पितृ पक्ष : स्मृति, एवं कृतज्ञता का पर्व

श्राद्धेन पितरः तृप्ताःश्राद्धेनैव दिवौकसः।
श्राद्धेन विधृतं सर्वंश्राद्धं नः परमं तपः॥
(महाभारत)

इन दिनों पितृ पक्ष चल रहा है. भाद्रपद पूर्णिमा से अश्विन अमावस्या तक चलने वाले सोलह दिनों के इस कालखंड को हम श्राद्ध पक्ष भी कहते हैं। उनके लिए जो पितरों के अस्तित्व में विश्वास रखते हैं,  यह समय उनके प्रति अपनी श्रद्धा और कृतज्ञता को अभिव्यक्त करने का अवसर है। भारतीय परंपरा में यह माना जाता है कि इन दिनों पितर—हमारे पूर्वज—धरती पर अपने वंशजों से मिलने आते हैं। हम उन्हें तर्पण, पिंडदान और श्राद्ध के द्वारा स्मरण करते हैं, उनके प्रति आभार प्रकट करते हैं, और प्रार्थना करते हैं कि वे हमें आशीर्वाद दें।

पर हम में से कई ऐसे हैं जो ऐसा नहीं करते हैं। इसलिए इस पूरे पखवाड़े में कई तो प्रति दिन तर्पण करते हैं, कुछ विशेष दिनों को, और कई कुछ भी नहीं करते। लेकिन सनातन धर्म के सभी अनुयायी हैं। पितरों को विस्मृत करने से कोई संतान धर्म से बहिष्कृत नहीं होता। शायद यही सनातन धर्म की विशेषता है।

दुनिया के बहुसंख्यक धर्मों को छोड़ दें तो प्रकृति की पूजा सार्वभौमिक रूप से सभी सभ्यताओं द्वारा की जाती थी। और प्रकृति के साथ साथ अपने पूर्वजों को भी पूजने की प्रथा लगभग सभी संस्कृतियों में थी। बहुसंख्यक धर्मों में भी कुछेक को छोड़ दें तो पितरों के अस्तित्व को विश्वास और श्रद्धा से स्वीकारा गया है, और कहीं कहीं तो इसकी बड़ी महत्ता भी प्रदान की गई है।

तो पितृ पक्ष है क्या? क्या सचमुच पितर पृथ्वी पर आते हैं, अपने वंशजों को आशीर्वाद देने। या  यह एक सामाजिक परंपरा के निर्वाह के लिए बुद्धिमतापूर्ण बनाया गया उपक्रम है।? हम में से जो आत्मा के अस्तित्व पर विश्वास नहीं करते, उनके लिए पितृ पक्ष शायद मात्र एक अनावश्यक, अवैज्ञानिक, और रूढ़िवादी परंपरा है। वैसे वे लोग भी जो इस परंपरा का निर्वहन करते हैं, इस पर्व के साथ जुड़ी हुई तर्पण इत्यादि प्रक्रियायों को कष्टप्रद पाते हैं।   

पितर हैं कौन? व्यापक अर्थ में पितर केवल वे ही नहीं जिन्होंने हमें जन्म दिया। वे भी हैं जिन्होंने हमें संस्कार दिए, जिन्होंने हमारे लिए कष्ट सहे,  शिक्षा दी, और जिनके अनुभव, आशीर्वाद और कभी-कभी मौन त्याग से हमारा जीवन संभव हुआ। वे हमारे रक्त में हैं, हमारी स्मृतियों में हैं, और हमारे मूल्य उन्हीं से जन्मे हैं। हम में से जो तर्पण करते हैं वो जानते हैं कि तर्पण में हम अपने स्वयं के पूर्वजों के साथ साथ उन्हें भी याद करते हैं जो हमारे मित्र रहे हैं, गुरु रहे हैं, आप्तजन रहे हैं। 

श्राद्ध, तर्पण, पिंडदान—ये प्रकियायें प्रतीक हैं। प्रतीक उस ऋण को स्वीकार करने के, जिसे हम कभी चुका नहीं सकते। जैसे दीपक जलाकर अंधकार को हटाना एक प्रतीक है, वैसे ही अन्न और जल अर्पित करना हमारे भीतर छिपे आभार को व्यक्त करने का साधन है। विज्ञान की दृष्टि से भी इस समय सात्त्विक आहार, संयम और अनुशासन आवश्यक माने गए। पर उससे बड़ा विज्ञान यह है कि स्मरण करने से ही मनुष्य का हृदय उदात्त होता है, और कृतज्ञता उसकी आत्मा को निर्मल बनाती है।

हम सब का जीवन, हमारा वर्तमान, पिछली पीढ़ियों के संघर्ष और आशीर्वाद की निरंतरता का परिणाम है। पितृ पक्ष हमें यह याद दिलाता है कि हमारा यह जीवन  अतीत की अनगिनत पगचिह्नों का  अनुगमन है। 

“पितृणां मातरं चैव श्रद्धया पूजयेत सदा।”, महर्षि वाल्मीकि के इस निर्देश   का अनुपालन केवल मंत्रोच्चार या पिंडदान से नहीं, बल्कि स्मरण और आभार से भी हो सकती है। अपने बच्चों को पूर्वजों के संघर्ष की कहानियाँ सुनाना, उनके मूल्यों को अपनाना और आगे बढ़ाना— आधुनिक काल के श्राद्ध प्रक्रिया के अंग बनने चाहिए।

जीवन एक अनोखी नदी है जिसमें अतीत, वर्तमान और भविष्य की असंख्य धाराएँ मिलकर बहती हैं। पितृ पक्ष इसलिए मूलतः केवल अनुष्ठान ही नहीं, बल्कि वह बोध है जो हमें विनम्र बनाता है, कृतज्ञ बनाता है और हमें हमारी जड़ों से जोड़ता है। यही है पितृ पक्ष के कर्म कांड में निहित संदेश— स्मृति ही धर्म है, और कृतज्ञता ही सबसे बड़ा अर्पण।

हम धर्म भीरु हों या धर्म निरपेक्ष,या फिर अधार्मिक, आस्तिक हों या नास्तिक, श्रद्धा, कृतज्ञता और आभार के  भाव मानवीय प्रकृति के उत्कृष्ट आयाम हैं। पितृ पक्ष इस आयाम की अनुभूति का आह्वान है। और जब यह उनके प्रति हो जिन्होंने हमारे जीवन को बनाने में योगदान दिया है तो यह स्मृति और कृतज्ञता का पर्व बन जाता है। श्रद्धा एक अद्भुत अनुभूति है और पितृ पक्ष इस श्रद्धा की परम अभिव्यक्ति है। श्रद्धा ही पितृ पक्ष का स्थायी भाव है और यही पितरों के स्मरण की प्रेरणा भी है।

श्रद्धया पितृदेवानां त्रिप्यन्ति हव्यकव्यभुक्।
श्रद्धामूलानि भूतानिश्रद्द्धया सर्वमस्थितम्॥“

Published by udaykumarvarma9834

Uday Kumar Varma, a Harvard-educated civil servant and former Secretary to Government of India, with over forty years of public service at the highest levels of government, has extensive knowledge, experience and expertise in the fields of media and entertainment, corporate affairs, administrative law and industrial and labour reform. He has served on the Central Administrative Tribunal and also briefly as Secretary General of ASSOCHAM.

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