
अमरीका के मेरे अस्थायी आवास के सामने और पीछे लॉन में अक्सर हिरण दिख जाते हैं। कभी अकेले, कभी जोड़े में, और कभी छोटे छोटे छौनों के साथ, शायद माँ और उसके बच्चे। जिस जगह मैं रहता हूँ वह न्यू जर्सी राज्य में है और इस जगह को शॉर्ट हिल्स के नाम से जाना जाता है। और जैसा कि नाम इंगित करता है यह पूरा हिस्सा पहाड़ी है, सुंदर हरी-भरी पहाड़ियाँ, जिन पर बिखरे पड़े हैं बड़े आकर्षक और काफ़ी हद तक अभिजात्य घर। यहाँ घर एक दूसरे से काफ़ी दूरी पर अवस्थित है। काफ़ी बड़े घर हैं। और हर घर यहाँ रहने वाले वर्ग की सुरुचि का प्रतिबिंब। हरेक घर के चारों ओर काफ़ी जगह है जहां लोगों ने सुंदर लॉन, फूलों की क्यारियों, और बगीचे बना रखे हैं। एक और ख़ास बात यह है कि थोड़े थोड़े अंतराल पर जंगल भी हैं, अच्छे घने जंगल। ये हिरण मुख्यतया वहीं रहते हैं लेकिन स्वच्छंद विचरण करते हैं। यहाँ ज़्यादातर घरों में चहारदीवारियाँ नहीं होतीं इसलिए ये हिरण बिना किसी रोक टोक के घरों के सामने, पीछे या सड़कों पर घूमते रहते हैं। यहाँ के रहने वालों के लिए हिरणों का दर्शन न उत्तेजना पैदा करता है न प्रतिवाद बावजूद इसके कि वे अक्सर लॉन चर जाते है और फूलो के छोटे पौधों को कुतर जाते हैं।

ख़रगोश भी यहाँ बहुतायत से पाये जाते है। सफ़ेद मुलायम वाले नहीं, बल्कि भूरे और क़द में थोड़े छोटे। टहलते समय वे अक्सर अपनी फुर्तीली छलांग से चौंका देते है। उनके लिए बिलों को बनाने के लिए जगह की कोई कमी नहीं है।
रात में, कभी कभार लोमड़ियों भी दिख जाती हैं। शायद शिकार की तलाश में। पक्षी और ये ख़रगोश उनके आहार हैं और प्रकृति के नियमों के अनुरूप उचित संतुलन में सभी का कम काज चलता प्रतीत होता है।
हिरणों को आहार बनाने वाले पशु तो यहाँ हैं नहीं। कभी किसी शेर या तेंदुए के दर्शन तो हुए नहीं। लोग बताते हैं कि ऐसे पशु यहाँ हैं ही नहीं। कभी कभी सोचता हूँ कि काल- क्रम में जब हिरणों की बहुतायत होती होगी तो प्रकृति उनका सांख्यिक संतुलन कैसे लाती होगी? कभी यहाँ के वन विभाग के कर्मचारियों से चर्चा होगी तो यह सवाल अवश्य पूछूँगा।
हमारे देश में तो हिरणों को इतनी आसानी से देखना कठिन है। उसके लिए तो जंगल जाना होता है। हाँ, जब खेतों में फसलें खड़ी होती हैं तो नीलगाय मैदानी इलाक़ों में अवश्य दिख जाते हैं। हमारे जो वन अभयारण्य हैं उनसे लगे हुए आबादी वाले इलाक़ों में भी कई बार हिरण और सुअरों के दर्शन हो जाते हैं। लेकिन घरों के आस पास हिरणों के दर्शन तो अत्यंत दुर्लभ हैं। इसलिए मुझे इतनी सुलभता से मिला उनका सान्निध्य प्रिय भी है, और मन को प्रमुदित करने वाला अनुभव भी।
सर्दियाँ आने वाली हैं। पतझड़ का मौसम तो शुरू हो चुका है। ओक, मेपल,ट्यूलिप, के विशाल वृक्ष अपनी पत्तियों को अद्भुत रंगों से भर रहे हैं, पीले, नारंगी, लाल, रंग हरियाली पर क़ब्ज़ जमाते जा रहे हैं। महीने भर में इन्ही रंगो का साम्राज्य स्थापित हो जायेगा। लेकिन यह आधिपत्य भी ज़्यादा टिकेगा नहीं। यही प्रकृति का नियम है। नवम्बर के मध्य तक ये रंगीनियाँ भी बिखरने लगेंगी। पत्ते ज़मीन पर गिर जाएँगे और बचेंगे सिर्फ़ इन गगनचुंबी दरख़्तों के ठूंठ। बाकलम बाणभट्ट के, अपने सुंदर और मनमोहक यौवन की स्मृति में मानो विलाप करते हुए, ‘नीरस तरुरः विलपति पुरूतः’। एक और महीने बाद बर्फ की एक हल्की सी परत इन ठूँठों को फिर से एक और अद्भुत सुंदरता प्रदान करेंगी। प्रकृति कभी कुछ लेती नहीं है। और अगर लेती है तो फिर वापस भी भरपूर करती है।

मैं सोचता हूँ सर्दियों में ये हिरण क्या करते होंगे? इस ठिठुराने वाली ठंड में वे कहाँ जाते होंगे? कहाँ शरण लेते होंगे? मन में थोड़ी परेशानी भी होती है। फिर सोचता हूँ जिस प्रकृति ने और जिस ईश्वर ने हम सबको रचा और ऋतुएँ भी बनाईं, उसने अवश्य इसके बारे में सोचा होगा। और कोई न कोई उपयुक्त विकल्प हिरणों को अवश्य दिया होगा।
घर की सुखद ऊष्मा संपन्न कमरे के आरामदायक बिस्तर पर सोचता हुआ मैं थोड़ा परेशान तो अवश्य रहूँगा लेकिन यह सोचते सोचते मैं सुखपूर्वक सो भी जाऊँगा कि यह भी तो प्रकृति ही है?