आस्था, अंधविश्वास, या फिर भय पर विजय का उपक्रम
दुनिया में शायद ही कोई ऐसा उत्सव या पर्व हो जब घरों को नरकंकालों, प्रेतों, डायनों, भूतों और हर तरह की डरावनी प्रतीकों से सजाया जाता हो। कौन है ऐसा त्योहार और क्या वजह है त्योहार के इस स्वरूप की?
हर वर्ष 31 अक्टूबर की रात को दुनिया के पश्चिमी देशों और विशेष कर अमेरिका मै शहर और कस्बे एक विशेष किस्म का त्योहार मनाते हैं. होती तो इसमें भी है हँसी और उत्साह: ऊर्जा, रंग और रोशनी, लेकिन यह उत्सव मुख्यतया है प्रेतों का उत्सव, उनकी स्मृति और उनके प्रति सम्मान का उत्सव. यह कुछ अलग तरीके का उत्सव है, जो भूत, प्रेत, नर कंकाल, कब्र, डायनों, और भयावह मुखौटों के इर्द गिर्द घूमता है.
जब बच्चे परियों, जादूगरों, और भूतों का मुखौटा लगा कर घर-घर जाकर “ट्रिक या ट्रीट” कहते हैं, और जब कद्दू के भीतर से झिलमिलाती लौ मुस्कुराती है — तब समझिए, हैलोवीन आ गया है।
हैलोवीन अर्थात् प्रेत पर्व या प्रेत उत्सव। दुनिया में विज्ञान और विकास के मामले में श्रेष्ठत्तर इन देशों में ऐसा पर्व क्यों मनाया जाता है? भूतों और प्रेतों का एकाधिपत्य तो ग़रीब, अशिक्षित,और अविकसित देशों और समाजों का है. तो इसमें तथाकथित विकसित देश कहाँ से आ गए? और यह उत्सव आखिर है क्या? क्या यह भूतों और अंधविश्वास का पर्व है, या भय की कल्पना और उस पर विजय का उत्सव? तो आइए आज समझते हैं इस पर्व को.
करीब दो हज़ार वर्ष पहले आयरलैंड, स्कॉटलैंड और उत्तरी फ्रांस में सेल्टिक लोग रहते थे। उनके लिए 1 नवंबर से नए वर्ष की शुरुआत हुआ करती थी. और इसके ठीक पहले, 31 अक्टूबर को वे “साविन” (Samhain) नामक पर्व मनाते थे — जो फसल की समाप्ति और सर्दियों की शुरुआत का प्रतीक था। सर्दियां जो उनके लिए कठिनाईओं और दुश्वारिओं से भरा होता था –ठिठुरानी वाली भयंकर ठंड, खाद्य पदार्थों का अभाव, बीमारियां और अशक्तता. उनका विश्वास था कि Samhain की रात मृत आत्माएँ धरती पर लौट आती हैं। इन आत्माओं को प्रसन्न और संतुष्ट करना के लिए वे घरों के बाहर भोजन रखते, बड़े बड़े अलाव जलते थे और अगर घर से बाहर निकलते तो पशुओं की खाल या मुखौटे पहनते. इसलिए कि जो आत्मायें उस समय उनके घरों के इर्द गिर्द घूम रही हों, वे उन्हें पहचान न सकें, उन्हें भी अपना जैसा समझे और जीवित समझ कर उन्हें उठा न ले जायें. यह भय और श्रद्धा, दोनों का अद्भुत संगम था — एक ऐसा पल जहाँ मनुष्य प्रकृति और मृत्यु दोनों के प्रति नतमस्तक था।
जब रोमनों ने सेल्टिक प्रदेशों पर अधिकार किया, तो उन्होंने अपने त्योहार भी —जैसे पोमोना, फलों की देवी का उत्सव—इस परंपरा में मिला दिए। शायद इसी से हैलोवीन में सेब का प्रतीक जुड़ गया। बाद में, ईसाई धर्म ने इसे अपने पर्व ऑल सेंट्स डे के पूर्वरात्रि के रूप में अपना लिया — ऑल हैलोज़ ईव, जो समय के साथ हैलोवीन कहलाया। इस प्रकार एक प्राचीन पगान (प्रकृतिपूजक) पर्व धीरे-धीरे धर्म, संस्कृति और लोक-आस्था के मेल से नया रूप पाता गया।
यूरोप से प्रवासी जब अमेरिका पहुँचे तो वे अपने साथ यह उत्सव भी ले आए। आरंभ में यह केवल आयरिश और स्कॉटिश समुदायों तक सीमित था, पर धीरे-धीरे यह पूरे देश का उत्सव बन गया। हँसी-खुशी का यह खेल सर्वव्यापी सा हो गया और डरऔर आनंद का एक सुखद संगम बन गया.
हैलोवीन के दिन बच्चे मुखौटे पहनकर घर-घर जाते हैं और कहते हैं — “Trick or Treat!” अगर मिठाई मिल जाए तो “ट्रीट”, वरना कोई छोटी सी शैतानी — “ट्रिक”! हैलोवीन का दूसरा सबसे जाना माना प्रतीक है जैक-ओ’-लैंटर्न यानी कद्दू का लालटेन. पुराने आयरलैंड में लोग शलगम में चेहरे उकेरते थे, पर अमेरिका में उन्हें कद्दू मिला—बड़ा, अधिक आकर्षक, और आसानी से तराशा जा सकने वाला। समय के साथ इसमें कलात्मकता का भी समावेश हो गया.
लेकिन हैलोवीन ने भय में बड़े विविध रंग भर दिए हैं. कंकाल, कब्रें, बिल्लियाँ, चमगादड़ और मकड़ियाँ, डायनें और जादूगर, आत्मायें और भयानक मुखौटे शायद कभी भय पैदा करते होंगे परंतु आज वे सजावट और मनोरंजन के प्रतीक बन गए हैं.
पुराने ज़माने की कई मान्यताएँ लेकिन अब भी विश्वास में क़ायम हैं—जैसे काली बिल्ली का रास्ता काटने को अशुभ मानना, या सीढ़ी के नीचे से न गुजरना या इस रात नमक का ज़मीन पर नहीं गिरना. ये शायद अंधविश्वास ही है जिसे भले ही यहाँ परंपरा का परिधान पहना दिया गया हो, और संस्कृति से जोड़ दिया गया हो, पर मूलतः यह सभ्यताओं में प्रचलित डर और परहेजों के रेखांकन की बदस्तूर निरंतरता है.
और जहाँ अमेरिका हो, वहाँ उपभोक्तावाद और व्यवसाय कैसे दूर रह सकता है? हैलोवीन क्रिसमस के बाद अमेरिका का सबसे लोकप्रिय उत्सव है. आधुनिक अमेरिका में आज हैलोवीन एक व्यवसाय है – लगभग छह अरब डॉलर का कारोबार करने वाला एक उत्सव. अरबों डॉलर की मिठाइयाँ, सजावटें और परिधानों का कारोबार इस दिन होता है। पूरे अमेरिका में साल भर में जितनी candy बिकती है, उसमे से आधी से ज़्यादा हैलोवीन में खप जाती हैं.
लेकिन इन सब के बावजूद अंततः, हैलोवीन केवल भूतों या चुड़ैलों का पर्व नहीं — यह मानवीय कल्पना, साहस और आशा का भी उत्सव है। कद्दू के भीतर जलती लौ केवल सजावट ही नहीं, एक प्रतीक भी है — अन्तरतम के अंधकार पर प्रकाश के विजय की. भय से भागना नहीं बल्कि उसका मुखौटा ओढ़ कर उसका मुक़ाबला करने में बुद्धिमानी भी है, साहस भी, और संकल्प भी, और मनोरंजन तो है ही.
आज हैलोवीन उतना ही व्यवसाय का त्योहार है जितना कि कल्पना का —अब इसे रचनात्मकता और उपभोक्तावाद का अद्भुत संगम मानें, एक अद्भुत परंपरा का निर्वहन मानें या विशुद्ध मनोरंजन का अवसर, कभी कभी तय करना मुश्किल होता है.