यदि भारत के रंगों को एक दिन में चरम पर देखना हो, तो वह दिन होली का है। फागुन का यह पर्व केवल रंगों का उत्सव नहीं; यह भारत की सामूहिक चेतना का वार्षिक विस्फोट है। Mark Twain ने भारत को “bewitching colour” अकारण ही नहीं कहा था — सम्मोहक रंगों का देश। सचमुच, यहाँ हल्दी का पीत है, केसर का तेज है, पलाश की अग्नि है, मेहंदी की हरितिमा है, और सांझ का धुँधलका भी किसी चित्रकार की तूलिका-सा लगता है।
होली आते ही जैसे समाज अपनी औपचारिकताओं का कवच उतार देता है। संबंधों की कड़ियाँ ढीली पड़ती हैं, दूरी सिमटती है, संकोच पिघलते हैं। जो बात वर्ष भर आँखों में दबी रहती है, वह रंगों की आड़ में बाहर आ जाती है। यह एक सामाजिक ‘रीसेट’ है — अस्थायी सही, पर प्रभावी।
पर क्या होली केवल सामाजिक उच्छृंखलता का क्षण है? या यह उस गहरे सांस्कृतिक ताने-बाने की झलक है जहाँ प्रेम, अध्यात्म और राष्ट्र-चेतना एक-दूसरे से अलग नहीं होते?
राधा — मिथक या लोक-सत्य?
राधा का नाम बड़े उपनिषदों में नहीं मिलता। शास्त्रों में उनका उल्लेख विरल है। पद्म पुराण और ब्रह्मवैवर्त पुराण में संकेत अवश्य हैं, पर राधा का विराट व्यक्तित्व वहाँ से अधिक लोक-मानस में आकार लेता है।
तो क्या राधा काव्य की सृष्टि हैं? यदि हैं भी, तो क्या काव्य में जन्मा सत्य, लोक में जिए जाने के बाद क्या असत्य रह जाता है?
सूरदास, रसखान, पद्माकर — इन सबने राधा को केवल पात्र नहीं, चेतना बनाया। राधा कृष्ण की आह्लादिनी शक्ति हैं — वह शक्ति जो प्रेम को खेल बना देती है, और खेल को आध्यात्मिक अनुभव।
होली के प्रसंगों में कई बार गोपियों का समूह अधिक दिखता है, राधा का एकांत कम। पर राधा अनुपस्थित होकर भी उपस्थित रहती हैं। जैसे किसी संगीत में मुख्य स्वर नहीं, पर उसका कंपन हर लय में व्याप्त हो।
राष्ट्र के रंग और राधा के रंग
आज का भारत भी रंगों के परिवर्तन से गुजर रहा है। 1990 के दशक में आर्थिक उदारीकरण के साथ बाजारों में नए रंग आए। शहरों की सड़कों पर LED की पीली रोशनी ने अभाव के अँधेरे को पीछे धकेला। निर्माण-स्थलों की हरी जालियाँ विकास और उसके दुष्परिणाम — दोनों की याद दिलाती हैं। और केसरिया — जो कभी साधुओं के वस्त्रों और मंदिरों तक सीमित था — अब अधिक दृश्यमान है, ध्वजों और दीवारों पर।
पर प्रश्न यह है:
क्या ये राष्ट्र के रंग राधा के रंग से अलग हैं?
भारत की परंपरा में यह विभाजन कभी स्पष्ट नहीं रहा। यहाँ प्रेम और देशभक्ति परस्पर विरोधी नहीं; वे एक ही भाव-परंपरा की भिन्न अभिव्यक्तियाँ हैं।
जब बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने “वंदे मातरम्” लिखा, तो मातृभूमि देवी का रूप ले लेती है। जब महात्मा गांधी ने रामराज्य का स्वप्न देखा, तो राजनीति में अध्यात्म का रंग घुल जाता है। भारत में राष्ट्र एक भौगोलिक रेखा नहीं; वह भाव है। और वह भाव प्रेम से ही जन्म लेता है। राधा का रंग उसी प्रेम का प्रतीक है — जो समर्पण है, तन्मयता है, आत्म-विसर्जन है।
वैराग्य और अनुराग का संगम
फागुन का महीना अनोखा है। यही महीना महाशिवरात्रि का भी है। एक ओर महादेव का विराग, दूसरी ओर कृष्ण का अनुराग। एक ओर ध्यान, दूसरी ओर नृत्य।
क्या यह विरोधाभास है? या भारतीय आत्मा का संतुलन?
होली हमें यह सिखाती है कि उन्मुक्तता भी मर्यादा में हो सकती है। रंग उड़ें, पर सम्मान का अपमान न हो। ठिठोली हो, पर तिरस्कार न हो। सीमाएँ ढीली हों, पर मानवीय गरिमा अक्षुण्ण रहे।
फाग — सामूहिकता का उत्सव
होली का सबसे बड़ा सौंदर्य उसकी सामूहिकता है। यह अकेले का पर्व नहीं। समूह में गान है, समूह में रास है, समूह में हँसी है।
राधा एकल हैं, गोपियाँ समूह। पर राधा के बिना समूह का अर्थ अधूरा है।
ठीक वैसे ही, राष्ट्र केवल भीड़ नहीं; वह साझा चेतना है। और वह चेतना प्रेम से ही रंगती है।
एक ही रंग
तो क्या राष्ट्र के रंग और राधा के रंग अलग हैं? शायद नहीं। राधा का रंग भीतर की दीप्ति है; राष्ट्र का रंग उसका बाहरी विस्तार। एक हृदय में खिलता है, दूसरा आकाश में फहराता है। एक अबीर है, दूसरा आभा।
होली के दिन जब हम एक-दूसरे पर रंग डालते हैं, तो हम केवल चेहरे नहीं रंगते। हम उस साझा स्मृति को रंगते हैं जिसने इस देश को प्रेम, अध्यात्म और संघर्ष के रंगों से रचा है। रंग बदलते रहेंगे — समय के साथ, सत्ता के साथ, बाज़ार के साथ। पर यदि प्रेम का रंग बचा रहा, तो राष्ट्र का रंग भी उज्ज्वल रहेगा।
आज फाग है
तो आज फाग है। फाल्गुन है। गोप हैं, गोपियाँ हैं। रंग है, अबीर है, रंगीन धूल है, मादक और शोख हवाएँ हैं. शरारत है, चुहल है, रास है, हास है, परिहास है।
फाग है तो आह्लाद है। फाग है तो उल्लास है। फाग है तो उन्माद है। फाग है तो उच्छृंखलता भी है ,पर मर्यादा-विहीन नहीं।
फाग है तो गोपिकाएँ हैं। गोपिकाएँ हैं तो राधा रानी हैं। और जहाँ राधा हैं, वहाँ कृष्ण अनिवार्य हैं।
और जहाँ राधा और कृष्ण हों, वहाँ आनंद और प्रेम का अतिरेक है — एक अथाह सागर। डूबना हो तो पूरे डूबो, खूब डूबो।
बाक़ी तो — “जो बौरा डूबन डरा, रहा किनारे बैठ।”
पर फाग का रंग इतना उदार है कि वह किनारे बैठे उस संकोची मन को भी अंततः छू लेता है। रंग अंततः सबको स्वीकार कर लेते हैं — जैसे प्रेम सबको अपने घेरे में ले लेता है।कोई अछूता नहीं बचता, न नारी, न नवेली.
रसखान याद आते हैं —
“फागुन लाग्यो जब तें ब्रजमंडल में धूम मच्यौ है,
नारि नवेली बचै नहिं एक, सबै प्रेम अच्यौ है।”
यही फाग है। जहाँ अंततः सब प्रेम में भीग जाते हैं। जहाँ राष्ट्र का रंग और राधा का रंग एक हो जाते हैं। जहाँ बाहर उड़ा हुआ अबीर भीतर उतरकर चेतना को रंग देता है।
और तब समझ में आता है — सबसे स्थायी रंग वही है जो प्रेम का है।