आज गणेश चतुर्थी है, भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की चतुर्थीं। भगवान गणेश के शुभागमन का प्रथम दिवस।
“त्वमेव प्रत्यक्षं तत्वमसि। त्वमेव केवलं कर्ताऽसि।
त्वमेव केवलं धर्ताऽसि। त्वमेव केवलं हर्ताऽसि॥” गणपति अथर्वशीर्ष का यह प्रारंभिक आवाहन गणेश को केवल विघ्नहर्ता नहीं, बल्कि सृष्टि के आधार, धारण करने वाले और हरण करने वाले प्रत्यक्ष तत्व के रूप में स्थापित करता है।
लेकिन गणेश की विशिष्ट पहचान यह है कि वे बुद्धि के देवता है, बुद्धि के प्रतीक भी। और बुद्धि शब्द में ‘सद्’ का अंश समाहित है। इसलिए गणेश सद्बुद्धि के देव हुए। विद्या देने वाली तो माँ सरस्वती हैं, लेकिन सद्बुद्धि देने का दायित्व गणपति ने ले रखा है।
वैसे इन दिनों ज्ञान का सागर सर्वत्र हिलोरे ले रहा है। इसकी बाढ़ सी आयी हुई है। और सबसे बड़ा ज्ञान का भंडार तो ह्वाट्सऐप के समूह हैं। उनके चलते किसी भी विद्या का अभाव महसूस ही नहीं होता। ज्ञान की अनवरत, अविरल और अनंत धारा प्रवाहित हो रही है। इसमें गोता लगाना मन को भाता भी है। तभी तो प्रत्यक्ष ज्ञान प्राप्त करने की ज़हमत कोई क्यों उठाये? जिन ढूँढा तिन पाइयाँ। हम सभी गोता लगा रहे हैं और अपनी श्रद्धानुसार ज्ञान अर्जित कर रहे हैं। कभी कभी ऐसा लगता है जैसे ह्वाट्सऐप अब माँ सरस्वती और भगवान गणेश का संयुक्त, अधिक विकसित और परिष्कृत अवतार के रूप में उद्भूत हुआ है।
तो फिर प्रभु गणेश के प्रकटोत्सव को इतने समारोह पूर्वक मनाने की होड़ सी क्यों लगी हुई है? एक से बढ़ कर एक भव्य आयोजन, एक से एक बढ़ कर सुंदर मनमोहक प्रतिमाएँ, एक से एक बढ़ कर सजावटें। न तो हमे ज्ञान चाहिए न ही बुद्धि, सद्बुद्धि तो क़तई नहीं। तो फिर गणेश जी की इतनी आव भगत क्यों? यह बात अलग है कि शायद कुछ वर्षों में गणेश की प्रतिमा की जगह गूगल सर्च के मानवीय स्वरूप या ह्वाट्सऐप के देवी स्वरूप की आराधना अधिक प्रचलित हो जाएगी। भगवान गणेश भी शायद गूगल सर्च का प्रभुत्व स्वीकार कर लें।
लेकिन प्रश्न यह है कि गणेश भगवान सब जानते हुए भी प्रकट क्यों होते हैं? या प्रकट होने का स्वाँग क्यों रचते हैं? शायद इसलिए कि उनके इस अल्प प्रवास के दौरान इतनी सद्बुद्धि वे दे जायें की अगले एक साल तक जब तक वे नहीं आते यह दुनिया बची रहे, इसका सर्वनाश न हो जाये।
ज्ञान और बुद्धि में अंतर है, बड़ा अंतर। ज्ञान के साथ अगर विवेक का समावेश हो जाये तो ऐसा ज्ञान सद्बुद्धि का स्वरूप ले लेता है। और यदि यह सद्बुद्धि सही रास्ते पर चल पड़े तो कल्याण का मार्ग प्रशस्त होता है। कल्याण स्वयं का भी,और लोक का भी। व्यष्टि और समष्टि के हित में विवेक और ज्ञान का समावेश और सामंजस्य अत्यंत वांछनीय है। लेकिन ह्वाट्सऐप विश्वविद्यालय या गूगल सर्च कम से कम अभी तो यह करने में असमर्थ हैं। शायद कभी हो जायें। इसलिए जब तक ऐसा हो न जाये, भगवान गणेश की कृपा और अनुग्रह तो हमें चाहिए।
सोचता हूँ ऐसे विचारों का मन में आना क्या आयु -जनित बेतुकापन है? या इस तरह की सोच में कुछ बल है, कुछ अंश सच्चाई का भी है? या शायद यह उम्र के सातवें दशक में प्रवेश से उद्भूत मानसिक प्रमाद है?
पता नहीं।