विष वल्लरी- एक कविता

शॉर्ट हिल्स के पतझड़ की सुषमा और उसका सौंदर्य वर्णनातीत है। रंगों के इस चमकीले, मन लुभावन मौसम में, जब प्रकृति अपने आकर्षण के शीर्ष पर होती है, हमारी दृष्टि प्रायः उन वृक्षों पर ठहर जाती है जो रंगों के वैभव से आकाश और पृथ्वी दोनों को आलोकित कर देते हैं। पर हर सौंदर्य प्रकाश की तलाश में नहीं होता; कुछ आकृतियाँ छाया में रहकर भी उतनी ही अर्थपूर्ण होती हैं। जंगल के इसी मौन परिवेश में एक लता है—विष-वल्लरी (Poison Ivy)—जो देखने में मनोहर, स्पर्श में घातक, और अपने अस्तित्व में गहन रूप से प्रतीकात्मक है। इतिहास की विष-कन्याओं की तरह ही यह भी आकर्षण और दूरी का द्वंद्व अपने भीतर समेटे है। यह कविता  उसी विष-वल्लरी का स्मरण है—उसकी नैसर्गिक भूमिका, उसकी अंतर्निहित मर्यादा और जंगल की व्यवस्था में उसके अनदेखे महत्त्व का एक सौम्य अन्वेषण।

मैं विष वल्लरी हूँ. 

सौंदर्य का आमंत्रण हूँ, 

स्पर्श का निषेध हूँ मैं. 


न मेपल की तरह प्रज्वलित,


न ओक की तरह उत्तुंग।

बस, रंगों के महोत्सव में एक अकिंचन उपस्थिति



इन जंगलों में जहाँ हर पत्ती 

आग का एक क्षण बन गई है,


वहाँ मैं
एक छोटी-सी सीमा रेखा हूँ 


सुंदरता में समाहित वेदना की पग- ध्वनि हूँ.


तीन सुंदर सरल गहरी हरी पत्तियाँ 

मेरी पहचान हैं. 

पर यह सादगी इतनी मासूम भी नहीं

क्योंकि इन पत्तिओं  में छुपा है उरूशिऑल—

जिसे छूते ही मानव-त्वचा
जलन से संदग्ध हो उठती है.


मैं कमनीय लता हूँ 

अपनी छरहरी काया से मैं पेड़ों का आलिंगन करती हूँ 


मेरी भूरी, महीन, “रोएँदार” जड़ें


ओक और मेपल की छाल को थाम लेती हैं—


जैसे मैं उनकी धड़कन सुन लेना चाहती हूँ।


मैं उन्हें हानि नहीं पहुँचाती,


बस उनका सहारा ले प्रकाश की ओर बढ़ती हूँ।


जब बेशुमार लाल, सुनहरे, पीले पत्ते

आकाश को रंग देते हैं
और धरती को भी?

तो क्या मैं पतझड़ के इस उत्सव से ईर्ष्या करती हूँ?


शायद कभी किया हो, जब मैं युवा थी


और अपनी साधारण पत्तियों को


मेपल की आग के सामने तुच्छ समझती थी।



क्या मैं उन विशाल पेड़ों से ईर्ष्या करती हूँ


जो पतझड़ में आग के स्तम्भ बन जाते हैं?


कभी किया हो शायद, अब नहीं।


मैं जानती हूँ—
हर चमक के पीछे एक छाया होती है,


और मैं उसी छाया की सौम्य प्रतिध्वनि हूँ।


मैं परजीवी नहीं हूँ,

न उस वृक्ष को कमजोर करती हूँ—


बस उसके सहारे अपनी जगह तलाशती हूँ,


बिल्कुल वैसे ही जैसे
जंगल के छोटे पौधे 

किसी बड़े के साये में
अपना भविष्य गढ़ते हैं।


मैं
 न तो वन की खलनायिका हूँ 


न ही कोई अभिशाप.
मैं

तो प्रकृति की अनंत ध्वनियों के बीच 

एक विनम्र और शांत प्रतिध्वनि
 हूँ.

एक सुंदर संगीत हूँ, जिसे सुनो, 

प्रेम करो, आलिंगन नहीं. 

मेरी सुंदरता को निहारो, आनंद लो  

लेकिन सम्मान के साथ.

क्योंकि मैं भी पतझड़ का हिस्सा हूँ—


समाहित लेकिन  निर्विकार, शब्दातीत.


मैं विष वल्लरी हूँ 

सौंदर्य का आमंत्रण हूँ 

स्पर्श का निषेध हूँ मैं.

Published by udaykumarvarma9834

Uday Kumar Varma, a Harvard-educated civil servant and former Secretary to Government of India, with over forty years of public service at the highest levels of government, has extensive knowledge, experience and expertise in the fields of media and entertainment, corporate affairs, administrative law and industrial and labour reform. He has served on the Central Administrative Tribunal and also briefly as Secretary General of ASSOCHAM.

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