
आज सुबह से ही बर्फ गिर रही है। नहीं, बर्फ गिर रही है यह कहना पूरा सही नहीं होगा । गिरने में तो एक अनिच्छा, असहायता का भाव है। बर्फ गिर नहीं रही है, असल में बर्फ झर रही है, अपनी इच्छा से, अनायास, और संभवतः पूरे मन से, खुश होकर। इस झरन में भी एक लय है, संगीत है, नृत्य है। रसिक हृदय वालों के लिए प्रकृति के लयात्मक, सौम्य, और सुषमा से परिपूर्ण नृत्य का साक्षात स्वरूप है यह हिमपात। छोटे, स्निग्ध और चमकीले हिम कणों का धीमा अनवरत अवतरण है यह हिमपात। इसमें सौंदर्य है, संवेग भी, स्निग्धता है, थोड़ा शर्मीलापन भी। सूर्य देव भी लगता है कुछ देर ठिठक कर, अपनी ऊष्मा समेट लेते हैं, अपना प्रकाश मद्धिम कर लेते हैं। सौंदर्य के आगे शौर्य कब टिका है?
बर्फ झरती है, आहिस्ता आहिस्ता, महीन कणों में. और उतनी ही कोमलता से पेड़ों, पतों, घास और ज़मीन, छतों और मुंडेरों को आच्छादित करती जाती है. परिचित गलियाँ, बाड़ें, डाकपेटियाँ, छतें और लॉन—सबने अपनी-अपनी पहचान कुछ समय के लिए स्थगित कर दी है , मानो प्रकृति ने दृश्य-पटल को हल्के हाथों से मिटाकर अधिक निर्मल रेखाओं में फिर से रचा दिया हो। सुंदरता, पवित्रता, प्रकाश, और कमनीयता का ऐसा अद्भुत सम्मिश्रण तो केवल प्रकृति ही साध सकती है. यहाँ भव्यता निर्वाक है, लेकिन वैभव में विनय का उद्घोष उतना ही मुखर।

पिछले हफ़्ते भी यहाँ खूब बर्फ गिरी थी। रात भर हिमपात होता रहा और सुबह होते होते धरती लगभग छः इंच मोटी बर्फ की चादर ओढ़ चुकी थी। और इस झक्क सफ़ेद चादर से लिपट कर प्रकृति का सौंदर्य अपूर्व दिव्यता से दीप्त बन चुका था. सद्यः स्नाता की तरह ही, सद्यः अवतरित बर्फ की कोमलता का अंदाज़ा कल्पना से नहीं लग सकता। इसके लिए तो स्वतः ही इस बर्फ को छूना पड़ेगा। भयंकर ठंड के बावजूद इस आकर्षण से बचना लगभग असंभव ही है। बर्फ़ की कोमलता का अनुमान कल्पना से नहीं, स्पर्श से होता है। तीखी ठंड के बावजूद हाथ बढ़ाने का मोह असंयम्य है। उँगलियों को छूते ही वह शीतलता पहले सिहराती है, लेकिन फिर अपने भीतर एक विचित्र सी सौम्यता भी घोल देती है। एक बार यदि मन खेलने लगे—मुट्ठी में बर्फ़ भरने लगे, उसे बिखेरने लगे, पैरों से हल्के-हल्के चिह्न उकेरने लगे—तो आनंद परत-दर-परत खुलता चला जाता है, घंटों तक। यह खेल किसी उत्सव की घोषणा नहीं करता; वह बस उपस्थित रहता है—निस्संग, निस्स्पृह।
इस नवजात हिमपात में थोड़ी देर टहलने का लोभ मैं संवरण नहीं कर पाया.

सुबह की रोशनी में यह संसार किसी एक रंग में नहीं, बल्कि श्वेत के अनगिनत सूक्ष्म स्वरूपों में चमक रहा था। छतें बर्फ़ के भार से नत थीं; उनकी तीक्ष्ण रेखाएँ कोमल वक्रों में बदल गई थीं। लॉन निर्विकार, औपचारिक-से श्वेत विस्तार बन गए थे —निर्दोष निर्विवाद। वृक्षों की शाखाओं पर टिकी बर्फ़, रूई के मुलायम फाहों की तरह, छोटे छोटे अलंकरणों की तरह प्रतीत होती थी—हर कण क्षणिक, हर संतुलन अस्थायी, और शायद इसी कारण सर्वथा पूर्ण।और सामान्य सी दृष्टिगोचर होने वाली चीज़े —खम्भे, ड्राइववे, स्ट्रीटलाइट—भी इस रोशनी से रूपांतरित होकर अर्थवान लगने लगे थे।
इस प्रकाशित मौन में जीवन जैसे कुछ कदम पीछे हट गया था। न राहगीर, न कुत्तों को घुमाने वालों की चहल-पहल—केवल कभी-कभार कोई कार, संकोच के साथ गुजरती, अपने टायरों से हल्की-सी रेखाएँ बनाती, जो कुछ ही देर में विलीन हो जातीं। यह मौन रिक्त नहीं था; वह पूर्ण था। इस मौन में एक समर्पण था, लेकिन सावधानी भी —किसी सतर्क आलिंगन सा।
और फिर भी, एकांत पूर्ण नहीं था। मद्धिम प्रकाश में दो पक्षी भी मेरे साथ इस दृश्य के साक्षी बनते दिख रहे थे —एक कबूतर, शांत और स्थिर; और दूसरा कोई छोटा-सा पक्षी—शायद गौरैया, शायद रॉबिन—जिसकी ध्वनि सुनाई देती थी, पर दर्शन नहीं, शायद वह स्वयं ही अर्ध- कल्पित रहना चाह रहा हो। उनकी उपस्थिति ने आश्वस्त किया कि सौंदर्य की अनुभूति शाश्वत तो है ही, यह सांझी भी है.
मुझे पता है कि यह पूर्णता ठहरेगी नहीं। श्वेत शीघ्र ही धूसर में ढलेगा; शाखाओं से बर्फ के गुच्छे फिसलेंगे; लॉन अपने परिचित हरित-भूरे रंगों में लौट आएँगे। पर इस पूर्वज्ञान में कोई शोक नहीं था। क्षणभंगुरता सौंदर्य को कम नहीं करती; वह उसे स्थायी बनाती है। स्मृति में वह और चमकीली और उजली होकर बस जाती है.
जापानी कवि बाशो की याद आती है—हम सौंदर्य के पीछे नहीं चलते; हम उस निस्तब्धता का अनुसरण करते हैं जिसमें सौंदर्य प्रकट होता है। लौटते समय मेरे पदचिह्न भी बर्फ़ पर क्षणिक थे—कुछ देर में मिट जाने को तत्पर। मन हल्का था, लगभग उत्सव-सा। दिन ने बिना किसी औपचारिकता के एक उपहार दिया था—यह स्मरण कराते हुए कि ऐसे क्षण अब भी हमें खोज लेते हैं, चकित करते हैं, और सामान्य की असामान्यता के आलोक से अद्भुत बना देते हैं.
शॉर्ट हिल्स पर हिमपात के इस मौन हस्ताक्षर का साक्षी बन, मैं आनंद से परिपूर्ण भी था, अभिभूत भी. बर्फ़ अपना काम कर चुकी थी। उसने साधारण को असाधारण, परिचित को नवागत, क्षणिक को अविस्मरणीय, और इस सुबह को—भले ही थोड़ी देर के लिए—पूर्ण बना दिया था.