
अशोक के बारे में कहा जाता कि वह तब फूलता है जब कुमारिकाएँ उसकी जड़ों पर पदाघात करती हैं। कवि कल्पनाओं की प्रसिद्धियों में यदि अशोक सर्वाधिक उल्लिखित है तो एक ऐसा वृक्ष भी है जो इसके समकक्ष माना जा सकता है, और वह है मौलश्री या बकुल वृक्ष। किन्दवंती कहती है कि बकुल भी तब विकसित होता है जब उस पर कामिनियों के मुखवासित मद्य की फुहार गिरती है।
कालिदास ने इस कल्पना को मेघदूत में अलौकिक सौंदर्य से रचा—
“रक्ताशोकश्चलकिसलयः केसरश्चात्र कान्तः
प्रत्यासन्नौ कुरवकवृतेर्माधवीमण्डपस्य।
एकः सख्यास्तव सह मया वामपादाभिलाषी
कांक्षत्यन्यो वदनमदिरां दोहदच्छद्मनास्याः।”
[हे मेघ ! क्रीड़ाशैल पर, कुरबक वृक्षों की पाँत वाले वासन्ती लता-मण्डप के समीप रक्ताशोक एवं सुन्दर बकुल के दो वृक्ष लगे हुए हैं । उनमें से एक रक्ताशोक – मेरे साथ आपकी सखी के बाँए पैर के ताड़न का अभिलाषी है । दूसरा बकुल – प्रफुल्लित होने के लिये आपकी सखी के मुख की मदिरा उच्छिष्ट रूप में चाहता है ।]
राजशेखर की काव्यमीमांसा में भी यह बात प्रतिध्वनित होती है—
“सिक्तो न वक्त्रमधुना बकुलश्च चैत्रे
चित्रं तथापि भवति प्रसवावकीर्णः॥”
सचमुच बकुल स्त्रियों की मुख मदिरा से सींचे जाने पर ही पुष्पित होता है।
मौलश्री ऐसा ही एक वृक्ष है — जिसकी छाया में केवल शरीर को नहीं, आत्मा को भी विश्रांति मिलती है। जो देखने में जितना मोहक है, उससे कहीं अधिक मुखर है उसमे बसी कविता की प्रतिध्वनि, जो इसके पत्तों की सरसराहट में, और इसकी डालियों के आंदोलन मैं, जो इसके स्निग्ध, कोमल, और अत्यंत मोहक फूलों से उदभूत होती है। एक ऐसा वृक्ष जो साँस भी ले तो गान रच दे।मौलश्री केवल कवियों की कल्पना नहीं, तपस्वियों की तन्मयता का वृक्ष भी है। यह छाया नहीं देता, शांति देता है; सुगंध नहीं लुटाता, आत्मीयता रचता है।
मौलश्री को बकुल, मोकुल या मौलसीरी नामों से जाना जाता है। और भी कुछ नाम हैं – मुकुर, सिंघ केसर, सिंह केसर, वकुल आदि। मैं हर दिन अपनी भोर की सैर के समय इस वृक्ष को देखता हूँ, और थोड़ी देर अवश्य इसकी छाया में रूकता हूँ। देखता हूँ इसकी हरित, गुँथी हुई पत्तियाँ , और इसकी कोमल झिलमिलाती छाया, और महसूस करता हूँ एक नर्म हवा। और फिर लगता है के मैं किसी अदृश्य ऋषि के तपोवन में आ पहुँचा हूँ। इसकी न पत्तियाँ विस्तीर्ण हैं, न शाखाएँ बोझिल। सब कुछ संयमित, संतुलित और फिर भी असाधारण। जैसे एक प्राचीन श्लोक, जो अर्थ के साथ-साथ लय का भी अनुशासन साधता हो।
सुगंध का मौन संगीत
बकुल वर्षा ऋतु में खिलने वाले पुष्पों मे कदम्ब के पश्चात सर्वाधिक उल्लेखनीय़ पुष्प है। मौलश्री के फूलों में शायद श्वेत शुचिता न हो, और न ही हो गुलाब की मादकता लेकिन इसके छोटे, तराकार,पीले-सफेद फूलों में होती है एक मौन सुगंध, जो हमारी चेतना और अवचेतना दोनों को अनुभूत होती है – एक इन्द्रियातीत चेतना जो स्मृति में बस जाती है। इसीलिए तो इसके फूलों ने महान साहित्यकारों को अपनी सुंदरता और सुगंध के मोह पाश में बाँधा है।

कालिदास और बकुल
कालिदास को फूलों का वर्णन शायद अतिशय प्रिय था। बकुल पुष्प भी कालिदास के काव्य में सर्वत्र उल्लिखित है। रघुवंश हो या अभिज्ञानशाकुंतल, या फिर कुमारसंभव, या ऋतुसम्हार बकुल की उपस्थिति सदैव आकृष्ट करती है। कुमारसंभव एवं ऋतुसंहार में इस पुष्प को केसर नाम से अलंकृत करते हैं कालिदास। और अभिज्ञानशाकुंतल में तो यह सूचना भी देते हैं कि बकुल के यह पुष्प सूर्यातप से मुरझा कर भी अपनी सुगंध नहीं खोते।
बकुल के फूलों में न गुलाब की उत्तेजना है, न कदंब की आवेशपूर्ण आभा, लेकिन है एक मृदु, मौन सुगंध — जो चेतना से अधिक अवचेतन में बसती है। यह वही गंध है जिसने कालिदास को अपनी काव्यभाषा दी। अभिज्ञानशाकुंतलम् में बकुल पुष्पों को गिरते देख कर उन्होंने लिखा—
“मन्दंसमीरपतितंकुसुमंबकुलस्य।“
(धीरे–धीरे, समीरकेसाथझरतेहुएफूल…)
फूलों के निर्वाच्य झरण को बकुल की तरह और कौन इतनी गरिमा और सुंदरता से अभिव्यक्त करता होगा? फूल ऐसे झरते हैं, जैसे कोई ऋषि ध्यान में डूबे-डूबे आशीर्वाद बरसाता हो। यह वृक्ष कोई चकाचौंध नहीं फैलाता, अपितु धीरे-धीरे गंध की उपस्थिति से आत्मीयता गढ़ता है।
साहित्य एवं शास्त्रों में बकुल
बकुल एक स्वर्ग-पुष्प के रूप में पुष्प पुराणों में प्रतिष्ठित है। पारिजात की तरह भले ही कृष्ण इसे सत्यभामा के लिये इंद्र से चुरा कर न लाए हों पर स्वर्ग पुष्पों में तो यह प्रतिस्थापित है ही।कहते हैं यमुना किनारे इसी बकुल वृक्ष के नीचे खड़े होकर कृष्ण बाँसुरी बजा-बजा कर गोपांगनाओं का मनोरंजन किया करते थे। रामायण में वसंत ऋतु में इसका खिलना वर्णित है और महाभारत में भी। वाल्मीकि ने पंपासर और अशोकवन में इसका वर्णन किया है, और जयदेव ने इसे वसंत के आगमन का
संकेतक माना है।भक्ति साहित्य में यह वृक्ष बार-बार प्रकट होता है। लोककथाओं में कहा गया है कि नरसी मेहता मौलश्री की छाया में बैठकर हरिनाम संकीर्तन करते थे।
क्योंकि यह वृक्ष केवल छाया नहीं देता, एक अनुभूति देता है—दृष्टिगोचर लेकिन संवेदना से आप्लावित।
मौलश्री और आयुर्वेद
मौलश्री का वृक्ष और उसके पुष्प अपनी मनोरम सुगंध के कारण मन को प्रमुदित तो करते ही हैं, परंतु आयुर्वेद में इसका स्थान विशिष्ट है। आयुर्वेद में मौलश्री के पुष्प, फल, छाल सब औषधि हैं। यह कफ-पित्त शामक, विषघ्न और ज्वरनाशक है। इसके फूलों से तैल निकाला जाता है, छाल में टैनिन और रंजक होते हैं, और फल में सैपोनिन। यूनानी मतानुसार बकुल के पुष्प गरम और खुश्क तथा फल एवं छाल शीत एवं रुक्ष होते हैं।
इन सब विशेषताओं के इतर भारतीय मानस ने इसे सिर्फ दवा के रूप में नहीं, स्मृति और संस्कृति के वृक्ष के रूप में स्वीकारा है।
मौलश्री और मातृत्व
मौलश्री का वृक्ष मातृत्व की भाँति है—बिना माँगे देता है, बिना बोले अपनाता है। इसकी छाया में बैठकर कोई अनचाहा बोझ भी उतर जाता है। यह पेड़ ठहराव का, शांति का, और घनीभूत करुणा का प्रतीक है। ग्रीष्म की तपन में इसका अस्तित्व एक विराम नहीं, अभिरक्षा है।
वह वृक्ष जो अपनी उपस्थिति से किसी को रोकता नहीं, पर कोई ठहर जाए तो उसे पूरी आत्मीयता से थाम लेता है।माँ भी तो यही करती है।—क्या वही सच्ची कविता नहीं है?
उपसंहार
यदि कभी जीवन के दौड़ते पलों से एक क्षण निकाल सकें, तो मौलश्री की छाया में कुछ देर ठहरिए। एक अद्भुत शांति का अनुभव करिये। एक अज्ञात ऊर्जा महसूस करिए। और इस वृक्ष की घनी छाया और इस छाया में झिलमिलाती प्रकाश के प्रतिबिंबों में प्रकृति की लयात्मकता देखिए, जैसे कोई कविता जीवंत हो गई हो, ऐसी कविता जो आपने ने न लिखी है, और न ही पढ़ी है क्योंकि यह वृक्ष ही स्वयं कविता है।