‘एक स्वीकारोक्ति”

(“माँ” — एक ऐसा नाम जो पुकार नहीं, एक पूरी चेतना है।यह कविता एक बेटे की आत्मस्वीकृति है, जिसमें माँ की उपेक्षा नहीं, माँ को ‘सिर्फ माँ’ मान लेने की भूल का पछतावा है।यह उन सबके लिए है जो माँ के रहते व्यस्त रहे, और अब जब वह नहीं हैं, तो शून्यता में उसे ढूँढ़ते हैं।) जब तू थी,तो तुझसे शिकायतें थीं—कभी खानेContinue reading “‘एक स्वीकारोक्ति””