
“गुलमोहर की छाया में जो प्रेम होता है
वह कभी कागज़ पर नहीं उतरता—
वह आँखों में बसता है, और उम्र भर जलता है।”
मेरे घर के सामने एक गुलमोहर का वृक्ष है—और इन दिनों उसकी सुंदरता उत्कर्ष पर है। वह लहक भी रहा है, और दहक भी रहा है। उसके लाल-नारंगी फूल ऐसी छटा बिखेर रहे हैं कि आस-पास किसी और रंग, किसी और चमक, या किसी और गर्माहट की कोई गुंजाइश ही नहीं बचती। वह पेड़ नहीं, एक विस्फोट है; सौंदर्य का, रंग का, प्रकाश का।
वृक्ष नहीं विस्मय
फूलों के बिना यह वृक्ष साधारण सा लगता है—जैसे कोई दूसरा सामान्य वृक्ष। लेकिन जैसे ही उस पर फूल आते हैं, उसका समूचा व्यक्तित्व बदल जाता है—आमूलचूड़, और बन जाता है अलौकिक, और अद्वितीय। जैसे-जैसे फूलों का घनत्व और रंगों की प्रगाढ़ता बढ़ती है, उसकी पत्तियाँ न्यूनतर होती जाती हैं, और एक दिन ऐसा भी आता है जब वह केवल फूलों का पेड़ बन जाता है—जैसे लाल नारंगी रंग का एक ज्वाजल्य एवं विशाल अग्नि पुंज पेड़ के रूप में परिवर्तित हो गया हो। या फिर ऐसा लगता है जैसे एक ज्वालामुखी फूट पड़ा हो, और हम देख रहे हों —सौंदर्य का एक विस्फोट, रंगों की बहार, या फिर एक दहकती दिलकश कविता। रंग, चमक, आवेश, भाव, उत्तेजना, और चमत्कार का ऐसा अद्भुत सम्मिश्रण प्रकृति ने शायद ही इतनी उदारता से और इतनी विपुलता से किसी को उपहार में दिया हो।
और उस समय यह लगता है कि यह एक वृक्ष नहीं, विस्मय है, सुंदर और मंत्र- मुग्ध कर देने वाला विस्मय।

इसका नाम ग़ैर भारतीय है। मुझे पता नहीं इस नाम की व्युत्पत्त्ति क्या है? लेकिन नाम दिलचस्प है और फारसी भाषा का है। वैसे तो फारसी में इस शब्द का अर्थ होता है ‘फूलों का ताज’। लेकिन इस नाम में इन शब्दों के इतर भी कुछ ख़ास है। कहते हैं के यह मेडागास्कर का मूल निवासी है, और इसे अंग्रेज लेकर आये थे। तो अंग्रेजों ने इसे एक फारसी नाम क्यों दिया, यह समझ में नहीं आया। संभव है कि जिस किसी अंग्रेज ने इसे यह नाम दिया वह फारसीदाँ हो या फिर उसके किसी कारकून ने जो फरसी जानता होगा और जिसका सौंदर्यबोध भी विकसित होगा उसने यह नाम चुना हो। जो भी हो लेकिन नाम चुना गया अत्यंत श्रेष्ठ। ऐसा नाम जो लोगों के दिमाग़ और ज़ुबान दोनों पर चढ़ गया।
शायरी, कविता और गुलमोहर
और चढ़ा भी ऐसा कि कितने ही शायरों और कवियों ने इसे अपनी कल्पनाशीलता और शब्दों की जादूगरी का विषय बनाया।ख़ासकर इसके चटकीले सुर्ख़ रंग ने उनकी कविता को खूब प्रभावित किया। ज़ाहिर है कविता लोक में इस वृक्ष का प्रवेश पिछली दो सदियों में ही हुआ होगा। हिन्दी और उर्दू दोनों भाषाओं में इस पर खूब कविताएँ लिखी गईं हैं। उर्दू शायरी में लेकिन गुलमोहर का ज़िक्र प्रायः प्रतीकात्मक रूप से होता है—प्रेम, विरह, और रंगीन लेकिन क्षणभंगुर सौंदर्य के रूप में।
“तेरे जाने के बाद ये गुलमोहर भी सूख गया,
रंगों में भी अब तन्हाई का साया है।”
ऐसा कहना है राहत इन्दौरी का। और एक दूसरे शायर के लिये,
“गुलमोहर के साए में वो शाम ठहर सी जाती थी,
ना हम कुछ कहते थे, ना वक़्त कुछ पूछता था।”
हिन्दी कविता में भी गुलमोहर की अनुगूँज मिलती है। बहुतेरी कविताएँ लिखी गई हैं। एक बानगी देखिए, श्री प्रकाश शुक्ल की कलम से,
धूप खड़ी है
हवा स्तब्ध है
जेठ की धरती पपड़िया गई है
पगडण्डियाँ चिलचिला रही हैं
सड़क सुनसान है
और आदमी अपनी ही छाया में क़ैद है
एक ज़हर है
जिसमें पूरी बस्ती नीली हो गई है
बस, बचा है केवल गुलमोहर
जो अपने चटक लाल रंगों में
अभी भी खिलखिला रहा है !
गुलमोहर और विज्ञान
गुलमोहर का वैज्ञानिक नाम है Delonix regia जो Fabaceae परिवार का सदस्य है। इसकी पत्तियाँ द्विपत्री होती हैं—हर पत्ती छोटे-छोटे, रेशमी पत्तों से बनी होती है, जो शाम को मुँद जाती हैं।
यह वृक्ष तेज़ी से बढ़ता है, पर उसकी जड़ें सतह के पास फैलती हैं, जिससे निर्माणों के लिए समस्या हो सकती है। फिर भी यह मिट्टी में नाइट्रोजन की मात्रा बढ़ाता है—यानी ज़मीन को उपजाऊ बनाता है।
पर्यावरण की दृष्टि से यह वृक्ष लाभकारी है, और उसकी लंबी, छायादार शाखाएँ गर्म जलवायु में अत्यंत उपयोगी होती हैं।
उसके फूलों का रंग न तो शुद्ध लाल है, न केसरिया, न गुलाबी—यह तीनों रंगों का एक अद्वितीय सम्मिलन है, जैसे अग्नि के भीतर कोई पुष्प खिल रहा हो। उसका हर फूल एक पंख-सा, एक लौ-सा, और एक स्मृति-सा दिखता है। जैसे कोई पुराने प्रेम की स्मृति गर्मी की लू में फिर से उठ खड़ी हुई हो।
स्मृति के रंग
उन्नीसवीं शताब्दी में आयातित यह वृक्ष कब और कैसे हमारी रोज़मर्रा की ज़िंदगी का हिस्सा बन गया और हमारी स्मृतियों में छा गया? कैसे हमारे बगीचों, आवासीय परिसरों, और राजमार्गों का एक अभिन्न अंग बन गया?, यह कथा रोचक भी है और विस्मयकारी भी। एक वनस्पति के अविजित और अटूट यात्रा की यह कहानी उल्लेखनीय भी है और हृदय स्पर्शी भी। और इसने हर उम्र के लोगों को आकृष्ट और प्रभावित किया है। विशेषकर बचपन को।
गुलमोहर सिर्फ़ एक वृक्ष नहीं, वह बचपन की गर्मियों का स्मृति-चिन्ह है। यह वृक्ष नहीं समय है। स्कूल के मैदानों में, परीक्षाओं के बाद की छुट्टियों में, कभी किसी की डायरी के भीतर, तो कभी प्रेम पत्रों की तह में—गुलमोहर के फूलों ने हमारे जीवन में चुपचाप लेकिन मुकम्मल दाख़िला ले लिया है।
“गुलमोहर के फूलों को किताब में छुपाया किये,
एक रंग क़यामत तक शायद चुराया किये।“
ऐसा रंग, जैसा कोई नहीं
कई लोग कहते हैं कि गुलमोहर में अपने चटकीले फूलों के सिवा और है क्या? ऐसे महिमा मंडन की योग्यता शायद इसमें है नहीं। लेकिन वे ग़लत हैं। क्योंकि गुलमोहर सिर्फ़ एक वृक्ष नहीं, वह प्रकृति का उत्सव है। वह मौसम के विरुद्ध खड़ा होता है, और उसे अपनी ज्वालामयी छाया से जीत लेता है। इसकी डालियों से धूप लिपटती है, और इसके सान्निध्य में होता है रंगों का गान। यह वृक्ष नहीं, विस्मय है। फूल नहीं, अग्नि है। रंग नहीं, अनुभव है।
एक ऐसा वृक्ष जिसे प्रकृति ने कविता बना दिया है।