
गिलहरियों पर कोई क्यों लिखे? क्या ख़ास बात है उनमें?
बात तो सही है। भारत में देखें या अमेरिका में, गिलहरियाँ सर्व व्यापी हैं। हाँ, यह अवश्य है कि उनके रूप रंग, आकार, और आकृतियाँ अलग अलग हैं। उनकी प्रकृति लेकिन कमोबेश सर्वत्र समान ही है। वही चंचलता, वही चपलता,वही लुका-छिपी। और वही सौंदर्य, वही मन लुभावने अठखेलियाँ।
लगभग दो महीने पहले जब मैं यहाँ आया था, गिलहरियाँ बहुत कम दिखती थीं, जो दिखती थीं, वो बहुत छोटे क़द काठी की थीं। हमारे यहाँ जो गिलहरियाँ होती हैं, उनसे भी छोटी। धारियाँ उनकी पीठ पर भी होती हैं लेकिन उनका रंग पीलापन लिए हुए रहता है। कोई ध्यान न दे तो ऐसा लगे कि वे थोड़े बड़ी आकार के चूहे तेज़ी से दौड़ रहे हों। फुर्तीली तो वे भी खूब हैं और शायद कुछ ज़्यादा शर्मीली।
लेकिन पिछले पखवाड़े से जिन गिलहरियों ने अपने दर्शन देने शुरू किए हैं वे तो बहुत अलग हैं। भूरी, अपेक्षाकृत बहुत बड़ी, धूल के रंग वाली और बेहद सक्रिय और शरारती। इनकी धूसर-भूरी काया, अगर इनकी स्निग्ध श्वेत अंतर्देह को छोड़ दें तो, मुलायम फर से आच्छादित रहता है और अक्सर इतना चमकदार होता है कि धूप में चाँदी-सा झिलमिला उठता है।
और क्या पूँछ पाई है इन गिलहरियों ने। लगभग उतनी ही लंबी जितना उनका शरीर, झबरीली, भरी- भरी पूँछ जो उनके व्यक्तित्व को एक अद्भुत स्वरूप प्रदान करती हैं। और धमा चौकड़ी तो इनकी इतनी ऊर्जावान और ध्यान आकृष्ट करने वाली हैं कि उन्हें देख कर अनदेखी करना क़तई संभव नहीं है। इनकी गतिविधियों में एक अद्भुत आकर्षण है। जिस तरीक़े से ये दौड़ लगती हैं, और अचानक ठिठक कर अपने दोनों पिछले पैरों पर निश्चल और स्तब्ध हो जाती हैं, मुश्किल है कि आप अपना ध्यान इनसे हटा पायेंगे।

बगीचे में, लॉन में, विशालकाय ओक के तनों और पत्तियों में, मेपल के गहराते रंगों की टहनियों और शाखाओं पर, ये सर्वत्र दृष्टिगोचर हो रही हैं। इनकी इस बहुसंख्यक उपस्थिति की क्या कोई विशेष वजह है? शायद हाँ। ठंड के दिन आने वाले हैं, ऐसी ठंड जिसमें इनका बाहर निकालना लगभग नामुमकिन हो जाएगा। उस समय तो इनका भोजन मिलना भी असंभव होगा। इनकी इस समय की गतिविधियाँ भविष्य के आत्म-संरक्षण की तैयारी हैं। इन दिनों ओक के एकॉर्न बहुतायत से उपलब्ध हैं। और इन एकॉर्नों के भीतर छुपा है स्वादिष्ट और पुष्टिदायक खाद्य पदार्थ। ये गिलहरियाँ इन अकॉर्न्स को एकत्र कर रही हैं। आने वाले प्रतिकूल समय और ऋतु में अपने अस्तित्व को बचाने की तैयारी में जुटी हैं। इसलिए इनकी गतिविधियाँ जो हमे अठखेलियाँ लग रही है, वे एक बहुत गंभीर संघर्ष है अपने अस्तित्व को अक्षुण और निरंतर बनाए रखने के लिए।
गिलहरियाँ Sciuridae नामक परिवार से आती हैं। दुनिया भर में इनकी लगभग 200 प्रजातियाँ पाई जाती हैं। इस इलाक़े में ईस्टर्न ग्रे स्क्विरेल (Eastern Gray Squirrel) सबसे आम गिलहरी है। ये गिलहरियाँ लगभग 20 इंच लंबी होती हैं (पूँछ सहित) और एक अच्छी-खासी छलाँग में अपने शरीर की लंबाई से भी ज़्यादा दूरी तय कर लेती हैं।
इनके दाँत जीवनभर बढ़ते रहते हैं, इसलिए वे लगातार कुछ न कुछ कुतरती रहती हैं ताकि दाँत संतुलन में रहें।और उनके शरीर का संतुलन बन पाता है उनकी लंबी, घनी पूँछ की वजह से। गिलहरियाँ जो विस्मित कर देने वाली छलाँगे लगती हैं उसमे उनकी पूँछ ही उनका संतुलन साधती हैं तथा पैराशूट की तरह गिरावट को धीमा भी करती हैं।
भारत में तो गिलहरियों को क़रीब क़रीब एक पवित्र और सम्माननीय स्थान प्राप्त है। इनके पीठ की लकीरें भगवान राम की उन पर हाथ फिराने के अमिट छाप का वरदान है। इस देश में गिलहरियों को ऐसी विशेष मान्यता प्राप्त होने का सौभाग्य तो नहीं है लेकिन उनकी उपस्थिति और उनका अस्तित्व और उनका सान्निध्य लोगों को एक अद्भुत ख़ुशी और शांति अवश्य प्रदान करती होगी। गिलहरियों की अलौकिकता और उनका वैशिष्य इसी अनाम आनंद का प्रतिबिंब है।
गिलहरियों पर लिखना इसलिए सार्थक है, क्योंकि आपा-धापी वाली इस ज़िंदगी में गिलहरियों से हमारा संबंध और सान्निध्य एक विशेष प्रकार के आत्मिक संतोष और आनंद के पर्याय है।
इस आनंद को चुराने से चूकिये मत.