सौंदर्य, क्षय और अमरत्व

नवम्बर का महीना लगभग आधा गुज़र चुका है. हवा में ठंडक है, नमी भी. आने वाली बर्फीली सर्दी का पूर्वाभास घर के बाहर कदम रखते ही होने लगता है। आकाश भी कुछ अलग ही तरह के आलोक से आभासित है, कुछ थका हुआ, पर नीरव, बिल्कुल प्रशांत।
शॉर्ट हिल्स के वृक्ष अब अपने सौंदर्य के शिखर पर हैं, अप्रतिम वैभव बिखराते हुए। प्रत्येक वृक्ष जैसे अग्नि वर्णी हो गया है। लगता है जैसे आकाश ने अपनी सम्पूर्ण रंग-रसिकता उनमें उंडेल दी हो। अभी केवल दस दिन पहले तक इन रंगों की रागिनी की झलक मात्र अनुभूत हुई थी। अब यह एक संगीत है, एक पूरा वाद्य वृंद।
हवा में हल्की मादकता है, रातें लम्बी हो चली हैं, और हर झोंका रक्ताभ, सुनहरे, तांबे और गेरुए पत्तों की वर्षा करता है — जैसे आकाश से आशीर्वाद बरस रहा हो। सृष्टि ने अपनी रंग-तूलिका को जैसे आख़िरी बार खुले हाथों चला दिया हो। हर वृक्ष, हर डाल, हर पत्ता, जैसे कह रहा हो — “मुझमें जो कुछ सर्वश्रेष्ठ था, वह अब तुम्हारे लिए छोड़े जाता हूँ।”
मेपल के वृक्ष सबसे नाट्यात्मक हैं — लाल रंग के असंख्य संस्करणों में निखरे हुए. कहीं कोरल की लाली है, कहीं गहरे रक्तवर्ण की गंभीरता, जो कुछ ही दिनों के अंतराल से बैंगनी की छाया तक पहुँच जाती है। लगता है जैसे इन पत्तों में जीवन की अंतिम धड़कन समाई हो — पटाक्षेप से पहले एक बार फिर से सौंदर्य का उद्घोष करने की उत्कंठा। उनकी चटक चमक और रंग का कोई प्रतिद्वन्दी है तो वह है बर्निंग बुश – पूरा वृक्ष ही जैसे दहकती हुई लाल लपटों का प्रस्फुटित होता हुआ वलय बन गया हो.

ओक के वृक्ष संयमी हैं, गंभीर भी — वे धीरे-धीरे ताम्र, भूरे, और गाढ़े कंचन में रूपांतरित होते हैं, अनुभव और वरिष्ठता की गरिमा ओढ़े हुए। क़द काठी में उनसे कहीं बहुत छोटे बीच के पत्ते रेशमी सुनहरे और हल्के गुलाबी हैं, जो मंद प्रकाश में भी झिलमिलाते हैं — जैसे स्मृतियाँ जो मिटना नहीं चाहतीं। और उनके नीचे सुमैक, डॉगवुड और स्वीटगम की झाड़ियाँ हैं, जो एम्बर, वाइन और अग्नि के रंगों से धरती को रँग रहे हैं। स्वीटगम की आकृतियाँ तो जैसे किसी चित्रकार की तूलिका से निकली हों — पाँच कोणों वाले पत्ते, जिन पर लाल, नारंगी, सुनहरा और बैंगनी रंग एक साथ खेल रहे हों.
चेस्टनट के वृक्षों के पत्ते अब गाढ़े महोगनी रंग में हैं, मानो धूप और धूल ने मिलकर उन पर समय की परत चढ़ा दी हो। ऐश के पेड़ों पर हल्का बैंगनी झिलमिलाता है, और लिंडन की डालियों पर पीले रंग का एक उज्ज्वल आभा-वलय है, जैसे स्वयं सूर्य ने उन पर विश्राम लिया हो।

और एक तरफ़ है रोशनी की धूप-छांव खेलती — इंग्लिश आइवी। नीलिमा और हरीतिमा का ऐसा संश्लेषण जो अद्वितीय है. एक ऐसा नीला रंग में जो किसी और में नहीं। वह न तो झरती है न बुझती है. यह न तो आकाश का नीला है, न सागर का, प्रकृति के स्नेह का उसके अप्रतिम सौंदर्य को उपहार है उसका अनूठा वर्ण.

चीड़ और देवदार तो सबको पता है पतझड़ से अप्रभावित रहते हैं.उनकी हरियाली तो इन दिनों जैसे और निखर उठी है. लेकिन यह मैग्नोलिया, अपने थोड़े स्थूल, गहरे हरे और चिकने पत्तों की आभा बिखेरते हुए जैसे पतझड़ को अँगूठा दिखा रहा है. जैसे जैसे उसके आस पास के ओक, मेपल, और बीच के पत्ते अपनी पूरी रंगीनी दिखाने के बाद धरासायी होते जाते हैं, मैग्नोलिया और खिलखिलाता है. कौन कहता है की प्रकृति में विनोद नहीं होता.
वैज्ञानिक कहेंगे — जैसे-जैसे हरियाली यानी क्लोरोफिल उतरती है, वैसे-वैसे छिपे रंग प्रकट होते हैं — कैरोटिनॉयड्स का पीला, एन्थोसाइनिन का लाल, और टैनिन का भूरा। रसायनशास्त्र सही है — पर पूरा नहीं. सत्य तो यह है कि विघटन में भी प्रकृति अंतरंग से हमारा परिचय और साक्षात्कार कराती है. हरा तो बस एक आवरण था — असली आत्मा तो इन रंगों में बसी है, जो अंतिम क्षणों में उजागर भी होती है, स्मृति में बस भी जाती है.
मैं इस परिवर्तन की छाया में टहलता हूँ. मिट्टी की भीगी गंध और सुकून की मिठास हवा में घुली होती है। ज़मीन पर बिछे पत्ते मेरे कदमों के नीचे धीरे से शायद प्रतिवाद करते हैं. पास से कहीं ब्लू जे की पुकार आती है, कहीं गिलहरी दौड़ती जाती हैं — उनकी पूँछ की सुनहरी लकीरें हवा में कौंधती हुई. जल्द ही ये रंग विलीन हो जाएँगे। बारिश सुनहरी पत्तियों को भूरा कर देगी; अंतिम लाल पत्ता भी झर कर मिट्टी में मिल जाएगा। पर यह सौंदर्य नष्ट नहीं होगा — वह धरती में समा जाएगा, वसंत के पुनर्जन्म की तैयारी करता हुआ। जो गिरता है, वह लौटता भी है। वृक्ष अपने झरने का शोक नहीं मनाते — वे उसमें भाग लेते हैं। वे मृत्यु को पुनर्जीवन के अन्वेषण की असाधारण कला में परिवर्तित कर देते हैं.

शायद यही प्रकृति का सबसे गहरा रसायन है — न रंगों का, न प्रकाश का, बल्कि अर्थ का। हर मुरझाना एक प्रस्तावना है, हर अंत एक तैयारी। मृत्यु का प्रकाश और उत्सव देखना हो तो पतझड़ में देखें. और सौंदर्य को समझना हो तो इन रंगों को देखें.
सोचता हूँ प्रकृति ने ऐसी अवर्णनीय सुंदरता इतनी अस्थायी क्यों बनाई? फिर समझ में आता है, नश्वरता में ही तो अमरत्व है. स्मृति में जो स्थायी रूप से बस जाए, बही सौदर्य अमर है, शाश्वत है.