वर्ष की वह शुभतम तिथि, जब समय मानो थम-सा जाता है। एक ऐसा दिन, जिसे किसी विशेष मुहूर्त की आवश्यकता नहीं — क्योंकि यह तिथि स्वयं शुभत्व का शाश्वत स्रोत है। अक्षय तृतीया — एक संयोग, एक संदेश, और एक संकल्प।
यह पर्व केवल सांस्कृतिक परंपराओं की पुनरावृत्ति नहीं, बल्कि वह मौन आह्वान है जो भीतर से पूछता है — क्या हम कुछ ऐसा कर पा रहे हैं, जो क्षणिक न होकर अक्षय बन सके?
अक्षय की कथा: मिथक और मंगल
भारतीय परंपरा में अक्षय तृतीया केवल एक ज्योतिषीय घटना नहीं, बल्कि दैवीय संभावनाओं का उत्सव है। त्रेता युग का आरंभ, परशुराम का अवतरण, कुबेर का कोषाध्यक्ष बनना, और वेदव्यास द्वारा महाभारत का लेखन — सभी घटनाएँ इस दिन को सृजन, साहस और स्थायित्व का प्रतीक बनाती हैं।
ज्योतिषीय दृष्टि से यह वह विलक्षण क्षण है जब सूर्य और चंद्रमा दोनों उच्चतम प्रभाव में होते हैं — तेज और शीतलता, दृढ़ता और कोमलता का अद्भुत संतुलन। शायद यही वह समय है जब मनुष्य भी अपने भीतर संतुलन की खोज कर सके।
नवपुण्य की अवधारणा: तीन अक्षय वरदान
यदि इस अक्षय तृतीया हम कुछ ऐसा अर्जित करना चाहें जो समय के पार जीवित रहे, तो क्यों न तीन ऐसे पुण्यों की साधना करें जो युगों तक अक्षय रहते हैं —
आरोग्य, परोपकार, और विवेक।
✽ आरोग्य – तन और मन की शांति का वरदान
यह केवल रोग से मुक्ति नहीं, बल्कि शरीर, चित्त और आत्मा के बीच सामंजस्य की स्थिति है। जब जीवन में संतुलन आता है — आहार में मितव्ययिता, श्रम में लय, और विश्राम में सहजता — तब भीतर से एक ऐसी ऊर्जा जन्म लेती है जो जीवन को ऊर्ध्वगामी बनाती है।
✽ परोपकार – मौन में फलता हुआ पुण्य
परोपकार अब केवल द्रव्य का दान नहीं है। यह वह करुणा है, जब हम किसी अनजाने के आँसू पोंछते हैं, किसी की बात मन से सुनते हैं, या किसी को उसकी गरिमा लौटा देते हैं। यह वह पुण्य है जो मौन में किया जाता है, पर उसकी प्रतिध्वनि दीर्घकाल तक सुनाई देती है।
✽ विवेक – चेतना का दीप
इस युग में संभवतः सबसे दुर्लभ गुण है – विवेक। जब प्रचार और प्रदर्शन की चकाचौंध में भी हम सत्य का मार्ग चुनते हैं, जब लाभ से अधिक मूल्य की ओर दृष्टि रखते हैं, तब हम विवेक के आलोक में प्रवेश करते हैं। यही वह अंतर्निहित शक्ति है जो हर कर्म को पुण्य में रूपांतरित करती है।
समष्टि की ओर: पर्व से प्रयोजन तक
अक्षय तृतीया केवल ‘मैं’ का नहीं, ‘हम’ का पर्व है। यह स्वार्थ से परमार्थ की यात्रा का आमंत्रण है। यदि इस दिन हम किसी को शिक्षा का दीपक दें,किसी को भावनात्मक सहारा दें, या किसी को आत्मगौरव की अनुभूति कराएं — तो वह भी उतना ही पावन है जितना कोई धार्मिक अनुष्ठान।
नवीन संदर्भ: नये संकल्प, नयी चेतना
आज के समय में यह पर्व अक्सर केवल भौतिक अधिग्रहणों से जुड़ जाता है — नये आभूषण, वस्त्र, घर। परंतु, इस परंपरा को आत्मिक दिशा देने की आवश्यकता है:
- नये वस्त्र नहीं, नये संकल्प पहनें।
- नये आभूषण नहीं, नये गुण धारण करें।
- नये घर नहीं, नये भावनात्मक आश्रय बनाएं।
यदि इन कर्मों में श्रद्धा और संवेदना हो — तो यही बन जाते हैं अक्षय पुण्य।
एक कालजयी अवसर
अक्षय तृतीया एक अवसर है — जीवन को भीतर से देखने का, उसे नये अर्थ देने का। यदि हम इस दिन आरोग्य का बीज बो सकें, परोपकार का जल दे सकें, और विवेक की धूप दिखा सकें — तो यह जीवन मात्र जीवन नहीं रहेगा, यह बन जाएगा एक अक्षय स्मृति।
क्योंकि जो कर्म सत्य, प्रेम और सेवा से जन्मे हों — वे कभी नष्ट नहीं होते।
आपका जीवन सदैव मंगलमय हो, और आपकी चेतना सदैव आलोकित।