
अपने देश भारत में पतझड़ का मौसम, हिसे हम शरद ऋतु कहते हैं, बहुत रंगीन और ख़ुशनुमा नहीं माना जाता। शरद पूर्णिमा का सौदर्य अवश्य अप्रतिम है, लेकिन झड़ते पत्तों में न तो रंगीनी है और न ही मन को हर्षित कर देने वाली कोई बात। और इस मौसम में उत्साह या ऊर्जा का भी कोई विशेष स्थान नहीं होता। पत्ते झड़ते हैं, भूरे और बदरंग होकर। सुंदरता उस में भी है लेकिन एक दूसरे तरह की।
लेकिन अमेरिका में और विशेष कर न्यू इंग्लैंड में जहां मैं इन दिनों रह रहा हूँ, पतझड़ का मौसम नैसर्गिक सौंदर्य और आकर्षण के लिए विख्यात है। यहाँ इस समय को Fall कहते हैं। दशकों पहले जब मैं हॉर्वर्ड विश्वविद्यालय में पढ़ता था, सुना करता था कि लोग दूर दूर से न्यू इंग्लैंड के Fall का सौंदर्य देखने आते हैं और पर्यावरण विषय के एक कोर्स में हमे सिखाया गया कि इस सौंदर्य का आर्थिक मूल्यांकन कैसे किया जाना चाहिए। इस बात का अनुभव मैं इन दिनों प्रत्यक्ष रूप से कर रहा हूँ।
न्यू जर्सी के शॉर्ट हिल्स इलाक़े में जहां मैं इन दिनों समय बिता रहा हूँ, जब मैं टहलने निकलता हूँ, हवा में एक अनकहा संगीत सुनाई देता है, अच्छी ख़ासी ठंडक, पत्तों की रहस्यमय सरसराहट, और पक्षियों की मीठी आवाज़। ऐसा लगता है, प्रकृति अपने ही रंगों से कुछ लिख रही हो, ऐसी कविताएँ जिन्हें शब्दों की ज़रूरत नहीं। मेरे घर के ठीक सामने मेपल के कुछ वृक्ष हैं जो हर दिन एक नई वाणी में बोलते हैं — हरे से सुनहरे, सुनहरे से लाल, और फिर अग्नि के से तीव्र रंगों में बदलते हुए।

केवल एक पखवाड़ा पहले वे हरे थे — स्थिर, शांत, आत्मविश्वास से भरे। आज वे धधकते हैं — नारंगी, लाल, और करमाई हुई आभा से । उनकी यह रूप-परिवर्तन कोई क्षणिक चमत्कार नहीं; यह समय की साधना है। मानो वृक्ष ने अपने भीतर के संगीत को रंगों में उंडेल दिया हो।
कभी-कभी सोचता हूँ — यह रंगों की आग कैसी है? क्या यह ज्वाला है या प्रार्थना? क्योंकि इन पत्तों की आभा में एक विनम्रता भी है, जो किसी दीपक की लौ जैसी लगती है — नृत्य करती हुई, पर संयमित। यह अग्नि नष्ट नहीं करती, केवल प्रकाशित करती है।
कुछ ही दिनों में यह चमक मद्धम पड़ जाएगी। हवा के एक झोंके के साथ पत्ते झर पड़ेंगे — कुछ उड़ते हुए दूर निकल जाएँगे, और कुछ मिट्टी की गोद में विश्राम पा लेंगे। यह दृश्य जितना सुंदर है, उतना ही विषादमय भी। हर सुबह जब मैं यह होता देखता हूँ, एक प्रश्न भीतर से उठता है — हर सुंदर चीज़ को क्यों एक दिन मिटना ही होता है?

फिर एक उत्तर भी कहीं भीतर से आता है — शायद मिटना ही सौंदर्य का शाश्वत विधान है। सौंदर्य विजय है और पराजय भी। कबीर ने यूँ ही नहीं कहा था “माटी कहे कुम्हार से, तू क्या रौंदे मोहे; एक दिन ऐसा आएगा, मैं रौंदूंगी तोहे।” लेकिन यह अनवरत, अपवाद- शून्य प्रक्रिया ही शायद परिपूर्णता है — और जीवन का अमिट यथार्थ।
सोचता हूँ क्या हमारा अंत भी ऐसा ही नहीं होना चाहिए? जब अपने जीवन का पतझड़ आए, तो क्यों न हम भी इन्हीं पत्तों की तरह गिरें — चमकते,दमकते, और गरिमा से परिपूर्ण। क्यों न हमारा प्रस्थान भी एक आभा छोड़ जाए — अस्ताचल गामी सूर्य की तरह जो जाते जाते भी आसमान को सुनहरा कर जाता है।
वर्ड्सवर्थ ने लिखा था,
“Though nothing can bring back the hour
Of splendour in the grass, of glory in the flower,
We will grieve not, rather find
Strength in what remains behind.
शायद यही तो हमे सीखना है, न अमरत्व का मोह और न ही विछोह का विषाद, न स्थायित्व में ठहराव, न नश्वरता से भय- भरा पलायन।
शाख़ों की ऊँचाई से टूटते हुए ये रंगीन, चमकदार, सुंदर पत्ते, जब हवा में तैरते हुए ज़मीन पर गिरते हैं तो एक संदेश भी देते हैं, और एक सुझाव भी। मिटना भी उतना ही सुंदर हो सकता है जितना खिलना। मृत्यु भी वैसी ही आनंदमय हो सकती है जितना जन्म लेना।
इन पत्तों की तरह, क्या हम भी अपने जीवन के अंतिम अध्याय में रंग भर सकते हैं — गहरे, नरम, सच्चे, और स्थायी? और जब समय आए, तो मिट्टी से मिलकर फिर उसी चक्र का हिस्सा बन जाएँ, जिससे हमने जन्म लिया था?
कैसी अद्भुत परिपूर्णता होगी वह?