भारत में इन दिनों नवरात्रि के उत्सव की धूम है। लगभग पूरा ही देश माँ दुर्गा की आराधना और उनकी साधना में किसी न किसी रूप में जुड़ा हुआ है। लेकिन एक संप्रदाय ऐसा भी है जो इस दौरान अपना नव वर्ष माना रहा है। और यह संप्रदाय या धर्म है यहूदी धर्म, जिसे अंग्रेज़ी में Judaism के नाम से जाना जाता है।
आज की सभ्यताओं में नव वर्ष अक्सर त्योहार की तरह ही मनाया जाता है। और इस त्योहार को मनाने के बड़े अनूठे और मनोरंजक तरीक़े हमने ढूँढ लिए हैं। वैसे तो यह उत्सव अमूमन एक दिन या एक रात तक सीमित रहता है, लेकिन यहूदी इस त्योहार को पूरे दो दिनों तक मानते हैं। रोष हशाना, यहूदियों के नव वर्ष के शुभारंभ का जश्न है जिसकी शुरुआत इस वर्ष २२ सितंबर को दोपहर बाद हुई थी और यह २४ सितंबर की दोपहर तक चलेगा। यानी कि पूरे दो दिन। रोष हशाना की यह पहली ख़ासियत है।
दुनिया भर में नया साल अक्सर उल्लास और उत्सव का पर्याय होता है। घड़ी की सूई जैसे ही बारह पर पहुँचती है, आतिशबाज़ी फूट पड़ती है, गीत-संगीत गूंज उठते हैं और लोग नाचते-गाते नए वर्ष का स्वागत करते हैं। लेकिन यहूदियों का नववर्ष—रोष हशाना—उत्सव तो है लेकिन इसमें अंतर्निहित है कुछ और भी। क्योंकि यह केवल कैलेंडर बदलने की औपचारिकता नहीं, बल्कि आत्मनिरीक्षण और आध्यात्मिक नवीनीकरण का अवसर भी है। रोष हशाना की यह दूसरी ख़ासियत है। इस दृष्टिकोण से उनके पर्व मनाने की परंपरा और आस्था, और हमारी आस्था में कहीं तो कुछ मेल है। क्योंकि हमारे यहाँ त्योहारों के साथ मानव मूल्यों के कुछ आयाम हमारे उत्सवों में समाहित अवश्य रहते हैं।
रोष हशाना का शाब्दिक अर्थ है वर्ष का मस्तक,या वर्ष का शीर्ष अर्थात् वर्ष की शुरुआत। यहूदी मान्यता के अनुसार, इसी दिन आदम और हव्वा की रचना हुई थी और यहीं से मानवता की यात्रा शुरू हुई। यही कारण है कि यह पर्व यहूदी समाज में समय के प्रवाह में एक ठहराव और नये सिरे से शुरुआत का प्रतीक बन गया है।
रोष हशाना एक आरंभ है। इसके बाद आते हैं “दस दिन की श्रद्धा और भय”—Days of Awe—जब हर व्यक्ति अपने जीवन को परखता है। यहूदी विश्वास के अनुसार, इन दिनों ईश्वर “जीवन की पुस्तक” खोलते हैं और यम किप्पुर (Day of Atonement) पर उसमें अंतिम निर्णय दर्ज होता है। इन दस दिनों का अंतराल यहूदियों के लिए प्रायश्चित और क्षमा के दिन है। मान्यता है कि उसी दिन तय होता है कि किसका जीवन अगले वर्ष कैसा होगा। इस प्रकार रोष हशाना और यम किप्पुर मिलकर यहूदियों के धार्मिक संसार का सबसे गहन, आध्यात्मिक और महत्वपूर्ण पड़ाव बनाते हैं। यह आस्था कि हर वर्ष, हर दिन, हर क्षण हमारे जीवन की किताब में कुछ लिखा जा रहा है—और कल का पृष्ठ आज के कर्मों से ही बनेगा, सनातन के कार्मिक मान्यताओं की प्रतिध्वनि प्रतीत होता है।
उपवास रखने की परंपरा कमोबेश सभी धर्मों में है। अक्सर उपवास की समाप्ति पर बड़ा त्योहार मनाया जाता है। नवरात्रि समाप्त होती है तो विजयदशमी का वृहत समारोह मनता है। इस्लाम में रमज़ान के रोज़ों के बाद ईद का त्योहार मनाया जाता है। ईसाईओं में भी लेंट (lent) के उपवास और उसके पश्चात ईस्टर के त्योहार को मनाने की परंपरा है। रोष हशाना की तीसरी ख़ासियत यह है कि यहाँ उपवास नव वर्ष के उल्लासमय समारोह के बाद शुरू होते हैं। लेकिन ये सभी परंपराएँ बताती हैं कि मानव जाति भले अलग भाषाओं और विश्वासों में बंटी हो, उसकी आध्यात्मिक प्यास एक ही है
रोष हशाना पर यहूदी धर्मावलंबी शोफार (मेढ़े के सींग से बनी तुरही) बजाते हैं। कहते हैं कि इसकी गूंज आत्मा को जगाती है और ईश्वर से संवाद की पुकार है। मान्यता है कि यह ध्वनि व्यक्ति को अपनी गलतियों पर विचार करने और सही रास्ते की ओर लौटने की प्रेरणा देती है।
इस अवसर पर मीठे खाद्य विशेष महत्व रखते हैं। सबसे प्रसिद्ध परंपरा है—सेब को शहद में डुबोकर खाना। यह आने वाले वर्ष को मिठास और सुख-समृद्धि से भरने की प्रतीकात्मक कामना है। साथ ही, परिवार और समुदाय मिलकर उत्सव मनाते हैं, एक-दूसरे को शुभकामनाएँ देते हैं।
“थोड़ा ठहरो, अपनी गलतियों से डरो नहीं, उन्हें पहचानो। अपने रिश्तों को संवारो, अपने कर्मों को सुधारो, और आने वाले कल को मधुर बनाओ। “ रोष हशाना पर होने वाली यहूदी प्रार्थनाओं का यही सारांश है। हमारे समय में, जब जीवन की रफ्तार हमें भीतर झाँकने का अवसर ही नहीं देती, रोष हशाना एक ठहराव की बात करता है। यह रोष हशाना की चौथी ख़ासियत है।
आत्मा की चिरंतनता का संदेश हमें भगवत् गीता से मिलता है। रोष हशाना आत्मा के नवीनीकरण का संदेश देता है। इसमें आत्म शक्ति को दृढ़तर बनाने का संकल्प है और यह विश्वास भी कि नए वर्ष में हमारे बीच मिठास हो, कटुता नहीं; मेल-मिलाप हो, विघटन नहीं; और न्याय तथा दया का प्रकाश हर अंधकार को मिटा दे।
जब यहूदी परिवार शहद में डूबा सेब खाते हैं, तो शायद यह भी अवश्य सीखते होंगे कि जीवन की मिठास केवल शहद और फलों में नहीं, बल्कि क्षमा करने की क्षमता, प्रेम बाँटने की प्रवृत्ति और अपनी गलतियों को सुधारने के साहस में छिपी है।