“नीरव निशा की साँझ में झरती रही,
ओस-भीगी पारिजात की पाँख़ुरी कहीं।
न बिखरी कली की स्मित हँसी,
न काँपी शाख़ करुणामयी।
बस सहज, मौन, श्वास छूटे प्राचीरों से —
झरती रही, तिरती रही,स्वप्न-सुगंध की बरसात अनछुई।“

रात्रि की नीरवता में जब अधिकांश फूल अपनी पंखुड़ियाँ समेट लेते हैं, पारिजात तब मुस्कुराता है — शुभ्र, सौम्य, स्निग्ध, सुगंधित शुचिता से आलोकित। उसकी पंखुड़ियाँ मानो चाँदनी से बुनी हों, और उनका केसरिया केंद्र जैसे किसी ऋषि की मौन अग्निशिखा — शांत, पर तेजस्वी।
पारिजात का वृक्ष अपनी काया में साधारण दीखता है। न वट जैसा विराट, न अशोक जैसा सज्जित; फिर भी उसमें कुछ है—कुछ अनदेखा, कुछ अनकहा—जो उसे विशिष्ट बनाता है। उसका जादू उसकी सुभग महक में है, उसकी क्षणिकता में है, और उन असंख्य कथाओं में है जो उसे अमर बनाती हैं।
प्रभात की पहली किरण जब फूटती है। पारिजात के फूल, मानो आकाशगंगा के तारे, आँगनों में झरते हैं। धरती चाँदी की चादर ओढ़ लेती है, जिसकी किनारी केसरिया है।कोई उन्हें अंजलि में भर लेता है, कोई आँखें मूँदकर उसकी भीनी मादकता भीतर तक पी लेता है। मंदिरों के आँगन सजते हैं, और हृदय श्रद्धा से सिंचित हो उठता है।
पारिजात का सौंदर्य क्षणभंगुर है — रात में खिला, भोर से पहले झर गया। पर उसी क्षणभंगुरता में उसकी अमरता छुपी है। वह फूल जीवन की उसी सच्चाई का प्रतीक है—क्षणभंगुर होते हुए भी, स्मृति में अनंत बन जाने वाला।
सौंदर्य, प्रेम और ईर्ष्या
पारिजात की कथा समुद्र मंथन की अतल गहराइयों से जन्म लेती है—जहाँ देव और दानव एक साथ अमृत की आकांक्षा में प्रयासरत थे। उसी कालखंड में प्रकट हुए कल्पवृक्ष, ऐरावत, लक्ष्मी, और पारिजात। देवताओं ने इसे अपने स्वर्गिक उपवन की शोभा बनाया—शुद्ध, दुर्लभ और दिव्य।
किन्तु पारिजात की यात्रा यहीं नहीं रुकी। जब पृथ्वी पर श्रीकृष्ण का अवतरण हुआ, तो इस पुष्प ने भी अपना भाग्य पुनः लिखा।

कथा है कि देवेंद्र ने कृष्ण को पारिजात का पुष्प भेंट किया। कृष्ण ने वह पुष्प अपनी प्रिय रुक्मिणी को अर्पित किया—रुक्मिणी, जो प्रेम और विवेक की प्रतीक थीं। पर सत्यभामा—जो मान, अधिकार और हठ की चंचल मूर्ति थीं—अप्रसन्न हो गईं। सत्यभामा के आग्रह पर कृष्ण इंद्रलोक पहुँचे और संपूर्ण पारिजात वृक्ष ही पृथ्वी पर ले आए। पर विचित्र संयोग कि वृक्ष सत्यभामा के महल में रोपित तो हुआ, पर उसकी मधुर सुगंध रुक्मिणी के आँगन में झरती रही।
रुक्मिणी की मौन गरिमा और सत्यभामा की उद्दाम उत्कंठा—दोनों ही कृष्ण के हृदय में अपनी-अपनी जगह रचती हैं, और पारिजात उनके इस रसमय त्रिकोण का चिरंतन प्रतीक बन जाता है।
यह कथा मात्र एक वृक्ष की नहीं, उन सूक्ष्म भावनाओं की अभिव्यक्ति है जो प्रेम, अधिकार और त्याग के मध्य प्रवाहित होती हैं।
स्वर्ग में पारिजात देवत्व का सौंदर्य था, धरती पर वह प्रेम का साक्षी बना।
सांस्कृतिक छवि और धार्मिक महत्त्व
पारिजात मात्र एक पुष्प नहीं है; वह श्रद्धा, समर्पण और आत्मनिवेदन का प्रतीक है। ‘हरसिंगार’—जिसका अर्थ ही है ‘हर (शिव) को अर्पित होने वाला सिंगार’—के नाम से जाना जाने वाला यह पुष्प, भारतीय संस्कृति में विशिष्ट स्थान रखता है। विशेषतः विष्णु, कृष्ण और शिव को समर्पित इस पुष्प की पंखुड़ियाँ उसकी सात्विकता और पवित्रता की उद्घोषणा करती हैं। शिवालयों में श्वेत पंखुड़ियाँ और भगवा केंद्र गौरवर्ण एवं जटाजूटधारी की छवि को सजीव कर देते हैं। नवरात्रि की प्रातः बेला में पारिजात की गंध हवा में घुल जाती है। स्त्रियाँ अंजलि में इन फूलों को समेटती हैं, अपने मौन उपासना को इस फूल की कोमलता में पिरोकर ईश्वर तक पहुँचाती हैं।
विशेष मान्यता यह भी है कि पारिजात अकेला ऐसा पुष्प है जो झरने के बाद भी पूजन योग्य रहता है—क्योंकि यह स्वेच्छा से झरता है, बिना हिंसा के। उसका झरना, आत्मनिवेदन है। जैसे कोई अपना सर्वस्व चुपचाप अर्पित कर दे—बिना किसी अपेक्षा के।

नश्वरता का अमरत्व
रात्रि में खिलना और भोर से पहले झर जाना—पारिजात का यह चक्र जीवन का मौन दर्शन रचता है। क्या यही नहीं है हमारा भी सत्य? हम खिलते हैं, मुस्कुराते हैं, अपनी सुगंध दूसरों में बाँटते हैं—फिर एक दिन चुपचाप झर जाते हैं। पर पारिजात हमें सिखाता है कि झरना पराजय नहीं है।
झरकर भी वह अर्थहीन नहीं होता—वह पूजित होता है, वह स्मृतियों में बसता है, वह प्रार्थनाओं के संग बहता है। गिरकर भी वह अपना मूल्य नहीं खोता, अपितु उसी में उसका उत्कर्ष निहित है।
जीवन में भी, जब हम पारिजात जैसे बनते हैं—त्यागमय, मौन, और संपूर्ण समर्पण में डूबे—तभी हमारी सच्ची महत्ता प्रकट होती है। पारिजात यह सिखाता है कि झुकना भी कभी-कभी उत्कर्ष का मार्ग बन जाता है।
‘अनायासेन मरणम’, इस प्रार्थना की व्याख्या जब होती है तो कहा जाता है कि हमारी विदाई उसी तरह से हो जैसे पारिजात के पुष्प अनायास ही झर जाते हैं। एक फूल के टूट कर ज़मीन पर गिरने का इतना उद्दात चित्रण अद्भुत और अतुलनीय है।
लोकजीवन और साहित्य में संजोई स्मृति
गाँवों की सुबहें ओस से भीगी होती हैं, और पारिजात के झरे फूल आँगनों में चाँदी के कणों-से बिखरते हैं।
महिलाएँ उन्हें श्रद्धा और स्नेह से चुनती हैं, मानो कोई पुराना राग समेट रही हों। ये फूल बालों की वेणी बनते हैं, थालों में सजते हैं, और मंदिरों के द्वार तक पहुँचते हैं।
लोकगीतों में पारिजात कभी विरह का प्रतीक बनता है, कभी अधीर मिलन का। बांग्ला, मैथिली, अवधी, मलयालम—अनेक भाषाओं के गीतों में इसकी मधुर सुगंध गूँजती है। हिंदी साहित्य में हरिवंश राय बच्चन, अज्ञेय और महादेवी वर्मा जैसे कवियों ने इसकी क्षणभंगुरता को आत्मा की अनुगूँज बना दिया है।
किंवदंतियाँ कहती हैं कि पारिजात का फूल घर में रखने से उदासी दूर होती है, और वातावरण में शांति का संगीत भर जाता है। शायद इसीलिए यह फूल हमारी स्मृतियों में भी उसी भीनी सुगंध की तरह बसता है—जो कभी समाप्त नहीं होती, बस भीतर कहीं गूंजती रहती है।
मौसम बदलते हैं, समय भी बदलता है।
पर पारिजात की दुर्लभ आभा नहीं बदलती।
आज भी वृद्धाश्रमों के आँगनों में, मंदिरों की सीढ़ियों पर, बस्तिओं, गाँवों, शहरों के ज्ञात -अज्ञात कोनों में जब पारिजात झरते हैं, तो वे यही कहते हैं—
कुछ सुंदरताएँ कभी निष्प्रभ नहीं होतीं,
कुछ कमनीयताएँ कभी निर्बल नहीं होतीं,
और कुछ स्मृतियाँ… कभी निष्प्राण नहीं होतीं।