(मातृ दिवस पर एक स्वीकारोक्ति)
परिचय
बीते रविवार हमने अपनी माताओं को स्मरण किया। यद्यपि यह परंपरा आयातित है, हमारे यहाँ की नहीं है , किंतु माँ तो किसी परंपरा की मोहताज नहीं होती—वह स्मृति की सबसे उज्ज्वल दीपशिखा है। वह जो हर युग, हर जीवन, हर सुख और हर पीड़ा में साथ रही है—सर्वदा वंदनीय।
पर क्या केवल वही माँ है ?
एक और माँ भी है—जो हम सबकी है, हम सब में है।
वह, जिसकी गोद में पृथ्वी बसी है।
यह कविता दोनों माँओं—हमारी जन्मदात्री और धरती माता—को एक सूत्र में पिरोती है। यह कविता स्मृति से संकल्प की ओर ले जाती है — एक पूर्ण चक्र, जहाँ मातृत्व की महिमा केवल मनुष्य तक सीमित नहीं रहती, बल्कि धरती की निःशब्द, अव्यक्त पीड़ा को भी हमारी श्रद्धा का लक्ष्य बनाती है।
यह केवल एक कविता नहीं, बल्कि एक अंतर्दृष्टि और आत्मालोचना का दस्तावेज़ है जो नमन भी है, संकोच भी, स्मरण भी है, और संकल्प भी।
कविता
जिसने हमारा पहला क्रंदन सुना,
जो धूप में खुद जली, हमें छाया देने के लिए,
जिसकी अँजुरी से हमारी पहली प्यास मिटी,
और जिसकी गोद में बसा संसार का सबसे पहला घर,
उसे हम ‘माँ’ कहते हैं।
जो बिना कहे समझती रही,
हर थकावट से परे मुस्कुराती रही,
जिसकी इच्छाएँ रसोई की भाप में विलीन हो गईं,
और हमारी हँसी में जिसने अपनी हर सुबह देखी—
वही तो है माँ।
हम उसे फूल देते हैं, आदर के शब्द देते हैं—
पर क्या माँ को बस यही चाहिए?
या चाहिए वो मुखर संवेदना
जो उसकी हर अनकही पीड़ा को सुन सके?
और जब,
जब हम अपनी माँ के चरणों में झुकते हैं,
एक और माँ की स्मृति हमें छूती है।
वह, जिसकी छाती पर हम चलते हैं,
जिसकी शिराओं से नदियाँ बहती हैं,
जिसने अन्न दिया, जल दिया, हवा दी—
हम सब की माँ—धरती।
पर हमने क्या किया?
हमने चीर दिए उसके जंगल,
तोड़ डाले उसके पर्वत, ,
नदियों को विष से भर दिया,
अपनी लोभ और सुविधा के लिए
और फिर भी उसे माँ कहते रहे।
वह चुप रही—हर ऋतु में बसंत बोती रही,
हमारे लिए फूल उगाती रही,
और खुद भीतर ही भीतर जलती रही।
न कोई आक्रोश, न कोई रोष, न कोई उपालंभ —
बस मिट्टी में साँस लेती रही,
ताकि हमारी साँसें चलती रहें।
जिसके पास करोड़ों संतानें हैं,
और फिर भी आज वह
सबसे अधिक अकेली है।
तो करें क्या हम?
श्रद्धा के साथ पश्चाताप भी करें।
प्रण लें—कि अगली बार जब “माँ” कहें,
तो उसमें धरती की टीस भी हो,
उसकी पीड़ा का भी स्थान हो।
वो भी तो माँ है—
जो मिट्टी में साँस लेती है।