शॉर्ट हिल्स का मेरा प्रवास अब समापन की ओर है। लगभग छह महीने का यह समय अनेक दृष्टियों से आरामदायक, आनंददायक और स्फूर्ति देने वाला रहा। मेरी दिनचर्या जैसे कोमल, संवेदनशील अनुभूतियों की एक सतत शृंखला बन गई थी। पौत्रों के सान्निध्य का सुख तो निस्संदेह अतुलनीय रहा, पर प्रकृति ने भी खुले मन से अपनी विविध छवियाँ दिखाईं—कभी चकित किया, कभी मंत्रमुग्ध।
जब मैं यहाँ आया था, तब ग्रीष्म की हरियाली ने पूरे परिदृश्य को आच्छादित कर रखा था। हरीतिमा का ऐसा ऐश्वर्य शायद पृथ्वी के इसी भाग में देखने को मिलता है। हमारे यहाँ जहाँ ग्रीष्म प्रायः प्रचंड तपन का पर्याय है, वहाँ यहाँ का ग्रीष्म शीतल, विस्तारपूर्ण और आँखों को विश्राम देने वाला था। इस हरियाली को और भी मोहक बना देती थी असंख्य रंगों के फूलों की बहार। जितनी प्रजातियाँ, जितनी रंगछटाएँ उन दिनों आँखों को सम्मोहित करती थीं, उनका संपूर्ण वर्णन कठिन ही नहीं, लगभग असंभव है।
और फिर आया पतझड़। विदाई का उत्सव इतना भव्य और दीप्तिमान भी हो सकता है—यह समझने के लिए शॉर्ट हिल्स का पतझड़ देखना आवश्यक है। कुछ ही दिनों में हरियाली पर रंगों का प्रभुत्व स्थापित हो जाता है। लाल, पीले, भूरे, बैंगनी और नारंगी—मानो रंग स्वयं अपनी अंतिम पूर्णता दिखाने को उतावले हों। यह रंगोत्सव धीरे-धीरे सिमटता है; पत्ते झरने लगते हैं और वृक्षों पर एक मूक-सी विरक्ति उतर आती है। हवा में ठंड की उपस्थिति महसूस होने लगती है—कभी-कभी चुभन की सीमा तक। फिर भी सूर्यदेव अपने उत्साह में कोई कमी नहीं आने देते; अपने उदार प्रकाश से वातावरण में ऊष्मा भरने का प्रयत्न निरंतर करते रहते हैं।
इसके बाद अचानक, लगभग अप्रत्याशित रूप से, जाड़ा आ पहुँचा। इसे शिशिर कहना कठिन है, क्योंकि शिशिर में जो स्निग्धता और सौम्यता होती है, वह यहाँ नहीं। यहाँ का जाड़ा टिठुराने वाला है, देह को गलाने वाला, लोगों को अपने घरों तक सीमित कर देने वाला। किंतु यह भी सत्य है कि यहाँ मनुष्य ने अपनी बुद्धि, परिश्रम, विज्ञान और तकनीक के सहारे प्रकृति के इस कठोर रूप को भी साध लिया है। घर, दफ़्तर, दुकानें, मॉल—यहाँ तक कि गाड़ियाँ भी—सभी वातानुकूलित हैं। बाहर की भयंकर ठंड के बावजूद भीतर एक स्थिर, सुखद तापमान बना रहता है। ठंड का वास्तविक अनुभव तो तभी होता है जब कोई पैदल सड़कों पर निकल पड़े—मजबूरी में या शौक से।
लेकिन जैसे ही बर्फ़ गिरती है, पूरा परिदृश्य रूपांतरित हो जाता है। ठंड तब भी रहती है, पर उसमें एक अद्भुत सौंदर्य घुल जाता है—एक ऐसी सौम्यता, शालीनता और सुषमा, जो पवित्र प्रकाश में लिपट कर उद्दीप्त हो गई हो। प्रकृति के इस रूप का वर्णन भी लगभग असाध्य ही है। भड़कीली, रंगारंग सज्जा में निखरी हुई सुंदरता का बखान शायद संभव हो, पर इस शुभ्र, स्निग्ध, शीतल और निष्कलंक शुचिता को शब्दों में संतोषजनक ढंग से बाँध पाना कठिन है।
मैं इसी परिवेश के बीच अब प्रस्थान कर रहा हूँ। हिरण यहीं रह जाएँगे, गिलहरियाँ भी, और वे असंख्य पक्षी भी—जिन पर लिखते-लिखते मैं अनायास ही उनसे आत्मीय हो गया। पर सबसे अधिक जो स्मृति में बसेंगे, वे हैं यहाँ के विशाल और सुंदर वृक्ष। साइकैमोर और ओक, मेपल और बीच, और लैगरस्ट्रोमिया—नाजुक होते हुए भी अनंत आकर्षण से भरा हुआ। चीड़ और देवदार का तो कहना ही क्या। जब सब और पत्ते झर चुके हैं, शाखाएँ निर्वस्त्र-सी हैं, तने स्थिर और मौन हैं, तो उनका वैभव जैसे द्विगुणित हो उठा हो। जब शुभ्र, स्निग्ध बर्फ़ के फाहे उनकी टहनियों से लिपट जाते हैं, तब उनका सौंदर्य वर्णनातीत—शायद कल्पनातीत—हो जाता है। और मैगनोलिया को कैसे भूलूँ? यह सदाबहार, चिरयौवन-संपन्न वृक्ष मानो प्रकृति के अमरत्व का साक्षात प्रतीक है। शिशिर किसने कहा दुखद होता है? मैगनोलिया के लिए तो शिशिर ही बसंत है।
यह प्रवास प्रकृति से ही नहीं, स्वयं से संवाद का भी एक दुर्लभ अवसर रहा। बहुत कुछ सीखा, बहुत कुछ समझा—कुछ अपने बारे में, कुछ दूसरों के बारे में। एक बोध जो धीरे-धीरे स्पष्ट हुआ, वह यह कि प्रकृति की दृष्टि में नश्वरता और अमरता एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि सहचर हैं। जो नश्वर है, वही अमर है; और अमरत्व स्वयं नश्वरता को ओढ़े रहता है। चिरस्थायी और क्षणभंगुर—दोनों एक ही शाश्वत सत्य के परस्पर रूपांतरित आयाम हैं। सत्य और भ्रम भी अलग-अलग नहीं; वे हमारी दृष्टि की सीमाओं से उपजते हैं।
इसी बोध, इसी कृतज्ञता और इसी सौम्य स्मृति के साथ मैं शॉर्ट हिल्स को अलविदा कह रहा हूँ—यह जानते हुए कि जो पीछे छूट रहा है, वह केवल एक घर नहीं था, बल्कि एक सुखद अनुभव था जो मुझे जीवन के इस मोड़ पर एक सुन्दरता स्थिरता और स्पृहनीय शांति प्रदान करता है।