दीपावली अभी अभी निकली है। दीप मालाएँ अभी भी अपनी चमक और रोशनी बिखेर रही हैं। वातावरण में पटाखों की ख़ुशबू घुली हुई है लेकिन साँसो को बाधित करता धुआँ भी सर्वत्र व्याप्त है. उत्सव के अतिरेक से सब लोग थोड़े श्लथ और सुस्त तो अवश्य हैं लेकिन जीवन की आपा-धापी बदस्तूर क़ायम है.
दीपावली प्रकाश का पर्व है, हर्ष और उमंग का उत्सव है, विजय, रचनात्मक ऊर्जा और उल्लास का समारोह है. और यह उत्सव जितना वैयक्तिक है उस से भी अधिक सामूहिक है.
दीपावली की ये सब बातें सुंदर हैं, और भी कई सुंदर बातें हैं. लेकिन जो मुझे सबसे सुंदर लगती है वह यह कि यह केवल हमारे परिवेश को, बल्कि, हमारे अन्तरतर भीतर को भी आलोकित करने का निमंत्रण देता है, अवसर देता है, और शायद प्रेरणा भी. यह बात और है कि अक्सर हम इस निमंत्रण की अनदेखी कर देते हैं. लेकिन सत्य यह है कि यदि अंतर्मन अंधकार में डूबा रहे, तो बाहर के हजार दीप भी हमें स्थायी आनंद और शांति नहीं दे सकते।
दीपावली का सार शायद उस छोटे से दीये में है जो अपनी लौ से अंधकार को चुनौती देता है। अंतर्निहित संदेश है कि प्रकाश संभव है, साधन और शक्ति भले ही सीमित हो। अगर दीपक अपने को जलाकर दूसरों को रोशन करता है; वह दान का नहीं, समर्पण का प्रतीक है। उसकी टिमटिमाहट में भी एक अदम्य शक्ति और ऊर्जा है जो यह प्रदर्शित करती है कि प्रकाश की यात्रा भीतर से आरंभ होती है, और शनैः शनैः प्रगाढ़तर होती है. सत्य तो यह है कि जो मन के भीतर करुणा, विश्वास और शांति के दीप जलाता है, उसके लिए संसार का हर अंधकार अर्थहीन हो जाता है।
इस पर्व के देव और देवियाँ भी हमें यही सिखाते हैं। लक्ष्मी केवल संपन्नता की देवी नहीं हैं, वे सौंदर्य और संतुलन की भी प्रतिमा हैं; गणेश बुद्धि, विवेक और शुभारंभ के प्रतीक हैं। जब हम इन दोनों की पूजा साथ करते हैं, तो वह केवल एक रीति नहीं, एक परम्परा नहीं —एक संदेश है कि समृद्धि तभी सार्थक है जब उसमें विवेक और विनम्रता का प्रकाश हो।
आज की दुनिया में जहाँ तकनीकी ने हम सब को अपना दास सा बना दिया है, दीपावली के पर्व में निहित अर्थ को समझना और आवश्यक हो जाता है। जब भौतिक समृद्धि के असाधारण विस्तार के बीच आत्मा का कोश संकुचित होने लगता है, जब लोभ और परिग्रह विवेक को धुंधला कर देते हैं तो “तमसो मा ज्योतिर्गमय” का यह वैदिक आह्वान हमें याद आना चाहिए। प्रकाश का मार्ग भीतर से बाहर की ओर जाता है, बाहर से भीतर नहीं.
दीपावली अंधकार से प्रकाश की और प्रेरित करने का आह्वान है क्योंकि दीपावली केवल प्रकाश का पर्व नहीं, यह अंतस को आलोकित करने का भी अवसर है. हमने अपने घरों को दीपों से जगमगा दिया, पास पड़ोस को भी रोशनी से नहला डाला किंतु हम क्या हम अपने अंतस में भी कोई दीप जला पाए? क्योंकि यदि भीतर अंधकार बचा है, विद्यमान है, शेष है, तो बाहर का प्रकाश क्षणिक भी है, अर्थहीन भी।
दीपावली का क्षण एक ध्यान जैसा है—जब हम दीये की लौ को निहारते हैं, तो उसकी स्थिरता में हमें अपनी बेचैनी का उत्तर मिलता है। वह लौ न नाचती है, न ठहरती है, बस जलती रहती है—संतुलन में, धैर्य में, निश्चय में। यही दीपावली की आत्मा है: प्रकाश के माध्यम से स्थिरता की खोज, उल्लास के भीतर मौन का बोध।
दीपावली को केवल दीप जलाने का ही नहीं, स्वयं को दीप्त करने का भी संकल्प लेना भी क्या कभी संभव होगा? क्या अपने मन के कोनों में समाये राग और द्वेष, लोभ और अविवेक के तमस को मिटा कर प्रेम, सद्भावना, और उदारता का सूर्य कभी जला पाना संभव होगा? क्योंकि जब भीतर स्नेह और करुणा का प्रकाश जलेगा, तभी बाहर के दीप सच्चे अर्थों में उजाला दे पाएंगे।