गुरु: परंपरा या यथार्थ?

“गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः।
गुरुः साक्षात् परं ब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः॥”

ब्रह्म के समकक्ष या शायद उससे भी ऊपर अगर किसी को माना गया है तो वह है गुरु। ऐसी महत्ता वाले गुरु की स्मृति में पिछले सप्ताह हमने गुरु पूर्णिमा मनाई। आषाढ़ मास की पूर्णिमा को भारतीय परंपरा में गुरु को पूजने की परिपाटी है। मान्यता है कि यह दिन व्यास ऋषि की जयंती है—वह ऋषि जिनका ऋषित्व केवल ज्ञान में नहीं, ज्ञान के विन्यास में था। यह दिन केवल श्रद्धा का नहीं, आत्मचिंतन और शायद सबसे अधिक—आत्म-निरीक्षण का दिन है।

हर वर्ष यह पर्व आता है और हम अपने-अपने गुरुओं को स्मरण करते हैं। लेकिन एक प्रश्न तब भी अनुत्तरित रह जाता है—गुरु वास्तव में होता कौन है? और क्या जिस गुरु का उल्लेख शास्त्रों में है, वैसे गुरु अस्तित्व में वस्तुतः हैं? आज के समय में’? 
गुरु क्या वह है जो हमें पढ़ाता है, विद्या देता है, कुछ ‘सिखा’ देता है? या फिर कोई ऐसा जिसकी व्याख्या कठिन है, और जिसकी उपस्थिति अक्सर अवचेतन में ही प्रकट होती है?

आज, जब गूगल सर्वाधिक लोकप्रिय और सार्वजनिक ‘गुरु’ बन चुका है, और जब शिक्षा स्वयं एक वृहद व्यापार में परिणत हो चुकी है—क्या कोई गुरु की अनुपस्थिति को वास्तव में महसूस करता है?

गुरु-शिष्य परंपरा: भारत की बौद्धिक आत्मा

लेकिन यह भी एक तथ्य है कि भारतीय संस्कृति की आत्मा में गुरु-शिष्य संबंध उसके सबसे उत्कृष्ट आयामों में से एक है। यह केवल ज्ञान के हस्तांतरण का संबंध नहीं था, बल्कि एक आध्यात्मिक अनुबंध का परिष्कृत रूप था।

गुरुकुलों में शिक्षा केवल विषयों का अध्ययन नहीं, जीवन जीने की कला थी। आचरण, अनुशासन, तप और आत्मनिष्ठा—ये सभी उस विद्या के अनिवार्य अंग थे जो मनुष्य को सम्पूर्ण बनाती थी।

गुरु न केवल विद्या देता था, वह विवेक भी जागृत करता था। वह शिष्य के भीतर की सुप्त जिज्ञासा को पहचानता और उसे आत्म-खोज की राह तक ले जाता।

राम के लिए वशिष्ठ, कृष्ण के लिए संदीपनि, बुद्ध के लिए आलार और उद्दक, विवेकानंद के लिए रामकृष्ण—ये सब गुरु इसलिए नहीं बने कि उनके पास ग्रंथ थे, बल्कि इसलिए कि वे जीवन का अर्थ जानते थे।

गुरु और शिक्षक 

अगर हम गुरु की उपरोक्त परिभाषा को स्वीकार करना चाहें तो आज हम जिस युग में जी रहे हैं, वहाँ ‘शिक्षक’ तो मिल जाते हैं लेकिन गुरु को पाना लगभग असंभव। शिक्षक हमें बहुतेरे मिलते हैं लेकिन गुरु? अत्यंत दुर्लभ। क्योंकि गुरु वह है जो उत्तर नहीं, प्रश्न करना सिखाता है, जो अनुशासन नहीं, स्वानुशासन जगा देता है, जो दिशा नहीं, दृष्टि देता है। गुरु ‘सत्ता’ नहीं, संवाद है। वह अपने शिष्य पर अधिकार नहीं जताता, बल्कि उसे स्वयं की यात्रा पर भेजता है। गुरु वह है जो ज्ञान नहीं, विवेक देता है। जो अपने भीतर उतरने से नहीं डराता, जो चुपचाप शिष्य की लड़ाई में उसके पीछे खड़ा रहता है।

गुरु हर समय सहमत भी नहीं होता, कई बार कठोर और अनुदार बन जाता है, कभी वह आहत भी करता है लेकिन सोद्देश्य, तो कभी प्रश्नों के उत्तर में मौन रह जाता है। 

बुद्ध के शिष्य आनंद जब बार-बार सत्य का आग्रह करते हैं, तो बुद्ध चुप रहते हैं। अंत में आनंद स्वयं कहते हैं — “मुझे कोई सत्य नहीं चाहिए, बस मार्ग चाहिए।” और बुद्ध मुस्कुराते हैं — अब तुम सीखने के योग्य हो गए हो।

गुरु वह नहीं जो उत्तर दे, गुरु वह है — जो प्रश्न को जीना सिखाए।

आत्मचिंतन का अवसर

तो गुरु पूर्णिमा को वे क्या करें जिन्हें गुरु की  कृपा अप्राप्त है। असंख्य लोग हैं ऐसे। उनमे से कई अपने पिता को, या माता को, या  अपने इष्ट देव या देवी को गुरु मान लेते है। दक्षिणामूर्ति शिव गुरु के ऐसे स्वरूप के शायद सर्वश्रेष्ठ उदाहरण हैं। 

शायद यह वह दिन है जब हम यह भी ठहर कर सोचें कि हमारे जीवन में कौन ऐसा रहा जिसने हमारे सोचने का तरीका बदला?किसने अपने आचरण और उदाहरण से हमे एक नई राह दिखाई? किसने हमे प्रेरित किया? उनका कृतज्ञ स्मरण भी गुरु की इस संस्था को उनके प्रति हमारी श्रद्धा और सम्मान का परिचायक हो सकता है।

सूचना के इस युग में जब सब कुछ उपलब्ध है, पर शायद मूल्य नहीं। जब भटकाव सरल है, और विचार जहां केवल ‘ट्रेंड’ बनते जा रहे हैं, जब आत्मा की आवाज़ की बात करना दक़ियानूसी लग सकता है, एक मार्गदर्शक की आवश्यकता तब अधिक अर्थपूर्ण  बन जाती है।

एक शाश्वत संवाद

कबीर कहते हैं—
“गुरु गोविंद दोउ खड़े, काके लागूँ पाय।
बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो बताय॥

तो कुछ तो होगा गुरु के अस्तित्व में, जिसने कबीर को ऐसा कहने के लिया प्रेरित किया होगा। कबीर के लिए गुरु ईश्वर तक पहुँचने का एक सोपान है, एक ऐसा सोपान जिसे पकड़ कर आवागमन के चक्र से मुक्त हुआ जा सकता है। कबीर के लिए गुरु कोई अलौकिक सत्ता नहीं, बल्कि वह प्रेरक तत्व है जो उन्हें ईश्वर की ओर ले जाता है।

एक और तरीक़ा है गुरु पूर्णिमा मनाने का। एक दार्शनिक सोच गुरु को एक व्यक्ति नहीं, बल्कि एक विचार के रूप में भी देखता है। गुरु एक विचार है जो एक संभावना भी है, प्रकाश भी है, एक मार्ग भी, और एक लक्ष्य भी। कठिन सोच है यह, जिसमे गुरु की भौतिक उपस्थिति गौण हो जाती है, शायद अर्थहीन भी। केवल मन का संकल्प, और विवेक की इच्छा शक्ति अहमियत पा जाती है, एक ऐसी सत्ता जो अंधकार और अज्ञान में प्रकाश और मार्ग दोनों प्रदान कर सकता है। एकलव्य ने यही तो किया था, गुरु के बिना भी गुरुत्व की अनुभूति, क्योंकि 
गुरु वह है जो मौन में भी प्रेरित करता है। गुरु कोई पद नहीं, एक प्रतीति है।

अब तक गुरु को खोज न पाने की कसक मन को टीसती है। कहते है शिष्य होना एक कृपा है: गुरु होना एक दायित्व। इस दायित्व को निभाने के लिए मुझे कब गुरु मिलेंगे, कहना कठिन है। लेकिन मिलेंगे अवश्य।

और तब तक शिष्यत्व की इस कृपा से मैं वंचित ही रहूँगा।

Published by udaykumarvarma9834

Uday Kumar Varma, a Harvard-educated civil servant and former Secretary to Government of India, with over forty years of public service at the highest levels of government, has extensive knowledge, experience and expertise in the fields of media and entertainment, corporate affairs, administrative law and industrial and labour reform. He has served on the Central Administrative Tribunal and also briefly as Secretary General of ASSOCHAM.

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