आज राम नवमी है। देश के कई हिस्सों में यह कल ही मना ली गई। इसे भारत के पंचांगों की प्रतिभा कहें या वैज्ञानिक उत्कृष्टता का प्रमाण कि त्योहार और उत्सव हम सुविधानुसार एक दिन भी मना सकते हैं और कई दिन भी।
लेकिन राम नवमी चाहे कल मानी हो या आज, राम के प्रति श्रद्धा गहरी भी है और व्यापक भी। राम केवल श्रद्धा के केंद्र नहीं, बल्कि जीवन की मर्यादाओं के सर्वोच्च प्रतिमान हैं। उनके व्यक्तित्व और कृतित्व का मूल तत्व—उनके चरित्र का सबसे उद्दात आयाम मर्यादा ही है. उन्होंने हर संबंध में, चाहे वह पिता, पुत्र, भ्राता, मित्र, पति, राजा या प्रजा का हो, और या शत्रु का, सदैव मर्यादा का निर्वाह किया। वनवास या साम्राज्य, पराभव या ऐश्वर्य, शत्रु या मित्र, आपदा या संपदा, उनकी मर्यादा न विघटित हुई, न विकृत. इसी कारण उनका चरित्र ‘मर्यादा पुरुषोत्तम’ के रूप में प्रतिष्ठित हुआ।
वस्तुतः संकट में, आपदा में, और चुनौती वाली परिस्थितियों में राम का चरित्र मर्यादा के अप्रतिम प्रतिमान प्रस्तुत करता है. राजा राम से कहीं अधिक उद्दाम और श्रेष्ठ है वनवासी राम का चरित्र और आचरण। शक्तिमान होते हुए भी राम ने शक्ति का प्रयोग तभी किया जब शक्ति ही समस्या के समाधान का एकमात्र विकल्प बचा. दिनकर ने राम के पौरुष की व्याख्या के लिए विचारपूर्वक ही इन शब्दों का चयन किया,
तीन दिवस तक पंथ मांगते
रघुपति सिन्धु किनारे,
बैठे पढ़ते रहे छन्द
अनुनय के प्यारे-प्यारे।
उत्तर में जब एक नाद भी
उठा नहीं सागर से
उठी अधीर धधक पौरुष की
आग राम के शर से।
सिन्धु देह धर त्राहि-त्राहि
करता आ गिरा शरण में
चरण पूज दासता ग्रहण की
बँधा मूढ़ बन्धन में।
सच पूछो, तो शर में ही
बसती है दीप्ति विनय की
सन्धि-वचन संपूज्य उसी का
जिसमें शक्ति विजय की।
सहनशीलता, क्षमा, दया को
तभी पूजता जग है
बल का दर्प चमकता उसके
पीछे जब जगमग है।
लेकिन अद्वितीय शक्ति के स्वामी राम ने मर्यादा का मार्ग कभी नहीं छोड़ा. लेकिन अमर्यादित आचरण को दंडित करने में भी कभी संकोच नहीं किया.
आज जब हम अपने व्यक्तिगत जीवन, पारिवारिक व्यवहार, सामाजिक आचरण और राष्ट्रीय चरित्र पर विचार करते हैं, तो यह स्पष्ट होना कठिन नहीं है कि जिन संकटों का हम सामना कर रहे हैं, उनमें हमारे अमर्यादित आचरण की बड़ी भूमिका है। और यदि इस दृष्टि को व्यापक कर विश्व पर डालें, तो सामाजिक विघटन, नैतिक असंतुलन, संवादहीनता और तीव्र होते संघर्ष—इन सबके मूल में भी मर्यादा का ह्रास ही दिखाई देता है। जब व्यक्ति अपनी सीमाएँ भूल जाता है, और जब सत्ता तथा समाज दोनों ही संयम और संतुलन से विमुख हो जाते हैं, तब संकट केवल बाह्य नहीं रह जाते, वे भीतर तक उतरकर गहरे और दीर्घकालिक बन जाते हैं।
ऐसे समय में राम का स्मरण मात्र एक अनुष्ठान नहीं, हमारी श्रद्धा का सामूहिक उद्घोष नहीं, बल्कि गहन आत्ममंथन का निमंत्रण है। यह अवसर हमें स्वयं से यह प्रश्न अवश्य करने का अवसर देता है कि क्या हम अपने विचारों, वचनों और कर्मों में उस मर्यादा का पालन कर रहे हैं, जो भगवान राम का पर्याय है और जो हमारे जीवन और समाज को संतुलित, गरिमामय और स्थिर बना सकता है.
इस रामनवमी का उत्सव तभी सार्थक होगा, जब हम प्रभु राम का स्मरण करते हुए अपने जीवन में मर्यादा को पुनः प्रतिष्ठित करने का संकल्प ले सकें। शायद यही वह निर्णायक परिवर्तन हो, जो व्यक्ति से समाज और समाज से विश्व तक संतुलन और सामंजस्य को पुनर्स्थापित कर सके।
हम सभी अपने व्यतिगत और सार्वजनिक जीवन में इच्छापूर्वक मर्यादा का संवरण कर सकें, प्रभु राम की इस से श्रेष्ठतर आराधना और क्या होगी?
रामनवमी के इस पावन अवसर पर आपको और आपके परिवार को अनंत, अशेष मंगलकामनाएँ।