शायद ग़ालिब ने ऐसा लिखा था। इन थोड़े और साधारण शब्दों में जो दिलकशी है, वह अद्भुत है। इस मर्मस्पर्शी अभिव्यक्ति में बहुत कुछ छुपा है। इसमें परेशानी है, बेचैनी है, असहायता है, असहजता है, और मन के अबूझ भटकाव का एहसास भी है।
मृत्यु—जीवन की सबसे अटल, सबसे शाश्वत सच्चाई। एक अमर यक्ष-प्रश्न जिसे युधिष्ठिर ने समझा, लेकिन जो हम में से बहुतों के लिए आज भी दुरूह है. और इसलिए , हममें से अधिकांश इसे जीवन के एक तल्ख़, पीड़ादायक और भयावह अंत के रूप में देखते हैं। कुछ बिरले ही होते हैं, जो उसे तटस्थ भाव से स्वीकार कर पाते हैं।
“जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च।
तस्मादपरिहार्येऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि।।”
जन्में हुए की मृत्यु निश्चित है और मृत का जन्म निश्चित है। इसलिए, इस अनिवार्य विषय पर तुम्हें शोक नहीं करना चाहिए , ऐसा गीता बताती है. जो चला गया वह शोक करता है या नहीं यह तो जो चला गया वही जाने. शोक तो जो रह जाते हैं वे ही मनाते हैं. लेकिन मृत्यु की चिंता तो शास्वत है, उतनी ही जितनी मृत्यु है.
अगर ऐसा नहीं होता तो हमारी प्रार्थनाओं में अनायास मृत्यु की अभिलाषा इतनी प्रबल नहीं होती.
अनायासेन मरणम्, बिना दैन्येन जीवनम्,
देहांते तव सान्निध्यं देहि मे परमेश्वर।
अर्थात् जीवन गरिमा से भरा हो, और मृत्यु सहज, अनायास, बिना पीड़ा के।
वास्तविकता तो यह है कि मृत्यु की निश्चितता को जानते हुए भी हम इस अंतिम क्षण के लिए शायद ही तैयार होते हैं.
यदि जीवन एक रंगमंच है, जैसा कि अनेक विचारकों ने कहा है, तो मृत्यु उसका अंतिम दृश्य है—एक ऐसा दृश्य, जो अवश्य घटित होना है। आश्चर्य यह है कि जीवन के अन्य सभी महत्वपूर्ण प्रसंगों के लिए हम पूर्वाभ्यास करते हैं, पूरे मनोयोग और निष्ठा के साथ। पर इस अंतिम और निर्णायक दृश्य के लिए हम कोई रिहर्सल क्यों नहीं करते?
अपनी सम्पूर्ण बुद्धि और विवेक के बावजूद शायद इसलिए कि हमें यह समझ में ही नहीं आता कि मृत्यु का पूर्वाभ्यास किया कैसे जाए।
दरअसल, मृत्यु का पूर्वाभ्यास मृत्यु का अभिनय नहीं हो सकता. यह तो अपने जीवन के भीतर हठपूर्वक ले आने वाले परिवर्तन से ही संभव दिखता है. और इस परिवर्तन का नाम है—‘जीवन छोड़ने की कला’ का ज्ञान, और अभ्यास। जीवन हमें हर दिन कुछ न कुछ सिखाता है, और हर दिन हमसे कुछ न कुछ छीन भी लेता है—यौवन, संबंधों का आवेग, इच्छाओं की तीव्रता। यदि हमारा मन इन छूटती हुई चीज़ों को सहज भाव से स्वीकारना सीख लें, तो शायद यही पूर्वाभ्यास है।
मृत्यु का पूर्वाभ्यास, वस्तुतः, अपने ‘मैं’ की पकड़ को धीरे-धीरे ढीला करना है। यह समझना है कि जो कुछ हम अपना मानते हैं—संबंध, उपलब्धियाँ, स्मृतियाँ—वे सब समय के साथ बदलने वाले, विलीन हो जाने वाले आयाम हैं। जब हम इस सच्चाई को बौद्धिक स्तर पर नहीं, बल्कि भावनात्मक स्तर पर स्वीकारने लगते हैं, तब एक प्रकार की आंतरिक शांति जन्म लेती है।
यह पूर्वाभ्यास हमें अपने ही जीवन को अपने से विलग कर, एक दर्शक की तरह निरपेक्ष भाव से देखने की क्षमता देता है। जैसे कोई अभिनेता मंच से हटकर अपने ही अभिनय को देखता है, वैसे ही हम अपनी स्मृतियों, सफलताओं और विफलताओं को एक कथा की तरह देखने लगते हैं। तब वे हमें बाँधती नहीं, बल्कि हमारे अनुभव को समृद्ध करती हैं। भगवद्गीता के अनुसार द्रष्टा भाव ही मोक्ष है.
मृत्यु का भय प्रायः हमारे अधूरेपन से जुड़ा होता है—कुछ काम अधूरे रह गए, कुछ शब्द अनकहे रह गए, कुछ संबंध पूरी तरह जिए नहीं जा सके। शायद पूर्वाभ्यास का एक अर्थ यह भी है कि हम इस अधूरेपन के साथ जीना सीख लें। हर चीज़ को पूर्ण करने का आग्रह छोड़ दें, और जीवन को जैसा है, जितना है, उसी रूप में स्वीकार करें।
आध्यात्मिक दृष्टि से देखें तो मृत्यु ‘अहं’ के विघटन का नाम है। तो क्या पूर्वाभ्यास यह हो सकता है कि हम अपने ‘मैं’ को थोड़ा-थोड़ा न्यूनतर करें? अपने अस्तित्व को केंद्र में रखकर नहीं, बल्कि एक व्यापक प्रवाह के हिस्से के रूप में देखना सीखें?
जैन परंपरा में संलेखना का उल्लेख आता है, जहाँ साधु-साध्वियाँ पूर्ण सजगता के साथ मृत्यु का वरण करते हैं। यह मृत्यु का पूर्वाभ्यास नहीं, बल्कि उसका अंतिम, सचेत स्वीकरण है। परंतु उसका सार हमें यह अवश्य सिखाता है कि जीवन में ही एक प्रकार की विरक्ति, एक दर्शक भाव, एक निर्विकार सजगता विकसित की जा सकती है—जो हमें उस अंतिम क्षण के लिए तैयार करती है।
शायद मृत्यु का पूर्वाभ्यास कोई अलग से किया जाने वाला कर्म नहीं हो सकता। वह जीवन जीने का ही एक ढंग है—थोड़ा विलग, थोड़ा विरक्त, जिसके पीछे एक सचेष्ट सोच भी है और एक सजग प्रयास भी. जब हम हर दिन थोड़ा-थोड़ा छोड़ना सीख लेते हैं, जब हम अपने ही जीवन को एक कथा की तरह देखने लगते हैं, जब अपूर्णता हमें बेचैन नहीं करती—तब हम उस अंतिम दृश्य के लिए तैयार हो रहे होते हैं, बिना किसी औपचारिक रिहर्सल के।
और तब, जब वह क्षण आएगा, पटाक्षेप का समय, जब हम मंच से विदा लेंगे —चिंता मुक्त, निर्भय, निर्भाव – एक शांत, स्वीकृत पूर्ण विराम की तरह।
तब शायद यह प्रश्न भी अनुत्तरित नहीं रहता —
“मौत का एक दिन मुअय्यन है,
नींद क्यों रात भर नहीं आती?”