़े हो गये। और द्रोण को मरवाने के लिए छल का प्रयोग करने  में तनिक भी संकोच  नहीं किया, ‘अश्वत्थामा हतो’ के बाद पाँचजन्य फूंकने में कोई विलंब नहीं किया। कमोबेस यही कहानी कर्ण और जयद्रथ के मृत्यु की रही। जरासंध और दुर्योधन भी तो छल से ही मारे गये।

तो फ़िर  क्या है कृष्ण के जीवन चरित्र में जो उन्हें सर्वाधिक लोकप्रिय और अनुकरणीय बनाता है? क्या है वह संदेश जो हम सब को शक्ति देता है, साहस देता है, और प्रेरणा देता है?

मेरी समझ में कृष्ण का चरित्र कम से कम तीन आयामों में अलग है, विलक्षण है। एक है अपने आचरण और निर्णयों में विवेक की प्रधानता, उचित-अनुचित को समझने और समझाने की अद्वितीय क्षमता, दूसरा धर्म की परिभाषा को परिमार्जित और परिष्कृत करने का अभूतपूर्व योगदान, और तीसरा , इन सब में नितांत स्वार्थ हीनता। जो कुछ उन्होंने किया उसमें निजी स्वार्थ का अंश तक नहीं था; हर बार लोककल्याण ही ध्येय रहा।

विवेक क्या है? विवेक है उचित-अनुचित का सम्यक् और सही भेद, उन्हें समझाने और समझाने की अद्वितीय क्षमता, और अनुचित के विनाश के लिए सक्रियता और आत्मिक बल। कृष्ण ने अनुचित का कभी साथ नहीं दिया, और उनके उन्मूलन में चेष्टा में कभी कोई कमी भी नहीं की।

और धर्म के एक नई व्याख्या की आवश्यकता उस समय बन गई थी। धर्म और धर्मानुसार आचरण काल और परिस्थितियों के अधीन हैं। धर्म है सही कर्तव्यानुसार व्यवहार। इसके मूल सिद्धांत अपरिवर्तनीय हैं, लेकिन उनकी व्याख्या लचीली, काल और समय के अनुसार। कृष्ण ने स्वतः ऐसा ही किया और दूसरों से भी ऐसा ही करवाया।

कृष्ण का अपना स्व -अर्थ उनके कार्य कलापों में, उनके आचरण में, और उनके निर्णयों में कही दूर दूर तक भी नहीं था। उन्होंने उसी का साथ दिया, उन्हीं की रक्षा की जिन्हें रक्षा की आवश्यकता थी।

बचपन में कृष्ण पर पढ़ी किताबों में जिस किताब ने मेरी स्मृति में स्थायी स्थान बनाई  वह पुस्तक थी कन्हैयालाल मणिकलाल मुंशी द्वारा लिखित, ‘बंसी की धुन’। कई खंडों में थी यह उपन्यास नुमा किताब। लेकिन इत्री सुंदर, इतनी श्रेष्ठ, इतनी मर्मस्पर्शी, और इतनी रोचक और मन को बांधने वाली थी यह पुस्तक कि साठ साल बाद भी मुझे बहुत कुछ स्मरण है, इसमें वर्णित कथाएँ, उप-कथाएँ, और उनकी सरल व्याख्याएँ। लेकिन जो इस पुस्तक की सर्वश्रेष्ठ देन है वह यह समझ कि कृष्ण भी हम जैसे ही मनुष्य थे। एक अवतार के मानवीकरण का इतने सुंदर और मर्म को छू लेने वाला आख्यान मुझे आज तक नहीं मिला। और इससे यह बात समझ में आयी कि कृष्ण का पूरा जीवन और उनका पूरा आचरण एक मानवीय गतिविधि थी, उसमें कुछ भी दैविक नहीं था, चमत्कारिक अवश्य लेकिन ऐसा कुछ नहीं जो एक मनुष्य की क्षमता से परे हो, हाँ, ऐसा मनुष्य असाधारण होना चाहिए।

कृष्ण की लीलाओं का यह मानवीय स्वरूपण उनके अवतार को इसी लिये सर्वश्रेष्ठ बनाता है।

कृष्ण का दिया हुआ जीवन दर्शन भी ऐसा जो जीवन जीने की कला और विज्ञान दोनों के लिए आदर्श है, और जिसने इसे  समझ लिया और थोड़ा भी इसका समावेश अपनी जीवन पद्धति में कर लिया, उसका  लौकिक और पारलौकिक दोनों उद्धार सुनिश्चित हैं a। गीता जैसा जीवन दर्शन जो हमारी सांसारिक और आध्यात्मिक चेतना को परिष्कृत कर देता है, वह कृष्ण के अलावा और कौन दे सकता था जो सभी दृष्टियों से, सर्वथाभावेन संपूर्ण था। निष्काम कर्म का दर्शन और कर्म योग की महत्ता अनंत काल तक हम जैसे नश्वर प्राणियों को भी अमरत्व के उद्दाम लक्ष्य को पाने की अभिप्रेरणा दे सकते हैं। 

और कृष्ण जैसा प्रेम न किसी ने किया, न किसी ने दिया। राधा हो या मीरा, या फिर रुक्मिणी या सत्यभामा। या फिर सुदामा हों या अर्जुन। प्रेम करना और उसे जीना कोई सीखे तो कृष्ण से सीखे। प्रेम की जो परिभाषा और जो अभिव्यक्ति कृष्ण ने कर दी उसका सहस्रांश भी हमसे हो जाये तो हमारा जीवन अलौकिक हो जाये, धन्य हो जाये।

ऐसे ईश्वर को, ऐसे कृष्ण को, जो अवतार भी हैं और मानव भी, मेरा कोटिशः नमन है।

Published by udaykumarvarma9834

Uday Kumar Varma, a Harvard-educated civil servant and former Secretary to Government of India, with over forty years of public service at the highest levels of government, has extensive knowledge, experience and expertise in the fields of media and entertainment, corporate affairs, administrative law and industrial and labour reform. He has served on the Central Administrative Tribunal and also briefly as Secretary General of ASSOCHAM.

2 thoughts on “कृष्ण

Leave a reply to udaykumarvarma9834 Cancel reply