सिलिंडर, अफ़वाहें और हमारा राष्ट्रीय चरित्र

भारत एक अद्भुत देश है। यहाँ संकट कभी-कभी आता है, लेकिन उसकी अफ़वाह उससे पहले ही पहुँच जाती हैं—और अक्सर उससे ज़्यादा समय तक ठहरती भी हैं।

रसोई गैस के संभावित संकट की एक खबर इन दिनों देश भर में हवा की तरह फैल रही है। दिलचस्प बात यह है कि अफ़वाहों की रफ़्तार सुनामी की तूफानी हवाओ से कहीं तेज़ है।

व्हाट्सऐप समूहों में मानो आपातकालीन बैठकें चल रही हैं। पड़ोसी एक-दूसरे से बेहद गोपनीय लहजे में पूछ रहे हैं   
आपके सिलिंडर में कितनी गैस बची है?”

कुछ घरों में तो माहौल ऐसा है मानो सभ्यता की आख़िरी लौ उसी चूल्हे पर टिमटिमा रही हो।

लेकिन जो लोग थोड़ा पुराना समय देख चुके हैं, उन्हें यह घबराहट कुछ अजीब-सी लगती है। उन्हें वे दिन याद हैं जब गैस सिलिंडर किसी साधारण घरेलू वस्तु का नहीं, बल्कि प्रतिष्ठा, धैर्य और कभी-कभी भाग्य का प्रतीक हुआ करता था।

उन दिनों गैस कनेक्शन मिलना कोई साधारण प्रक्रिया नहीं थी। आवेदन दिया जाता था और फिर प्रतीक्षा—महीनों, कभी-कभी वर्षों तक। फ़ॉर्म सरकारी दफ्तरों के रहस्यमय गलियारों में घूमते रहते थे और आशा धीरे-धीरे परिपक्व होती रहती थी।

रिफ़िल बुक कराना भी किसी छोटे अभियान से कम नहीं था। टेलीफोन या तो व्यस्त रहता था या गहरी दार्शनिक चुप्पी में डूबा हुआ। अगर किसी तरह बुकिंग दर्ज हो गई, तो घर में संयम का नया अध्याय शुरू हो जाता था।

चाय सोच-समझकर बनती थी। प्रेशर कुकर को लगभग ध्यान की मुद्रा में देखा जाता था। हर जलती लौ के पीछे एक नैतिक जिम्मेदारी होती थी।

और जब अंततः सिलिंडर घर पहुँचता था, तो डिलीवरी वाला किसी दूर के रिश्तेदार की तरह स्वागत पाता था।

आज परिस्थितियाँ बिल्कुल अलग हैं। अनेक घरों में पाइपलाइन से गैस आती है। ऑनलाइन बुकिंग कुछ सेकंड में हो जाती है। सिलिंडर आम तौर पर समय पर पहुँच जाते हैं।

फिर भी जैसे ही कमी की हल्की-सी चर्चा उठती है, कुछ लोग तुरंत अतिरिक्त सिलिंडर जमा करने लगते हैं—मानो कोई लंबा घेराव शुरू होने वाला हो।

और फिर सामने आते हैं इस छोटे से नाटक के कुछ निकृष्ट  पात्र —जमाखोर और कालाबाज़ारी करने वाले। चाहे वे अवसर देखकर सक्रिय होने वाले व्यापारी हों या अनावश्यक भय में घर में अतिरिक्त सिलिंडर जमा करने वाले लोग—दोनों ही स्थिति को बिगाड़ते हैं। अफ़वाह, घबराहट और जमाखोरी अक्सर वही संकट पैदा कर देती है, जिससे बचने की बात कही जाती है।

और फिर हमारे लोकतंत्र का एक अनिवार्य पात्र भी मंच पर आता है—सक्रिय विपक्ष।

सरकार की आलोचना करना उसका अधिकार और कर्तव्य दोनों है। लेकिन हर वैश्विक संकट को घरेलू षड्यंत्र में बदल देना भी शायद लोकतांत्रिक विवेक की सर्वोच्च अभिव्यक्ति नहीं कहीं जा सकती । यदि दुनिया के ऊर्जा बाज़ार में उथल-पुथल हो रही है, तो उसका असर भारत पर भी पड़ेगा—यह स्वीकार करना कोई वैचारिक पराजय नहीं है, और न ही सरकार की विफलता है. लेकिन ऐसा कहना शायद राजनीति के इस मौजूदा विषैले संदर्म्भ में कुछ ज़्यादा ही सरल और रचनात्मक लगेगा. हमें तो कुछ अटपटा और नकारात्मक करने का अभ्यास और आदत हो चली है. इस आपदा में सरकार को घेरना तो समझ में आता है लेकिन इस तथाकथित संकट को बढ़ा चढ़ा कर प्रस्तुत करना तथा इसमें सरकार के नीतिओं की विफलता ढूँढना कुछ सीमा तक तो उचित ठहराया जा सकता है लेकिन एक वैश्विक संकट में सरकार की नीतियों की विफलता का फ़ैसला सुनाना और उसकी विदेश नीति के ऊपर इस संकट का ठीकरा फोड़ना भी ग़लत और अनुचित होगा.

कल्पना कीजिए, कितना सुखद दृश्य होता यदि विपक्ष कहता—
हाँ, थोड़ी कठिनाई है। आइए हम सब मिलकर इसका सामना करें। अफ़वाह न फैलाएँ, ज़रूरत से अधिक भंडारण न करें, और मुनाफाखोरों की सूचना प्रशासन को दें।” क्या ही अच्छा होता यदि विपक्ष यह कहता की संकट तो है लेकिन आइए हम मिल कर इस संकट का सामना करते हैं, थोड़ी कमी अवश्य लगती है लेकिन इसे हम धीरज से निपटायें। और गैस के इस्तेमाल में थोड़ा संयम बरतें। 

सच कहें तो दोष यह हमारे राष्ट्रीय चरित्र का है। और यह बात हम स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हैं। जो राष्ट्र ऐसे संकटों में भी स्वयं के इतर नहीं सोचना चाहता,जहाँ राजनीतिक दल इस आपदा में केवल राजनीतिक हित देखें, जहाँ व्यतिगत राजनीतिक शत्रुता देश हित के ऊपर हो, ऐसा राष्ट्र समृद्ध तो हो सकता है लेकिन महान नहीं। सच पूछिए तो समस्या केवल सिलिंडरों की नहीं है—थोड़ी-सी हमारे राष्ट्रीय चरित्र की भी है। 

भारत आज ऊर्जा आपूर्ति के मामले में पहले की तुलना में कहीं अधिक मज़बूत स्थिति में है। वैश्विक घटनाओं के कारण कभी-कभी आपूर्ति में हल्की बाधाएँ आ सकती हैं, लेकिन वे स्थायी नहीं होतीं। इसलिए इस क्षण का सबसे अच्छा उत्तर शायद यही है—थोड़ा धैर्य, थोड़ा विवेक और थोड़ा हास्य। आख़िर वह समाज जिसने केरोसिन स्टोव, कोयले के चूल्हे और गैस कनेक्शन की लंबी प्रतीक्षा सूची के दिन देखे हैं, वह कुछ दिनों की अफ़वाहों से घबराने वाला नहीं है। और जब अगला सिलिंडर रसोई में आएगा, तो शायद हमें यह भी याद दिलाएगा कि जो सुविधाएँ आज सामान्य लगती हैं, वे कभी छोटे-छोटे चमत्कार हुआ करती थीं।जो समाज कभी केरोसिन स्टोव, कोयले के चूल्हे और गैस कनेक्शन की अंतहीन प्रतीक्षा सूची के दिनों से गुज़रा हो, वह कुछ दिनों की अनिश्चितता से क्यों घबराए?

प्रश्न तो यह है कि सिलिंडर तो कुछ ही दिनों में आ जाएगा, किंतु राष्ट्रीय चरित्र में बदलाव की एक झलक के लिए हमे कब तक प्रतीक्षा करनी पड़ेगी?

Published by udaykumarvarma9834

Uday Kumar Varma, a Harvard-educated civil servant and former Secretary to Government of India, with over forty years of public service at the highest levels of government, has extensive knowledge, experience and expertise in the fields of media and entertainment, corporate affairs, administrative law and industrial and labour reform. He has served on the Central Administrative Tribunal and also briefly as Secretary General of ASSOCHAM.

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