उगते हुए सूर्य देव को पानी में खड़े होकर अर्घ्य देकर आज प्रातः छठ महापर्व का अनुष्ठान संपन्न हो गया। मांगलिक गीतों और परस्पर मिलन के सौहार्द्र से नदी और सरोवरों के घाट अनुगूँजित और प्राणमय हो उठे।
अब सब घर जाकर व्रत तोड़ेंगे और एक हर्षमय अनुभूति सभी को संतृप्त कर देगी।
शुचिता और पवित्रता के मापदंड पर शायद ही सनातन धार्मिक वांगमय कोई व्रत हो, जिसकी तुलना छठ महापर्व से की जा सके। चार दिन तक चलने वाले इस अनुष्ठान में पवित्रता तथा आत्मानुशासन की जैसी व्यापक व्यवस्था है, वह किसी और व्रत त्योहार में देखने को नहीं मिलती। इसमें भी कोई संदेह नहीं कि शुचिता के इस बाह्य प्रक्रिया में आंतरिक शुचिता तो कुछ न कुछ हद तक हो ही जाती होगी।
छठ पर्व का सार ही पवित्रता और अनुशासन है। सूर्य देव जिन्हें हम इस चार दिवसीय पर्व के दौरान प्रसन्न करना चाहते हैं, उनके अनुशासन और कर्तव्य की भावना के समकक्ष शायद ही कोई और देवता ठहरे।। सूर्य कभी उगना नहीं भूलता और न ही कभी अस्त होना। ऐसे कठोर अनुशासन की तुलना करना असंभव है। और अग्नि से अधिक पवित्र और क्या हो सकता है, जो सूर्य का मूल है। इसलिए छठ एक ऐसा पर्व है जिसमें दैवीय ऊर्जा के इन दो रूपों का उत्सव है, जो ऊर्जा और प्राण दोनों देती हैं।
यदि कोई शास्त्रों का अध्ययन करे, तो आश्चर्यजनक लगेगा कि प्रारंभ में सूर्य को वह सर्वोच्चता प्राप्त नहीं थी जो आज है। हमारे सबसे पुराने शास्त्र, ऋग्वेद में सैकड़ों सूक्त हैं, जिसमें 50 से अधिक देवताओं – इंद्र, अग्नि, सोम, अश्विन, मरुत, वरुण, मित्र, उषा और अन्य का उल्लेख है। सूक्तों की अधिकतम संख्या इंद्र और अग्नि को समर्पित है। स्पष्ट है, इंद्र और अग्नि उस समय के सबसे महत्वपूर्ण देवता प्रतीत होते हैं जब ऋग्वेद के शुरुआती हिस्से अस्तित्व में आए थे। दिलचस्प बात यह है कि सूर्य की पत्नी उषा, उस समय सूर्य का सबसे पहला प्रतिनिधित्व करती हैं।
लेकिन ऋग्वेद एक लंबे समय में विकसित हुआ है। वास्तव में, इसके सूक्त समय के साथ विकसित होती सोच का प्रतिनिधित्व करते हैं। यह ब्रह्म की अवधारणा में परिणत होता है, जो हमेशा विद्यमान, सर्वव्यापी, अपरिवर्तनीय, अवर्णनीय, अव्यक्त वास्तविकता है, जिसे आरण्यक और उपनिषद् (वेदांत) में और अधिक परिष्कृत और विस्तृत किया गया है। विचारों की इस विकास यात्रा के दौरान यह अवधारणा भी विकसित हुई: एकं सद् विप्रा बहुधा वदन्ति (एक (एकम्) वास्तविकता (सत्) है जिसके बारे में जीवंत व्यक्ति (विप्र) विभिन्न तरीकों से (बहुधा) बोलते हैं (वदन्ति)। (ऋग्वेद, १.१६४.४६.)। ऋग्वेद के १०वें मंडल में एक श्लोक कहता है कि ये सभी इंद्र,मित्र, वरुण, अग्नि, एक ही हैं। इसलिए सनातन की यह विकासवादी और चुनौतीपूर्ण विशेषता बहुत ही आकर्षक और कभी-कभी रहस्यमय, लगभग अबूझ हो जाती है।
इस दिव्य उत्सव की कम से कम तीन अलग-अलग विशेषताएं हैं जो इसे अद्वितीय बनाती हैं और इसे और व्रतों से अलग बनाती हैं। पहली विशेषता है डूबते हुए सूर्य की प्रमुखता। हर कोई उगते हुए सूर्य को नमन करता है। इस त्योहार में, सबसे पहले डूबते हुए सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है, उसके बाद अगली सुबह उगते हुए सूर्य को दूसरा अर्घ्य दिया जाता है। इस स्पष्ट उलटफेर का आध्यात्मिक निहितार्थ निस्संदेह गूढ़ है जो जिज्ञासु मन को आकर्षित अवश्य करती होगा । इसकी असामान्यता तो सामान्य जन को भी अचरज में डालती होगी।
छठ की तरह नारी शक्ति का उत्सव मनाने वाले बहुत कम त्यौहार हैं। यह त्यौहार भगवान सूर्य का स्मरण करता है, लेकिन यह सूर्य की दो पत्नियों, संध्या और उषा; और उनकी बहन छठी मैया के अस्तित्व का भी जश्न मनाता है। ऊर्जा की महिला अभिव्यक्ति को दिए गए महत्व ने शायद ही कभी पुरुष ऊर्जा के एक आवश्यक और अपरिहार्य पूरक के रूप में महिला ऊर्जा की प्रमुखता का ऐसा स्पष्ट प्रदर्शन देखा हो। अनेक अर्थों में यह पर्व पुरुष और प्रकृति के शाश्वत अंतर्संबंध का ही निरूपण है, जो सृष्टि का सर्वमान्य आधार है।
एक और मामले में यह त्यौहार अद्वितीय है। इसका उद्देश्य सूर्य देव को प्रसन्न करना है, लेकिन यह नदियों, जल के स्रोतों और इस अर्थ में मानव जाति को जीवन प्रदान करने वाले जल तत्व को भी नमन करता है। सूर्य और नदियाँ प्रकृति के अग्नि और जल तत्वों का प्रतिनिधित्व करते हैं। और उनकी उपासना के पीछे जो अंतर्निहित प्रमुखता है, वह है इन तत्वों को स्वच्छ और प्रदूषण रहित रखना। इस अनुष्ठान में पर्यावरण संरक्षण और संवर्धन का संदेश सूक्ष्म और मजबूत दोनों ही है। “सूर्य आत्मा जगत्स्तुस्तुश्च” सूर्य, निस्संदेह न केवल सभी भौतिक ऊर्जा का स्रोत है, बल्कि दुनिया की आत्मा और इसके अस्तित्व का कारण भी है। इसलिए, उसके प्रति कृतज्ञता पूरी तरह से न्यायोचित और आवश्यक है। छठ इस कृतज्ञता की एक भावपूर्ण और आनंदमय अभिव्यक्ति बन जाती है।
एक और आयाम है जो समझने की आवश्यकता हम सब को है। शुद्धता और अनुशासन का तत्व , जो छठ को परिभाषित करता है, हमारे सामाजिक जीवन को पोषित और मजबूत करने के लिए भी उतना ही प्रासंगिक और आवश्यक है। एक राष्ट्र जो अनुशासित है, जो अपने आचरण में ईमानदार है; जो गरीबी, अज्ञानता, अन्याय और असमानताओं की अशुद्धिओं से मुक्त है, वही इस पर्व को सच्चे अर्थों में मना भी सकता है और आत्मसात् भी कर सकता है। एक कलंकित और अपवित्र राष्ट्रीय चरित्र छठ की शुचिता का उपहास ही कर सकता है।
छठ पर्व में जब सूर्य देव का की चमकता लाल बिंब बहती नदी की नारंगी सतह पर धीरे-धीरे उतरता हुआ अदृश्य हो जाता है, कुछ घंटों बाद दूसरी तरफ अधिक चमक और ऊर्जा के साथ उभरने के लिये, तो एक बहुत अर्थपूर्ण संदेश भी मन में कौंध जाता है,
‘उदये सविता रक्तो रक्तश्चास्तमये तथा । सम्पत्तौ च विपत्तौ च महातामेकरूपता ॥’
(सूर्य उगते और डूबते समय एक जैसा दिखता है। महापुरुष भी अच्छे और बुरे दोनों समय में एक जैसे रहते हैं।)
अति श्रेष्ठ वर्णन ।अत्यंत सारगर्भित, प्रामाणिक एवम् शुद्ध संस्कृतनिष्ठ भाषा में अभिव्यक्त!हार्दिक बधाई ।शीघ्र स्वास्थ्य-लाभ की अनन्त शुभकामनाएँ ।जय शंकर मिश्र लखनऊ Sent from my iPhone
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हार्दिक धन्यवाद। आप जैसे सुधी और अज्ञ व्यक्ति की प्रतिक्रिया मेरे लिये बहुत अर्थपूर्ण है।
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