
न्यू जर्सी के इस घर के आँगन में Lagerstroemia के इस झाड़ीनुमा वृक्ष को देख कर मैं चकित भी हूँ, और मुदित भी। और क्या ख़ूबसूरती बिखेर रखा है इसके सुंदर गहरे गुलाबी पुष्प गुच्छों ने। यह हिंदुस्तानी पौधा अमरीकी ज़मीन पर कर क्या रहा है?
आँगन के इस शांत कोने में, जहाँ सुबह की पहली धूप ऊँचे वृक्षों की अलसाई सोती हुई पत्तियों को जगाती हैं, और जब धुँधलके में चिड़ियों की पहली तान कानों तक पहुँचने लगती है, तो ऐसा लगता है जैसे मंदिर में कोई स्तुति कर रहा हो। और जैसे जैसे रौशनी गहराती है तो इस पौधे की सुंदर,गरिमामय उपस्थिति वातावरण में बिखेरती है एक अद्भुत सी चमक। न ऊँची है, न फैली हुई, पर उसकी उपस्थिति में एक आत्मविश्वास है, एक रानी की सी गर्वीली शालीनता, जो बिना कहे ही सबका ध्यान खींच लेती है।
उसके फूल—गुलाबी से कुछ गहरे, रेशमी, झुर्रीदार और नाज़ुक—ऐसे लगते हैं जैसे वसंत ने स्वयं कागज़ पर कुछ रचनाएँ उकेरी हों। वे केवल रंग भरते नहीं, वे मन को महकाते हैं। वे न तो आडंबर करते हैं, न आग्रह, फिर भी उनकी कोमल निष्ठा मन को छू लेती है। जैसे कोई प्रिय राग, जो न जाने कितनी बार सुना जा चुका हो, फिर भी हर बार नया लगे।

वृक्ष नहीं, संवेदना
ज़ारूल एक बहुत प्रचलित शब्द नहीं है। लेकिन लॉजर्स्ट्रोमिया का निकटतम हिन्दी रूपांतरण अवश्य है। इसके कुछ और नामों में वनज्योतिष्मती, ताम्रपुष्पा, और सिद्धपुष्पी का शुमार है। दक्षिण भारत में यह कदंब मल्लिका के नाम से जानी जाती है। यह वृक्ष भारत और दक्षिण-पूर्व एशिया का मूल निवासी है, और यहाँ की आर्द्र और उष्ण जलवायु में खूब फलता-फूलता है। इसकी कई प्रजातियाँ हैं लेकिन Lagerstroemia speciosa (आम तौर पर Queen’s Crape Myrtle या Pride of India), Lagerstroemia indica (अक्सर सजावटी, छोटे आकार में) तथा Lagerstroemia flos-reginae (कुछ विद्वान इसे speciosa का पर्याय मानते हैं), प्रमुख हैं। मेरे प्रांगण का खूबसूरत पौधा Lagerstroemia indica प्रजाति का है।
इसके फूलों की सुंदरता जितनी दिखने में है, उतनी ही इसके औषधीय गुणों में भी। आयुर्वेद में इसका उल्लेख है—इसके छाल से बनी औषधि का उपयोग कभी ज्वर शांत करने में किया जाता था।
नारीत्व का सुमनीय स्वरूप
इस वृक्ष की उपस्थिति में मुझे स्त्रीत्व की एक आदर्श छवि दिखती है,—जो स्वयं में संपूर्ण है, नीरव और संयमित, पर भीतर से मजबूत और आश्वस्त। वह न तो अपने लिए अधिकार माँगती है, न दिखावे में यक़ीन रखती है। फिर भी जहाँ होती है, वहाँ एक प्रकार की गरिमा, और आधिपत्य स्वतः निर्मित हो जाता है।यह वृक्ष उन महिलाओं का प्रतीक है,जो अजनबी नगरों में, अज्ञात भूमियों पर अपने जड़ें जमाती हैं—और फिर वहाँ प्रेम, परिश्रम और सौंदर्य से घर रच देती हैं।
कवियों और ऋतुओं का वृक्ष
हमारे देश में तो जरूल पूरे बसंत और ग्रीष्म की शुरुआत में खूब खिलता है, अमरीका के इस हिस्से में यह जुलाई के महीने में अपनी पूर्ण आभा पर है, शायद अगस्त के महीने में भी बना रहे। वसंत के सर्वव्यापी सौंदर्य और सुषमा के चित्रण और वर्णन में कालिदास ने निस्संदेह जरूल के बारे में सोचा होगा। अन्यथा अपनी अप्रतिम कृति ऋतुसंहार में वसंत का ऐसा सजीव प्रस्तुतीकरण संभव हो ही नहीं पाता,
“मृदुलस्निग्धमसारश्च सुरभिर्मधुरः सुखः।
श्रियं वहति वासन्तिः सस्मितं वनराजिषु॥”
यह वृक्ष उसी वसंत का प्रतिनिधि लगता है—मृदुल, स्निग्ध, मंदस्मित। उसकी मुस्कान फूलों के रूप में बिखरी हुई है, जो थके हुए मन को विश्रांति प्रदान करता है।
रवीन्द्रनाथ ठाकुर की एक पंक्ति का स्मरण होता है:
“Faith is the bird that feels the light and sings while the dawn is still dark.”
लॉजर्स्ट्रोमिया भी तो ऐसा ही करती है—मौसम की उष्णता की प्रत्याशा में ही पूरी तरह से खिल उठती है। जैसे वह ऋतुओं से पहले भविष्य का आभास पा लेती हो।

विलय का स्वागत
इस बहस में की यह वृक्ष स्थानीय है या किसी अन्य भूमि से आयातित, में पड़ना तो निहायत ही बेमानी है। सत्य यह है कि इसने इस भूमि को अपना लिया है। इसने अपने परिवेश को पढ़ा है, यहाँ की मिट्टी की भाषा समझी है, और यहीं रम गयी है, मानते हुए कि अपनापन स्थान में नहीं, स्वीकृति में होता है। और कभी-कभी, सबसे सुंदर पुष्प वहीं खिलते हैं जहाँ वे रोपे नहीं गए थे—बस समय के प्रवाह से वहाँ आ गए थे।
लॉजर्स्ट्रोमिया को देखकर ऐसा लगता है जैसे प्रकृति ने आत्मा को दृश्य रूप दे दिया हो। उसका हर फूल एक मौन संदेश है—सौंदर्य, धैर्य, और गरिमा का। वह न उपदेश देती है, न अपेक्षा करती है, पर फिर भी हमें कुछ सिखा जाती है।
क्योंकि जहाँ सौंदर्य होता है, वहाँ निवास का प्रश्न गौण हो जाता है, और जहाँ गरिमा होती है, वहाँ अपनापन स्वतः घर बना लेता है।
क्योंकि तुम्हारा खिलना केवल फूलों का खिलना नहीं, विश्वास का एक प्रतिदिन दोहराया जाने वाला उत्सव है।
और तुम्हारा होना एक आश्वासन है—कि सौंदर्य कभी मौन नहीं होता, वह बस प्रतीक्षा करता है—किसी साधक के पारखी दृष्टि की।