समुद्र से वार्तालाप 


मैं पम्बन पुल पर खड़ा हूँ। दोनों ओर अथाह समुद्र फैला है —एक ओर नावों की आंदोलित किंतु नम्र निश्चलता, और दूसरी ओर लहरों की अनवरत पुकार। हवा कभी शीतलता की अनुभूति देती थी, और फिर हो जाती थी ऊष्मा भरी। बादल सूरज से आँखमिचोली खेलते रहे थे। समुद्र की लयबद्ध गर्जना में कुछ था जो मुझे भीतर ही भीतर धीरे-धीरे बदल रहा था —जैसे आत्मा कोई पुराना बोझ उतार रही हो।

वहाँ खड़े मुझ पर और शायद सभी पर जैक कूस्टो की आत्मा समा जाती है। ‘“The sea, once it casts its spell, holds one in its net of wonder forever.” उसने कहा था। पम्बन पर खड़े होकर लगा, समुद्र का जादू मिथक नहीं है, सच है। सामने फैली यह अथाह अगाध, जलराशि विशाल थी, रहस्यपूर्ण थी, और फिर भी अंतरंग थी।—मानो चेतना का विस्तार स्वयं लहर बनकर आंदोलित हो रहा हो।

सामने दो पुल थे—नवीन पम्बन रेल ब्रिज, जो विज्ञान और संकल्प का नवीन चमत्कार था; और उसके पास खड़ा पुराना, 1914 में बना पम्बन पुल—जीर्ण, किंतु अडिग। एक वर्तमान की गति था, दूसरा अतीत की स्मृति। दोनों मिलकर भारत का प्रतिबिंब बना रहे थे —जड़ से जुड़े , लेकिन आकाश की ओर उन्मुक्त उड़ान भरते हुए।

मैं वहां यात्री था—न केवल तन से, अपितु चेतना से भी। श्रद्धा और तर्क के बीच झूलता, आंदोलित होता एक नागरिक, एक साधक।

वह द्वीप जो समय को रोकता है
रामेश्वरम् केवल एक तीर्थ नहीं, एक मोड़ है। जहाँ काशी मृत्यु को शांति देती है, वहाँ रामेश्वरम् जीवन को विराम। यह हिंदुस्तान के सुदूर छोर पर बसा है, श्रीलंका को लगभग छूता हुआ। यहाँ दृष्टि भी थम जाती है। इसकी हवा में नमक, सूर्य और किंवदंती साथ बहते हैं।

यहीं शंकराचार्य ने रामनाथस्वामी मंदिर में शिवलिंग की स्थापना की थी—अद्वैत का एक मूर्त संकेत। वह मंदिर, जिसकी हज़ार स्तंभों वाली परिक्रमा समय को स्मृति की तरह नहीं , बल्कि साँस की तरह जीवंत करती है, कितने युगों की परंपराओं को आत्मसात करती हुई।

और यह भूमि है डॉक्टर ए.पी.जे. अब्दुल कलाम की भी—एक नाविक का बेटा, जिसने तारों से संवाद किया। रामेश्वरम् का कोई धरती पुत्र हो सकता है तो कलाम ही हो सकता है, एक साथ प्रार्थना और प्रक्षेपण।

एक नगरजो अपने ही तीर्थत्व से जूझ रहा है
पर कुछ कदम भीतर जाएँ, तो पवित्रता की शांति मानवीय कोलाहल में बदल जाती है। संकरी गलियाँ, शोर, श्रद्धालुओं की भीड़, प्लास्टिक और दुर्गंध का बिखराव। श्रद्धा नहीं टूटी—लेकिन व्यवस्था थक गई है।

प्रश्न उठते हैं। क्या श्रद्धा स्वच्छ नहीं हो सकती? क्या तीर्थों को इस तरह नहीं संभाला जा सकता है कि वे स्वयं को न खो दें? क्या ईश्वर को खोजते हुए हम उसके मंदिर को बिगाड़ नहीं रहे?

इन प्रश्नों का उत्तर बुद्धि से नहीं, चेतना से ही आएगा।

परंतु इसी अस्तव्यस्तता में कुछ शाश्वत भी है। विश्वास केवल मंत्रों में नहीं, मानस में भी जीवित है। यहाँ नास्तिकता भी श्रद्धा की सहगामी है—बस उनकी भाषा अलग है।

पुनः लौटना उस पुल पर
मैं शाम को वापस इस पुल पर लौटा। संध्या की धूप स्टील की पटरी पर पिघली हुई सोने-सी गिरने लगी थी ,और  समुद्र ने एक दर्पण सा रूप ले लिया था —आकाश का दर्पण। 

उस क्षण लगा, कि सच्चा क्रम शायद इसी अराजकता में है।श्रद्धा और संशय, मंदिर और मिसाइल —विरोधी  नहीं, पर्याय हैं। साधक और वैज्ञानिक, एक ही लहर की दो आवृतियाँ।

रामेश्वरम् हमें उत्तर नहीं देता—वह प्रश्नों का आभास देता है। यहाँ आना किसी गंतव्य तक पहुँचना नहीं, स्वयं से मिलना है।यह वह स्थान है जहाँ  प्रश्न जन्म लेते हैं—और यथार्थ, उत्तर की जगह मौन में मिलता है।

और पुल?

यह केवल इस्पात या पत्थरों से नहीं बना, यह तो भारत के संकल्प और शक्ति का प्रीतिनिधित्व करता है। यह तो एक रूपक है—जीवन का, भारत का,  और उस आत्मा का जो खोजती है। उन हाथों का, जो निर्माण करते हैं।

Published by udaykumarvarma9834

Uday Kumar Varma, a Harvard-educated civil servant and former Secretary to Government of India, with over forty years of public service at the highest levels of government, has extensive knowledge, experience and expertise in the fields of media and entertainment, corporate affairs, administrative law and industrial and labour reform. He has served on the Central Administrative Tribunal and also briefly as Secretary General of ASSOCHAM.

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