जेठ की तपती दुपहरी में गुलमोहर के वृक्ष सबसे सुंदर लगते हैं, और शायद सबसे प्रभावान। ग्रीष्म की तपिश इसके फूलों में एक अदभुत निखार और चमक भर देती है, जैसे आग को एक रंग मिल गया हो।
लेकिन गुलमोहर केवल रंग नहीं, चमक नहीं, उत्सव नहीं — एक वक्तव्य है।
इस की दहक एक काव्यात्मक अभिव्यक्ति है, सौंदर्य की और सौंदर्य के नश्वरता की क्योंकि कुछ ही दिनों में ये मनमोहक फूल झड़ जाते हैं, धरती पर बिखर जाते हैं। लेकिन एक संदेश भी दे जाते हैं कि जीवन की अस्थिरता, क्षणभंगुरता, या अवसान —कोई भी कारण जीवन की अपूर्णता और अधूरेपन का कारण नहीं बन सकता। जीवन की परिपूर्णता स्थायित्व में नहीं, अमरत्व में नहीं, मृत्यु और प्रस्थान में भी है।
यह कविता इन्ही भावनाओं की अभिव्यक्ति है। और एक आग्रह भी, जो यह निवेदन करता है कि जीवन के दिनों को मत गिनो, बस देखो कि कितना जीवन है हर दिन में।
जब जेठ की धूप
धरती की नसों में उतरती है
और हवा की साँसें जलती हैं,
तब एक पेड़ निखरता है—
चमकता है, खिलखिलाता है,
गुलमोहर!
न लाल, न नारंगी, न केसरिया—
तीनों का दहकता समागम,
जैसे अग्नि ने पुष्प ओढ़ लिए हों
या ऋतुओं ने रच लिया हो
एक चटख उत्सव।
एक निःशब्द अग्नि शिखा की तरह
परिवर्तित हो जाता है यह वृक्ष
ग्रीष्म की तपन के स्पर्श से
और हर फूल थिरकता है
उसकी शाख़ों पर
एक आग की तरह
न पतझड़ का भय,
ना बारिश की अपेक्षा।
पर पता है?
गुलमोहर जानता है
कि उसका सौंदर्य टिकेगा नहीं,
कि उसके फूल झड़ेंगे,
शाख़ों से टूट कर
ज़मीन पर बिखर जाएँगे
फिर भी वह खिलता है,
जैसे यही उसका धर्म हो,
प्रकृति को उसका प्रत्युपकार,
उसका आभार, उसका प्रेम।
गुलमोहर के चमकीले फूल
एक संदेश देना चाहते हैं,
“जो जीवन मिला है, उसे रंग दे,
जो क्षण मिला है, उसे जी ले।
दहक, भले ही बुझ जा—
पर बुझने से पहले जल तो सही!”
गुलमोहर वृक्ष नहीं,पुकार है
हम सब के लिये,
और उस हर थक रहे निराश मन के लिए—
कि मत रुक, मत थक, मत झुक,
तू भी गुलमोहर बन
और खिल जा जीवन की तपिश में।