नवरात्रि पर माँगें क्या?

नवरात्रि का उत्सव और अनुष्ठान बहुतेरे लोग कर रहे हैं। कुछ ने पूरी नवरात्रि मैं उपवास कर रखा है, कइयों ने इस दौरान मांसाहार छोड़ दिया है, शायद मदिरापान भी, और सात्विक भोजन लेने की तपस्या ही कर रहे हैं। और कई ऐसे भी हैं जो इन कर्म कांडों में विश्वास नहीं करते, उनका ईश्वर इन तपस्यायों से न प्रभावित होता है और इनके न करने से विचलित। लेकिन सभी हिंदू हैं, सनातनी है, और किसी की आस्था दूसरे से न्यूनतर नहीं है। यह है सनातन धर्म की विलक्षणता।

लेकिन नवरात्रि के दौरान आत्म- संयम किसी न किसी रूप में करते हम सभी हैं। कुछ अधिक प्रत्यक्ष और अपनी काया को माध्यम बनाते हुए, कई केवल मन से, मानसिक रूप से आराधना करते हुए। तो इस दौरान  की गई प्रार्थना या आराधना से हमारी अपेक्षा क्या रहती है या क्या होनी चाहिए? यह व्यक्तिगत प्रश्न हो सकता है लेकिन संगत अवश्य है। 

हम में से कई शायद एक विशेष कामना से ये अनुष्ठान करते हैं, कई शायद आत्म शुद्धि और आध्यात्मिक यात्रा में बेहतर गति और प्रगति पाने के लिए प्रार्थना करते हैं। और कई शायद माँ दुर्गा के प्रति अपनी आस्था, श्रद्धा और समर्पण अभिव्यक्त करने के लिए आराधना करते हैं। इनकी संख्या शायद बहुत न हो। 

यह प्रासंगिक होगा यह जानना कि इस दौरान सबसे अधिक  पढ़ा जाने वाला ग्रंथ ‘दुर्गा सप्तशती’ इस बारे में क्या कुछ कहता है। जिन दो मुख्य पात्रों को लेकर इस ग्रंथ की रचना हुई -राजा सुरथ, और वैश्य समाधि, उन्होंने किस निमित्त माँ दुर्गा की आराधना की और अपनी तपस्या से प्रसन्न कर माँ दुर्गा से क्या माँगा?

मेधा ऋषि की प्रेरणा से इन दोनों ने कठोर तपस्या से माँ दुर्गा को प्रसन्न किया। और उनके प्रकट होने पर अपने मनोभिलाषित वरदान माँगे। राजा सुरथ ने दूसरे जन्म में नष्ट न होने वाला राज्य माँगा तथा इस जन्म में भी शत्रुओं की सेना को बलपूर्वक नष्ट करके पुनः अपना राज्य प्राप्त कर लेने का वरदान माँगा। समाधि वैश्य का चित्त संसार की ओर  से खिन्न और विरक्त हो चुका था और वो बहुत बुद्धिमान भी था, अतः उसने तो ममता और अहंता रूप आसक्ति का नाश करने वाला ज्ञान माँगा। देवी ने दोनों को मनोभिलाषित वरदान प्रदान किए।

वरदान माँगने की इस कथा से मुझे दो  बातें समझ में आती हैं। एक तो यह कि देवी से कुछ भी माँगा जा सकता है और देवी वो दे भी देती हैं। इसलिए हमें अच्छी तरह से सोच कर वरदान माँगना चाहिए। क्योंकि वरदान माँगने का अवसर बार-बार तो मिलने वाला है नहीं। दूसरा यह कि इस अवसर पर और देवी की कृपा अर्जित करने के बाद प्रतिफल की कामना में हमें आसक्ति या विरक्ति दोनों विकल्प उपलब्ध हैं। यह हमें तय करना है कि हम चाहते क्या हैं?

यह भी अचरज में डालने वाली बात है कि देवी जिसे जैसा वरदान देना चाहती हैं उस से वैसे ही वरदान की याचना भी करवा लेती हैं। वो तो योगियों और ज्ञानियों के चित्त को भी बलात् मोह और माया में पाशबद्ध कर देती हैं सप्तश्लोकी दुर्गा का प्रथम श्लोक ही कहता है,

ॐ ज्ञानिनामपि चेतांसि देवी भगवती हिसा ।
बलादाकृष्य मोहाय महामाया प्रयच्छति ॥1

अर्थात् वे भगवती महामाया देवी ज्ञानियों के भी चित्त को बलपूर्वक खींच कर मोह में डाल देती हैं। इसलिये माया और मोह के गर्त से निकलने के लिए देवी की शरण के सिवा और कोई उपाय या मार्ग नहीं है। लेकिन यह बात समझनी इतनी आसान भी नहीं है।

माँ भगवती का आभास अनुभूत हो सकता है अभिव्यक्त करना कठिन ही नहीं, कदाचित् असंभव ही है। श्रीदेव्याथर्वशीर्ष कहता है, जिसका स्वरूप ब्रह्मदिक नहीं जानता-इसलिए जिसे अज्ञेया कहते हैं, जिसका अंत नहीं मिलता -इसलिए जिसे अनंता कहते हैं, जिसका लक्ष्य दिख नहीं पड़ता -इसलिए जिसे अलक्ष्या कहते हैं, जिसका जन्म समझ में नहीं आता -इसलिए जिसे अजा कहते हैं, जो अकेली ही सर्वत्र है – इसलिए जिसे एका कहते हैं, जो अकेली ही विश्वरूप में सजी हुई हैं, इसलिए जिसे नैका कहते हैं, वह इसलिए अज्ञेया, अनन्ता, अलक्ष्या, अजा, एका, और नैका कहाती  हैं।

सोचता हूँ जिस देवी माँ का स्वरूप और प्रकृति ऐसी हो, उनसे कुछ माँगने की धृष्टता करना  मूर्खता नहीं तो और क्या है? लेकिन माया के अधीन हम सभी उनसे माँगते अवश्य हैं। यह उनकी उदारता और अमित, अपरामेय कृपा एवं अनुग्रह है कि वे तब भी हमें देती हैं और देती ही रहती हैं। क्या माँगना चाहिए, काश यह भी हमें बता देती तो कितना श्रेष्ठ होता? लेकिन इसकी अपेक्षा माँ हमसे रखती हैं। 

इस अपेक्षा के अनुरूप माँगने की बुद्धि भी उनके अलावा और कौन दे? इसलिये शायद वैश्य समाधि ने जो माँगा वह मुझे श्रेष्ठतर और स्थायी लगता है।

समर्पण – संपूर्ण और सर्वतोभावेन समर्पण,इसलिए, लगता है भक्ति, प्रार्थना और याचना का सर्वोत्कृष्ट स्वरूप है। और संभवतः सहजतम भी।

Published by udaykumarvarma9834

Uday Kumar Varma, a Harvard-educated civil servant and former Secretary to Government of India, with over forty years of public service at the highest levels of government, has extensive knowledge, experience and expertise in the fields of media and entertainment, corporate affairs, administrative law and industrial and labour reform. He has served on the Central Administrative Tribunal and also briefly as Secretary General of ASSOCHAM.

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