(क्या कभी अपने ऐसा वृक्ष देखा है, उसकी छाँव में रूके हैं, जो मन में नीरव किंतु अद्भुत संवेदना भर देती हो? जैसे एक कविता वृक्ष के स्वरूप में जीवंत हो गई हो।
अपनी प्रातःकालीन सैर के दौरान इस वृक्ष की छाया में मैं अक्सर थोड़ी देर अवश्य ठहरता हूँ। और अनायास ही मेरा मन एक भावनात्मक अतिरेक से भर जाता है।
मौलश्री है तो एक वृक्ष लेकिन यह केवल पत्तों, फूलों और छाया का भौतिक संयोजन नहीं, बल्कि हमारी चेतना और सौंदर्य बोध, हमारी कल्पना और स्मृति का प्रतीक भी है।
यह कविता “मौलश्री की प्रतीक्षा”, इस वृक्ष से मौन संवाद को स्वर देती है, जो इस वृक्ष की छाया में बैठकर ही समझा जा सकता है — न इसमें कोई ज़िद है, न कोई तर्क, केवल एक धीमी पुकार है जो कहती है — “ठहरो”, “देखो”, “सुनो” — जीवन की गति से पहले उसका मौन भी समझो।”
यह कविता प्रकृति से दूर होते हुए आज के मनुष्य को, उसकी स्मृति, उसकी करुणा, और उसके ठहराव की ओर पुनः लौटने का निमंत्रण है — ठीक वैसे ही जैसे मौलश्री हर सुबह अपनी छाया में एक रिक्त स्थान बचाकर रखती है… आपके लौट आने के लिए।)
मौलश्री की प्रतीक्षा
मैं मौलश्री की छाँव में खड़ा हूँ —
धूप के छोटे-छोटे रोशनदान
ज़मीन पर बिखरे हैं,
और एक नर्म हवा
चुपचाप मेरे चेहरे को सहला जाती है।
मैं मौन हूँ,
छाँव भी मौन है —
क्योंकि मौलश्री सिर्फ़ छाँव नहीं,
मौन की भाषा है।
गंध नहीं,
स्मृति की परिभाषा है।
वह कुछ नहीं कहती,
पर इसके हर अंग में
एक नीरव स्वर छिपा है —
यह वृक्ष नहीं,
किसी ऋषि का उत्तर है।
कालिदास ने तुम्हें बकुल कहा,
कभी केसर, कभी कुंद के संग सजाया।
राजशेखर की काव्य मीमांसा में
तुम सौंदर्य का शास्त्र बनीं,
वाल्मीकि ने तुम्हारी छाया में
प्रेम और प्रतीक्षा के पद रचे।
सावन की साँझ जब फूल झरते हैं —
धीरे, चुपचाप,
तो लगता है कोई ध्यानरत ऋषि
संवेदना की वर्षा कर रहा हो।
“मन्दं समीरपतितं कुसुमं बकुलस्य” —
कालिदास ने लिखा,
पर पता नहीं कितने कवियों ने
तुम्हारे फूलों में अपनी साँसें बुनी हैं।
तुम्हारी पत्तियाँ वंदनवार की तरह झूमती हैं,
शाखाएँ किसी राग की तरह खुलती हैं —
और कहती हैं :
ठहराव भी एक सौंदर्य है,
हर गति के पीछे
एक मौन विराम है।
तुम्हारी छाया में
न कोई शर्त है, न आग्रह —
बस एक निःशब्द अपनत्व,
जैसे माँ की गोद,
जो कुछ कहे बिना
सब कुछ दे देती है।
पर अब…
जब शहरों के आकाश पर
धुएँ के बादल छाए हैं,
और मन की धरती पर
संवेदना के बीज सूख चुके हैं —
तुम कुछ नहीं कहती मौलश्री,
सिर्फ़ प्रतीक्षा करती हो —
कि कोई लौटे,
थोड़ी देर ठहरे,
और धीमे से कहे —
“मैंने तुम्हें याद किया।”
तो कभी…
जब जीवन थक जाए,
जब तुम्हारा मन बोझिल हो,
या आत्मा संतप्त हो,
तो मौलश्री की छाया में आकर बैठना।
उसकी साँसों में गुँथी सुगंध से
धीरे से पूछना —
“शांति क्या होती है?”
शायद वो उत्तर न दे,
पर उसके झरते फूल
तुम्हारे मौन प्रश्न का
लय समझ लेंगे।
क्योंकि तुम, मौलश्री —
वृक्ष नहीं,
एक अनुभूति हो,
एक ऐसा एहसास
जिसे शब्दों में बाँधा नहीं जा सकता।
तुम एक ऐसी कविता हो —
जो हमने न लिखी, न पढ़ी,
पर जो हमारे अंतर में
धीरे-धीरे गढ़ती रही…
और अब भी
हमारे लौटने की राह
सहज, मौन… देख रही हो।