महाशिवरात्रि: अंतर्यात्रा की रात्रि

रंगों के उत्सव होते हैं, फसलों के पर्व होते हैं, विजय के समारोह भी होते हैं — पर महाशिवरात्रि किस प्रकार का उत्सव है? यह न तो चकाचौंध का पर्व है, न उल्लास की प्रकट प्रस्तुति; यह आत्मा का, अंतरतम का, आत्मावलोकन का, और मौन का पर्व है। अमावस्या की इस गहन रात्रि में मानो समूचा ब्रह्मांड क्षणभर ठहर जाता है और हमें भी ठहरकर भीतर झाँकने का आमंत्रण देता है।

फाल्गुन मास की कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी को मनाई जाने वाली महाशिवरात्रि भगवान शिव को समर्पित है — उस ईश्वर  को जो विरोधाभासों का अद्भुत समन्वय हैं। वे संन्यासी भी हैं और गृहस्थ भी; संहारक भी और सर्जक भी; मौन योगी भी और तांडव करते नटराज भी। इस रात्रि का अर्थ समझना इन विरोधाभासों के रहस्य को स्पर्श करना है।

परंपरा में इस पर्व से अनेक कथाएँ जुड़ी हैं। कहीं इसे शिव-पार्वती के दिव्य विवाह का दिवस माना गया है — चेतना और शक्ति, पुरुष और प्रकृति के मिलन का प्रतीक। कहीं समुद्र-मंथन की कथा स्मरण की जाती है, जब शिव ने सृष्टि की रक्षा के लिए हलाहल विष का पान किया और नीलकंठ कहलाए। कहीं शिवपुराण का वह प्रसंग आता है, जब ब्रह्मा और विष्णु के अहंकार को शांत करने हेतु शिव अनंत ज्योति-स्तंभ के रूप में प्रकट हुए।

इन कथाओं का मर्म गहरा है। विवाह भीतर के द्वैत के संतुलन का संकेत है। विषपान जीवन के विष को धारण कर उसे रूपांतरित करने की क्षमता का प्रतीक है। और अनंत ज्योति-स्तंभ यह स्मरण कराता है कि परम सत्य सीमाओं से परे है; उसे नापा नहीं जा सकता, न ही अहंकार से पाया जा सकता है।

महाशिवरात्रि का अनुष्ठान सादगी और एकाग्रता का अनुष्ठान हैं। उपवास, रात्रि-जागरण, “ॐ नमः शिवाय” का जप, शिवलिंग पर जल, दूध और बेलपत्र का अर्पण — ये बाह्य क्रियाएँ हैं, पर उनका संकेत भीतरी साधना की ओर है। शिवलिंग केवल सृजन का प्रतीक नहीं, बल्कि निराकार से साकार की यात्रा का द्योतक है। रात्रि का जागरण वस्तुतः आत्मा को अज्ञान की निद्रा से जगाने का प्रयत्न है।

परंतु इस पर्व का दार्शनिक मर्म इससे भी गहरा है।

शिव संहार के देवता हैं — पर संहार किसका? सृष्टि का? संभवतः। अज्ञान का? निःसंदेह। संसार का? शायद। भ्रम और अहंकार का? अवश्य। सृष्टि के चक्र में सृजन, पालन और संहार — तीनों अनिवार्य हैं। संहार के बिना नवसृजन संभव नहीं। महाशिवरात्रि वह रात्रि है जब मनुष्य अपने भीतर संचित अहंकार, क्रोध, मोह और भ्रम के संहार का संकल्प ले सकता है। यह आत्ममंथन, आत्मशोधन और आत्मोन्नयन का अद्वितीय अवसर है।

अमावस्या की रात्रि भी प्रतीकात्मक है। चंद्रमा मन का प्रतीक माना गया है। इस रात्रि में उसका प्रकाश अनुपस्थित है — मानो मन की चंचलता विश्राम पा ले। शिव जटाओं में चंद्र को धारण करते हैं — अर्थात वे मन के स्वामी हैं, दास नहीं। महाशिवरात्रि हमें भी उसी साधना की ओर प्रेरित करती है — मन को स्थिर और संयत करने की साधना।

शिव आदि गुरु हैं — ऐसे गुरु जिनका व्याख्यान मौन है। आदि शंकराचार्य विरचित दक्षिणामूर्ति स्तोत्र में यह भाव अत्यंत सुंदर रूप में व्यक्त हुआ है—

“चित्रं वटतरोर्मूले वृद्धाः शिष्या गुरुर्युवा।
गुरोस्तु मौनं व्याख्यानं शिष्यास्तु छिन्नसंशयाः॥”

ज्ञान शब्दों से नहीं, मौन से उपजता है। महाशिवरात्रि की मौन आराधना इसी सत्य की पुनर्स्मृति है। और शिव का निवास — हिमालय — केवल भौगोलिक ऊँचाई नहीं, बल्कि चेतना की ऊर्ध्वगामी यात्रा का प्रतीक है। इस रात्रि का संदेश है — अपने भीतर के हिमालय तक आरोहण।

परंपरागत रूप से शिव की आराधना अत्यंत व्यक्तिगत रही है — एकांत में जपा गया मंत्र, श्रद्धा से  समर्पित एक बेलपत्र। किंतु हाल के वर्षों में सदगुरु  जैसे आध्यात्मिक आचार्यों ने इस रात्रि को सामूहिक साधना का विराट रूप दिया है। हजारों लोग एक साथ ध्यान, संगीत और प्रार्थना में संलग्न होते हैं। यह परिवर्तन परंपरा की जीवंतता और सनातन धर्म के लचीले2पन का प्रमाण है। साधना मूलतः व्यक्तिगत है, किंतु उसका सामूहिक विस्तार भी संभव है — और कुछ परिस्थितियों नें शायद वांछनीय भी।

आज के युग में, जब जीवन निरंतर कोलाहल और विरोधाभासों से भरा है, महाशिवरात्रि एक आध्यात्मिक प्रतिप्रस्ताव की तरह प्रतीत होती है। यह हमें अंधकार से भयभीत होने के बजाय उसे स्वीकार करने का आमंत्रण देती है। यह सिखाती है कि संहार भी करुणा का रूप हो सकता है; कि मौन भी एक गहन मुखरता है; और यह कि सबसे बड़ा रूपांतरण भीतर घटता है, बाहर नहीं।

और शिव तो आशुतोष हैं, उन्हें प्रसन्न करना संभव है। तो इसलिए जब हम साधना करें तो यह प्रार्थना करें कि  प्रातः जब इस रात्रि के पश्चात सूर्य उदित हो, तो बाह्य जगत तो वैसा ही दिखाई दे किंतु हमारे भीतर कुछ परिवर्तित हो जाए — भ्रम की एक परत हट जाए, अहं का एक अंश पिघल जाए, और भीतर की सूक्ष्म ज्योति अधिक स्थिर हो उठे।

रात्रि अवश्य समाप्त हो — साधना नहीं।

फाल्गुन मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को मनाई जाने वाली महाशिवरात्रि भगवान शिव को समर्पित है — उस देवता को जो विरोधाभासों का अद्भुत समन्वय हैं। वे संन्यासी भी हैं और गृहस्थ भी; संहारक भी और सर्जक  भी; मौन योगी भी और तांडव करते नटराज भी। इस रात्रि का अर्थ समझना, इन विरोधाभासों के रहस्य को स्पर्श करना है।

परंपरा में इस पर्व से अनेक कथाएँ जुड़ी हैं। कहीं इसे शिव-पार्वती के दिव्य विवाह का दिवस माना जाता है — चेतना और शक्ति, पुरुष और प्रकृति के मिलन का प्रतीक। कहीं समुद्र-मंथन की कथा स्मरण की जाती है, जब शिव ने समस्त सृष्टि की रक्षा के लिए हलाहल विष का पान किया और नीलकंठ कहलाए। तो कहीं शिवपुराण का वह प्रसंग आता है, जब ब्रह्मा और विष्णु के अहंकार को शांत करने हेतु शिव अनंत ज्योति-स्तंभ के रूप में प्रकट हुए।

इन कथाओं का मर्म गहरा है। विवाह का अर्थ है — भीतर के द्वैत का संतुलन। विषपान का अर्थ है — जीवन के विष को रूपांतरित करने की क्षमता। और अनंत ज्योति-स्तंभ यह स्मरण कराता है कि परम सत्य सीमाओं से परे है; उसे नापा नहीं जा सकता, न ही अहंकार से पाया जा सकता है।

महाशिवरात्रि के अनुष्ठान सादगी और एकाग्रता से भरे होते हैं। उपवास, रात्रि-जागरण, “ॐ नमः शिवाय” का जप, शिवलिंग पर जल, दूध और बेलपत्र का अर्पण — यह सब बाह्य क्रियाएँ हैं, परंतु उनका संकेत भीतरी साधना की ओर है। शिवलिंग केवल सृजन का प्रतीक नहीं, बल्कि निराकार से साकार की यात्रा का द्योतक है। रात्रि का जागरण वस्तुतः आत्मा को अज्ञान की नींद से जगाने का प्रयास है।

परंतु इस पर्व का दार्शनिक केंद्र इससे भी गहरा है।

शिव संहार के देवता हैं — पर संहार किसका? सृष्टि का?-शायद. अज्ञान का ? -निःसंदेह. संसार का? -संभवतः. भ्रम का? अवश्य  सृष्टि के चक्र में सृजन, पालन और संहार — ये तीनों अनिवार्य हैं। संहार के बिना नवसृजन संभव नहीं। महाशिवरात्रि भी संहार की रात्रि है, जब मनुष्य अपने भीतर संचित अहंकार, क्रोध, मोह और भ्रम के संहार का संकल्प ले सकता है, उन्हें तिरोहित करना का साहस कर सकता है. आत्म मंथन का, आत्म शोधन का, आत्म उत्थान का इस से श्रेष्ठर अवसर शायद ही कोई और हो. 

अमावस्या की रात्रि भी प्रतीकात्मक है। चंद्रमा मन का प्रतीक माना गया है। इस रात्रि में उसका प्रकाश अनुपस्थित है — मानो मन की चंचलता शांत हो। शिव जटाओं में चंद्र को धारण करते हैं — अर्थात वे मन के स्वामी हैं, दास नहीं। महाशिवरात्रि हमें भी उसी साधना की ओर इंगित करती है — मन को स्थिर करने की साधना।

शिव तो आदि गुरु हैं ऐसे गुरु जिनका व्याख्यान मौन ही होता है. शंकराचार्य विरचित दक्षिणामूर्ति स्तोत्र में शिव के गुरु स्वरूप की यही परिकल्पना की गई है,’

चित्रं वटतरोर्मूले वृद्धाः शिष्या गुरुर्युवा I
गुरोस्तु मौनं व्याख्यानं शिष्यास्तु छिन्नसंशयाःII 

आदि गुरु के रूप में शिव यह संकेत देते हैं कि ज्ञान शब्दों से नहीं, मौन से उपजता है। महाशिवरात्रि की मौन आराधना का यही आशय है. और शिव का निवास, हिमालय  केवल भौगोलिक नहीं, बल्कि चेतना की ऊँचाई का प्रतीक है। महाशिवरात्रि का संदेश है — भीतर के हिमालय तक आरोहण।

परंपरागत रूप से शिव की आराधना अत्यंत व्यक्तिगत रही है — एकांत में जपा गया मंत्र, अंधकार में अर्पित एक बेल पत्र। किंतु हाल के वर्षों में सद् गुरु जैसे आध्यात्मिक आचार्यों ने इस रात्रि को सामूहिक साधना का विराट स्वरूप दिया है। हजारों लोग एक साथ ध्यान, संगीत और प्रार्थना में संलग्न होते हैं। यह परिवर्तन परंपरा की जीवंतता का प्रमाण है। सनातन धर्म की विशेषता ही यही है कि वह एकांत और समुदाय — दोनों को स्थान देता है। साधना व्यक्तिगत है, पर उसका  सामूहिक विस्तार संभव है, शायद वांछनीय भी.

आज के युग में, जब जीवन निरंतर विरोधाभाष और कोलाहल से भरा है, महाशिवरात्रि एक आध्यात्मिक प्रतिप्रस्ताव की तरह प्रतीत होती है। यह हमें अंधकार से डरने के बजाय उसे स्वीकार करने का आमंत्रण देती है। यह सिखाती है कि संहार भी करुणा का रूप हो सकता है; कि मौन भी मुखरता का एक मार्ग है; और यह कि सबसे गहरा रूपांतरण भीतर घटता है, बाहर नहीं।

प्रातः जब इस रात्रि के बाद सूर्य उदित होता है, तो बाह्य जगत वैसा ही दिखाई देता है। परंतु सजग साधक के भीतर कुछ बदल चुका होता है — भ्रम  की एक परत हट गई होती है, अहं का एक अंश पिघल गया होता है, और भीतर की  सूक्ष्म ज्योति अधिक स्थिर हो गई होती है।

रात्रि अवश्य समाप्त होती है, साधना नहीं।

Published by udaykumarvarma9834

Uday Kumar Varma, a Harvard-educated civil servant and former Secretary to Government of India, with over forty years of public service at the highest levels of government, has extensive knowledge, experience and expertise in the fields of media and entertainment, corporate affairs, administrative law and industrial and labour reform. He has served on the Central Administrative Tribunal and also briefly as Secretary General of ASSOCHAM.

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