हम तीर्थ यात्रा क्यों करते है?

हम सभी तीर्थ यात्रा करते हैं। सादियों से करते आये हैं, और शायद सदियों तक यह परम्परा क़ायम रहेगी। लेकिन क्यों करते हैं ऐसी यात्रायें?

शताब्दियों से हम तीर्थ जाते रहे हैं, और संभवतः यह परंपरा तब तक चलेगी जब तक मनुष्य के भीतर जिज्ञासा की शक्ति और पीड़ा सहने की क्षमता बनी रहेगी। तो क्या यह प्रश्न—कि हम तीर्थ क्यों करते हैं—स्वयं में कोई अटपटा या बेमतलब प्रश्न है? शायद नहीं।

क्योंकि प्रश्न यह असंगत नहीं है,और  न ही अप्रासंगिक।

क्या ढूँढने  जाते हैं हम इन तीर्थों में। अतृप्त कामनाओं की प्राप्ति? स्वास्थ्य, अर्थ, यश, या  केवल पुण्य अर्जन की स्पृहा?  या फिर कुछ गूढ़तर, ज़्यादा गहरी, कामना? भौतिक संसार की इच्छाओं से परे एक संकल्प? 

शायद हम ईश्वर को ढूँढने जाते है, लेकिन ईश्वर तो सर्वत्र है। उसको पाने के लिए तीर्थ क्यों आना?

तो फिर हम क्या ख़ुद को ढूँढने जाते है? फिर उसके लिए अंतर्मुखी नहीं होना चाहिए? स्वयं का अनुसन्धान बाह्य परिवेश में कैसे संभव है? तो फिर क्या हम स्वयं, समाज, और ईश्वर के अंतरसंबंधों की गवेषणा की चाह रखते हैं? व्यष्टि और समष्टि के तादात्म्य को, उस समीकरण को बूझने  की कोशिश के लिए जाते हैं हम तीर्थ’?क्यों करते हैं हम तीर्थयात्रा? यह प्रश्न अक्सर अनुत्तरित रहता है। 

और क्या नास्तिक भी तीर्थ करते हैं? शायद हाँ, शायद नहीं। परम आस्तिकता और परम नास्तिकता—दोनों ही चरम बिंदु हैं। एक ईश्वर की उपस्थिति को प्रश्नातीत मानता है, तो दूसरा उसकी अनुपस्थिति को तार्किकता का सर्वोच्च स्वरूप।एक श्रद्धा की पराकाष्ठा है,  दूसरा कर्मण्यता की अंतिम प्रतिस्थापना। भेद क्या है? शायद कोई नहीं।

इन कठिन प्रश्नों को समझने की उत्कंठा और उत्कंठा की यह व्यथा तीर्थ यात्रा के महत्व को परिभाषित करती है। शायद।

और हम तीर्थों को क्या देकर वापस आते हैं? और क्या वापस लेकर आते हैं? निश्चय ही हम तीर्थों को अपवित्र  कर वापस लौटते हैं। अगर यह सही नहीं होता तो हमारे तीर्थ इतने प्रदूषित नहीं होते। 

लेकिन यदि हम अपना अहंकार, अपना अहम, अपना अमर्ष, अपनी दुर्भावनाएँ, अपने द्वेष  इन तीर्थों में छोड़ आते तो भी शायद तीर्थ यात्रा का उद्देश्य सफल हो जाता। पर क्या ऐसा होता है? अमूमन ऐसा नहीं होता। 

तो फिर इन तीर्थ यात्राओं का हासिल है क्या?

ये यक्ष प्रश्न हमेशा से उठते  रहे हैं, और सदैव उठते रहेंगे। इस पहेली की शाश्वत परीक्षा और इसका अनवरत अनुसंधान मानव की नियति भी है, प्रारब्ध भी, और उसकी चेतना का परिचय भी। हम में से कुछ इस पहेली को कुछ -कुछ  समझ पाते हैं। वे उन्मुक्तता के मार्ग पर निकल पड़ते हैं। लेकिन ऐसा सौभाग्य किसी किसी को ही नसीब होता है। 

अगर इन तीर्थों में हमे कुछ माँगना चाहिए, तो यह कि ईश्वर हमें वह मार्ग दिखाये जिस पर हम अग्रसरित  हों, और मुक्ति की अनुभूति की छटपटाहट हमारे भीतर आये। 

शायद तीर्थ एक खोज है। और यह खोज न कर्मकांड है, न पर्यटन—यह एक आंतरिक संवाद है। क्योंकि तीर्थ केवल आस्था का स्थल नहीं, प्रश्न का भी केंद्र है। श्रद्धा और संशय विरोधी नहीं, ईश्वर और जीव अलग नहीं, एक हैं, सहयात्री हैं। विज्ञान और विश्वासमंदिर और दूरबीनसाधक और वैज्ञानिक—ये सब समरस है, एक दूसरे से गुँथे हुए, जैसे कि लहरों की आती- जाती आवृत्तियाँ। इस प्रत्यक्ष अराजकता में ही कोई सच्चा क्रम छिपा है।

हम सब तीर्थ करते हैं—कभी बाहर, कभी भीतर। और हर तीर्थ के केंद्र में, एक प्रश्न झिलमिलाता है: “मैं कौन हूँ?” “मैं क्यों आया?”, “क्या लौटकर भी वही रहूँगा जो था?”

ढूंढता वही है जो ढूँढना चाहता है, है जो अनिश्चित से निश्चित की तरफ़ जाना चाहता है, जो अंधकार से प्रकाश की तरफ़ जाना चाहता है।शायद तीर्थ वो स्थान हैं जहाँ श्रद्धा प्रश्न बनती है, और प्रश्न मौन में घुल जाता है। और जहां मृत्यु अमरत्व की और अग्रसरित होती है।

तीर्थ उत्तर नहीं देते, वे हमें प्रश्नों की गरिमा सौंपते है। तीर्थ किसी गंतव्य तक पहुँचना नहीं,
बल्कि स्वयं से मिलने की अनुमति लेना है। और जब ऐसी अनुमति मिल जाती है तो असंभव भी संभव हो सकता है। राम ने भी यही अनुमति माँगी थी।

“धर्मात्मा सत्यसंधश्च रामो दाशरथिर्यदि।
पार्थिवान् सहस्रं मे समुद्रमन्तरं गतम्॥”

यदि मैं सत्य में स्थिर हूँ,तो यह जल मुझे पार कर देगा।

तीर्थ भी हमें पार लगा सकते हैं, राम जैसी श्रद्धा हो तो।

Published by udaykumarvarma9834

Uday Kumar Varma, a Harvard-educated civil servant and former Secretary to Government of India, with over forty years of public service at the highest levels of government, has extensive knowledge, experience and expertise in the fields of media and entertainment, corporate affairs, administrative law and industrial and labour reform. He has served on the Central Administrative Tribunal and also briefly as Secretary General of ASSOCHAM.

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